मैक्सिको में जी-20 देशों के सम्मेलन में भाग लेने जाने से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कहना कि दुनिया संकट में है बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि भारत के पास वर्ष 2008 जैसे संसाधन अब नहीं है और मंदी दस्तक देती है तो उससे निपटना आसान नहीं होगा। लेकिन प्रधानमंत्री जी के बयान में यह कैसा विरोधाभास है कि एक तरफ जहां भारतीय अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है पैसों की तंगी विकास में बाधा बन रही है, इसके बावजूद ब्रिक्स सम्मेलन में भारत पैसा लुटाने से बाज नहीं आ रहा है। मेक्सिको में चल रहे इस सम्मेलन में भारत ने आईएमएफ को 10 अरब डॉलर यानी 55 हजार करोड़ रुपए दिए जाने का ऐलान किया है। कमजोर अर्थव्यवस्था और बदतर हालातों के बीच भारत का इतनी बड़ी रकम का देना हर भारतीय को हैरत में डाल देने वाला है। दुनिया की पांच तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत ब्रिक्स का अहम सदस्य है। इसके नाते अपनी साख बचाए रखने के लिए आईएमएफ को इतना पैसा दे रहा है। भारत की ओर से ये घोषणा ऐसे समय की गई है जब भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार मंदी की ओर बढ़ रही है। निवेश घट रहा है। नौकरियां सीमित होती जा रही है। राजकोषीय घाटे का दबाव मजबूत हो रहा है तो फिर इतनी बड़ी रकम का दान क्यों। इतनी बड़ी रकम को कहीं निवेश कर हजारों हाथों को काम मिल जाता। इस 55हजार करोड़ रुपए से पेट्रोलियम राजस्व को हो रहे नुकसान को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता था। वहीं कम्पनियों के नुकसान की भरपाई इस रकम से हो सकती थी। आम जनता को कम से कम दस रुपए सस्ता मिलता पेट्रोल। आम आदमी को राहत देने की मंशा सरकार की लगती नहीं है। जरा सोचिए तो सही कि बजट 2012-13 में सरकार को टैक्स छूट के चलते करीब 4500 करोड़ रुपए का घाटा पड़ा था। ऐसे में अगर इस पैसे का इस्तेमाल टैक्स छूट में किया जाता, तो भारत सरकार बिना घाटे के 12 साल तक लगातार टैक्स छूट मुहैया करा सकती थी, जो कि आम आदमी के हित में होता। इतना ही नहीं दान वाली रकम अपने देश में इस्तेमाल कर सरकार सडक़ नेटवर्क को और मजबूत कर सकती थी। वर्तमान बजट में सरकार ने 8800 किमी सडक़ बनाने के लिए 25360 करोड़ रुपए आवंटित किया था। अतंराष्टï्रीय मुद्रा कोष को दी जाने वाली भारतीय मदद से करीब 17600 किमी सडक़ें बनाई जा सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। बढ़ती भुखमरी के बीच भारत इस रकम की मदद से गरीबों को 28 हजार किलो अनाज मुहैया करा सकता था। वहीं इन पैसों की मदद से नेशनल फूड सिक्योरिटी बिल का 2 सालों का बजट पूरा किया जा सकता था। यानि 2 साल तक हर किसी को इन पैसों से भोजन मुहैया कराया जा सकता है। आईएमएफ को दिए गए इस 55हजार करोड़ रुपए को अगर देश के रक्षा बजट से जोड़ा जाए, तो ये धनराशि कुल रक्षा बजट की 25 फीसदी है। ऐसे में इस पैसे का इस्तेमाल कर भारतीय रक्षा तंत्र को और मजबूत किया जा सकता था।  यह तो रही उस रकम की बात जो भारत अपनी झूठी शान दिखाने के लिए आईएमएफ को दे रहा है। एक बात और प्रधानमंत्री बुरे दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था के चलते हमेश कठोर कदम उठाने की बात करते हैं पर ब्रिक्स सम्मेलन में दोनों हाथों से धन दान करते हैं। कंगाल हो रही भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रधानमंत्री चिंता जताते जरूर हैं पर जरूरी कदम उठाने की जगह कठोर कदम की बात करते हैं। पता नहीं उन्हें आम आदमी की तकलीफों का अहसास कब होगा।

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