मोहल्लों में फिर आई रिश्तों में गर्माहट

चुनाव मोहल्ले का ही है। प्रत्याशी उसी इलाके का। वोटर भी वही हंै, जिनके साथ गुल्ली-डंडा खेला। कंचे से निशाना लगाया। पतंग लड़ाई। गोद में बैठकर उनकी दाढ़ी और मूंछ भी नोची। वह प्रत्याशियों की रह-रग से वाकिफ हैं। फिर भी, नगर निगम के चुनाव में पार्षद के प्रत्याशियों को नए सिरे से अपने व्यक्तित्व का परिचय कराना पड़ा है। प्रत्याशी हैं कि उनकी भूख तो गायब हो ही गई है, इस प्रचंड गर्मी में प्यास भी नहीं लग रही है। चाचा-चाची, ताऊ-ताई, भैया-भाई, बेटा-बेटी, मामा-मामी जैसे ही शब्द कहते सुबह से शाम हो जा रही है। मतदान में कुछ ही दिन शेष बचे हैं, चुनाव प्रचार अभियान अपने पूरे शबाब पर है। पांच वर्ष बाद अपने मोहल्ले का प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिला है। फिर पांच वर्ष बाद यह मौका मिलेगा। जरा सी चूक उनके मोहल्ले के विकास में बाधक बन सकती है, लिहाजा खूब ठोंक-बजा रहे हैं। चूंकि जानते सभी को हैं, लिहाजा वह किसी भ्रम में नहीं हैं। जबकि प्रत्याशी हैं कि मिसिरी घुली बोली से भरमाने में लगे हुए हैं। लखनऊ नगर निगम के चुनाव के लिए मतदान २३ जून को होगा। ११० वार्डों वाले इस नगर निगम में पार्षद के १६७९ प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें से चुने जाएंगे ११० ही, लेकिन इस चुनाव में सफल होने से लिए सभी एड़ी-चोटी का पसीना एक किए हुए हैं। विकास के दावे सभी के हैं। हर सुख-दुख में शामिल होने के वायदे सभी कर रहे हैं। कुछ तो पहले की सेवा का दाम भी वोट के रूप में मांगने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। यह सही है कि तमाम प्रत्याशी वर्षों से अपना ज्यादा समय समाजसेवा में लगाते रहे हैं। कुछ एक दम नए-नए चेहरे भी मैदान में दिखाई देने लगे हैं। खुद तो घर-घर पैदल जा ही रहे हैं, समर्थक भी टेम्पो, रिक्शा से गली-गली में घूमकर प्रचार में जुटे हैं।

आम आदमी प्रचंड गर्मी और भयंकर उमस से परेशान है। प्रत्याशियों पर इसका कोई असर नहीं है। आमतौर पर आठ बजे के पहले जगाने के बावजूद बिस्तर छोडऩे में आनाकानी करने वाले जब प्रत्याशी बन गए हैं तो उनकी नींद पांच बजे के पहले ही खुल जा रही है। चैतन्य होते ही चुनाव की चर्चा शुरू। धूप निकलने के पहले ही घर से निकल जाना इस समय दिनचर्या बन गई है। देर रात लौटने की मजबूरी भी। कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते। एक-एक घर में चार-चार, पांच-पांच बार दस्तक। मतदाता कालबेल की आवाज से दरवाजा खोलते-खोलते परेशान हो चुके हैं, लेकिन इस परेशानी की झल्लाहट किसी प्रत्याशी या उसके प्रचारकों के सामने नहीं दिखाई देती। जिस अंदाज में मीठी बोली बोलकर दोनों हाथ जोडक़र वोट मांगा जा रहा है, ठीक उसी अंदाज में मतदाता भी जवाब दे रहे हैं -हम तो आपके ही हैं। आपके अलावा और किसी को वोट देने का सवाल ही नहीं उठता। हर प्रत्याशी को यही जवाब। यह अलग बात है कि एक प्रत्याशी के जाने के बाद उसकी खूबियों की चर्चा तो नहीं होती, खामियां गिनाने की घर के सदस्यों में होड़ मच जा रही है।

जब से नगर निगम का चुनाव हो रहा है, हर पांच वर्ष बाद यही स्थिति बनती है। वार्डों के मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनकर बड़ी आशा के साथ मिनी सदन में भेजते हैं। पर, उनकी समस्याएं अभी भी जस की तस हैं। जबकि प्रत्याशी हर बार सारी समस्याओं का समूल नाश करने का वादा करते हैं। मतदाताओं की भी मजबूरी है कि जो मैदान में हैं, उन्हीं में से किसी एक को चुन लेना है। चुनते भी हैं। कोई प्रचार, निवेदन आदि से अपने को अलग रखते हुए समझ-बूझ कर वोट देता है तो कोई मीठी बातों में आकर। प्रत्याशी भी जानते हैं कि विवेक से वोट देने वाले अब कम रहे, यही कारण है कि मीठी बातों, वादों, दावों का सहारा ज्यादा लेने लगे हैं।
बहरहाल पूरा शहर चुनावी रंग से सराबोर हो चुका है। उत्सव जैसा माहौल बन गया है। २३ जून को मतदान तक यह माहौल कायम रहे, मतदाता ज्यादा से ज्यादा संख्या में घरों से निकल कर बूथ तक पहुंचें, तभी सही चयन हो सकेगा। वैसे राज्य निर्वाचन आयोग (निकाय व पंचायत) ने अपने स्तर से मतदाताओं को जागरूक करने के लिए हर स्तर पर अभियान छेड़ रखा है।

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