राजीव तिवारी ‘बाबा’  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना से जंग लड़ रहे डाक्टर, मेडिकल स्टाफ, सफाई कर्मी, पुलिस व अन्य बल, ट्रांसपोर्ट ड्राइवर्स और मीडिया कर्मियों को कोरोना योद्धा का दर्जा दिया. लेकिन अन्नदाता किसानों को भूल गये. जबकि आज जब दुनिया की सारी आर्थिक गतिविधियाँ ठप पड़ी हैं. लाकडाउन के दौरान लोगों को अब लग रहा है कि अभी तक की सारी आवश्यकताओं में सबसे ऊपर तो उदरपूर्ति थी, जो जीवन चलाने के लिए सबसे प्राथमिक आवश्यकता है. लेकिन विकास की थोपी गयी कृत्रिम अवधारणा ने मानव को अनावश्यक खर्चों में उलझा दिया था.
यही समय था जब कृषि प्रधान देश की सरकार को अब तक की सारी आर्थिक नीतियों को दरकिनार कर खेती किसानी को बेस करते हुए आर्थिक योजना तैयार कर लागू कर देनी चाहिए था. उद्योगपतियों पर दबाव डाला जाता कि वे गांवों की ओर रुख करें. खेती संबंधित उत्पादों की फैक्ट्रियां व मिलें अधिक से अधिक गाँवों में ही लगाएं. ताकि किसानों को और बेरोजगार हो कर गांवों को लौटे नौजवानों को वहीं पर रोजगार मिल जाता और कम से कम उदरपूर्ति के मामले में देश आगे चलकर किसी देश पर निर्भर नहीं रहता. बल्कि यहां से दूसरे देशों को भी खाद्य सामग्री सप्लायी होती. मनरेगा का धन बढ़ाया जाता. स्किल डेवलमेंट के तहत खेती किसानी और एग्रो फूड इंडस्ट्री में काम आने ला़यक विधाओं में गांव के ही युवाओं को नि:शुल्क ट्रेनिंग मिलती. स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राकृतिक एवं अन्य सरल होमियोपैथिक व आयुर्वेदिक चिकित्सा संबंधी कोर्सेज को बढ़ावा दिया जाता. जिसमें मिट्टी पानी धूप हवा योग ध्यान चुंबक एक्यूप्रेशर एक्यूपंक्चर प्राणिक हीलिंग आदि इत्यादि प्राकृतिक तरीकों से स्वास्थ्य लाभ को बढ़ावा दिया जाता. टूरिज्म इंडस्ट्री को विलेज टूरिज्म पैकेज डिजाइन करने को बोला जाता. इसमें लोगों को प्रेरित किया जाता कि वे अपने घरों में ही कुछ सुविधाएं बढ़ाकर उसमें गेस्ट आमंत्रित कर सकते और अर्थलाभ करते. साथ ही स्पिरिचुअल टूरिज्म के पैकेज भी बनाये जाते.
छोटे किसानों की ज्यादा से ज्यादा सहकारी समितियाँ नये सिरे से बनवा कर उन्हें प्रमोट और मजबूत किया जाता. क्योंकि पूर्व में बनीं सहकारी समितियां भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकीं हैं. गांवों में महिलाओं के ज्यादा से ज्यादा स्वयं सहायता समूह बनवा कर उनसे एग्रो फूड इंडस्ट्री में काम लिया जाता इससे घर घर में अर्थ सर्कुलेशन बढ़ता. देश की बहुसंख्यक आबादी अभी भी गांवों में ही रहती है. जिसकी मुख्य आजीविका का साधन अभी भी खेती किसानी ही है. और महत्वपूर्ण बात ये है कि कोरोना आपातकाल में शहरों से बड़ी संख्या में रिवर्स पलायन गांवों की ओर बढ़ा है. जिसके चलते गांवों पर हर तरह का दबाव बढ़ा ही है. शहरों ने विपत्ति के समय में गांवों से पलायित होकर आये लोगों की जिस तरह से उपेक्षा की है उसके चलते इनका कोरोना बाद की परिस्थितियों में वापस शहर लौटना आसान नहीं होगा. लिहाजा.. कोरोना आपदकाल और इसके बाद भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए इस लेख में दिये गये सुझावों को ध्यान में ले और कार्य योजना बनाकर कार्य अभी से शुरू करे. और हां, किसानों को भी कोरोना योद्धा का दर्जा मिले. किसानों को भी मानव जीवन बचाने के प्रति उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जाय.

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