11 सालों से अनशन पर बैठी इरोम आर्मस फोर्ड एक्ट को मणिपुर से हटाना चाहती है। इसमें स्पेशल पावर होते हैं कि शक के आधार किसी की भी  जान ली जा सकती है। इरोम को वो हादसा आज भी याद है,जब मणिपुर में बसस्टाप में इंतजार करते हुए 10 लोंगों को शक की वजह से मार दिया गया था|

ऋचा मिश्रा
एसोसिएट एडीटर


देश की राष्टपति एक महिला है। सत्ता में न रहते हुए भी एक महिला सुपर पीएम है। लोकसभा  में स्पीकर भी महिला है। नेता विपक्ष भी महिला हैं । चार राज्यों में महिलाओं की सत्ता है। कहीं बहन जी तो कहीं दीदी तो कहीं अम्मा। दिल्ली में भी महिलाओं का बोलबाला है। भरष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली टीम अन्ना की एक सदस्य किरन बेदी भी महिला हैं। वामपंथियों के खेमे की महिला वृंदा करात सक्रिय सदस्य हैं। लेकिन इन पावरफुल महिलाओं को उस युवती का संघर्ष नहीं दिख रहा जो पिछले 11 साल से जारी है। उसने आखिरी दम तक लड़ने की कसम खाई है। निर्दोष जनता का कत्लेआम उसे मंजूर नहीं। बस यही तो जिद है उसकी। यही जिद उसे जिंदा भी रखे हुए है। हो यह अलग बात है कि उसके पीछे भीड़ नहीं है। अन्ना की दिनचर्या और हर सांस की चौकीदारी कर रहे चैनलों के लिए इरोम किसी काम की नहीं। भाई यहां तो टीआरपी का सवाल है। पुलिस अफसर रही किरन बेदी  सांसदों को तो आइना दिखा सकती हैं रामलीला मैदान पर उनकी नकल उतार सकती हैं पर पुलिस की असलियत पर कुछ नहीं बोलती। नेता विपक्ष सुषमा स्वराज रामदेव मामले में गांधी समाधि पर नाच सकती हैं अन्ना के लिए तांडव कर सकती हैं रेडी बंधुओं की गिरफ्तारी पर संसद में शोर मचा सकती हैं पर इस अनशनकारी महिला के लिए उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूटता। केन्द्र सरकार या फिर सोनियां गांधी से तो कोई उम्मीद भी नहीं है। इरोम शर्मिला चानू के जज्बे को हर किसी को सलाम करना चाहिए। जेल की अंधेरी कोठरी में कैद इस युवती को सूरज की पहली किरण देखने की इजाजत नहीं है। डेमोक्रेसी ने ये हक भी उससे छीन लिया है। उसे आदेश दिया गया है वहां रहने का जहां रोशनी को भी आने की इजाजत लेनी पड़ती है। अब सवाल उठता है उसे किस गुनाह की सजा मिली है…ऐसी क्या मजबूरी है। सवाल बहुत सीधे हैं मगर जवाब उस अंधेरे कमरे में कहीं खो गये हैं।

इरोम शर्मिल चानू,मणिपुर में पली बढ़ी एक सामाजिक कार्यकर्ता,जिसने सन २००० में अपना अनशन शुरू किया। आज भी वह अनशन जारी है। इरोम आर्मस फोर्ड एक्ट को मणिपुर से हटाना चाहती है। इसमें स्पेशल पावर होते हैं कि शक के आधार किसी की भी जान ली जा सकती है। इरोम को वो हादसा आज भी याद है,जब मणिपुर में बसस्टाप में इंतजार करते हुए 10 लोंगों को शक की वजह से मार दिया गया था। आर्मी के इसी पावर को मणिपुर से हटाये जाने के लिए इरोम अनशन पर है। यही इरोम का अपराध भी है। वह दूसरों के लिए अपनी जिन्दगी लगा रही है। लेकिन इस बात का असर किसी पर नहीं पड़ता है। क्योंकि अंधो के शहर में रोशनी करना और बहरों के शहर में संगीत का कोई मतलब नहीं होता है। इरोम की इस कोशिश को मीडिया ने भी अनशन का नाम दिया है और अन् ना की आंधी में सच के लिए जल रहे इस चिराग को •ाुला ही दिया है। लेकिन पुलिस ने धारा ३०9 के तहत आत्महत्या करने की कोशिश में हिरासत में रखा है। इरोम का शरीर पीला पड़ चुका है,वो बेहद दुबली हो चुकी है। उनकी आखों में चमक आज भी बरकरार है।

इरोम अपनी मां से भी मिल नहीं सकती । इसकी भी उन्हें इजाजत नहीं है। आज इरोम की मां भी उनसे मिलना नहीं चाहती । कहीं बेटी उनके आसुओं को देखकर कमजोर न पड़ जाय। इरोम की मां का कहती है कि एक रात भूखे सोना कितना मुश्किल होता है। इरोम को इतने सालों से कितनी तकलीफ हो रही होगी। इरोम को नाक से लगी ड्रिप द्घारा जिन्दा रखने की खुराक पहुंचाई जाती है। इरोम को संघर्ष करते हुए ११ साल हो गये है। लेकिन इरोम की आवाज आज भी अनसुनी है। आज इरोम को मणिपुर के लोगआयरन लेडी के रूप में जानते है, लेकिन गूगल पर। आम इंसान के कानों के आस-पास ऐसी कोई गूंज भी नहीं है।

कभी वर्ड कप के दौरान तो कभी अन् ना के कारण बहुत सी खबरे ब्रेकिंग न्यूज नहीं बन पाती। हाल ही सरकारी काबिल मंत्रियों के झुण्ड में से एक मंत्री ने कहा था कि  वे बातचीत करेंगे व सहमति बनाने की जल्द ही कोशिश कारेंगे, लेकिन कोई सरकार से ये पूछे कि11 साल तक अनशन पर लगा देने के बाद सहमति पर चर्चा की जा रही है। अब क्या फैसला इरोम की अन्तिम सांस के इंतजार में रखा है। जिस देश में राजीव गांधी के हत्यारों पर माफी पर विचार किया जा स•ता है। माफी की अपील की जा सकती है, उसी देश में एक महिला के अनशन पर बैठने का संघर्ष किसी को समझ में नहीं आता।

इरोम का अनशन कई बदलाव लायेगा, इरोम को न्याय भी मिलेगा, लेकिन इरोम ने जो गवांया है उसे कौन वापस दे जायेगा। आम इंसान की जिंदगी की चौखट पर खड़े होकर देखने से पता चलता है कि इरोम ने जो गवांया वो कोई नहीं लौटा सकता।

जिम्मेदारी हमारी भी है, इरोम की मांग की सही न्याय दिलाने की। कब तक यूं ही हम सोते रहेंगे? और कब तक कोई सालों की मेहनत कर हमें जगायेगा। इरोम के साथ कई सवाल खड़े होते हैं जिसका जवाब नेता, अभनेता को नहीं समाज को देना होगा। मीडिया भी अपन जिम्मेदारी से बच नहीं सकती|

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