धार्मिक नगरी वाराणसी के महाश्मशान घाट मणिकर्णिका पर चिता लगाने के लाले पड़ रहे हैं और शवदाह के लिए लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। गत एक पखवारे से जारी भीषण गर्मी के कारण मरने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। रेलवे स्टेशनों एवं बस अड्डों पर यात्रियों की लम्बी कतारें देखी जाना साधारण बात है लेकिन महाश्मशान घाट मणिकर्णिका पर वेटिंग लिस्ट बहुत लम्बी है। हालत यह है कि जगह न मिलने पर लोग सीढिय़ों पर ही शवों का दाह संस्कार कर रहे हैं। जानकारों के अनुसार आज से 17 वर्ष पूर्व भी एेसी स्थिति आई थी। एक चिता की आग ठंडी नहीं पड़ पा रही है कि दर्जनों की लाईन लगी जा रही है। घाट पर पहुंचने वाली संकरी गली लगातार राम नाम सत्य है से गूंज रही है। इसी के साथ ही लकड़ी एवं अन्य सामग्रियों के दाम कई गुना बढ़ गए हैं। डोम राजा की कमाई कई गुना बढ़ गई है। ज्ञातव्य है कि वाराणसी के साथ ही साथ आसपास के जिलों एवं बिहार एवं मध्य प्रदेश के लोग शवों को लेकर वाराणसी आते हैं। मान्यता है कि यहा पर शवों को जलाने से मृतात्मा सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है। इसके साथ ही साथ एेतिहासिक सिद्ध हरिश्चन्द्र घाट पर भी शवोंं को जलाने की कतार लगी है।
शवदाह के लिए आए सम्बन्धियों ने बताया कि जो लकड़ी 250 रुपए प्रति कुंतल बिक रही थी वह अब 500 से 700 रुपए कुंतल हो गई है। इसी तरह अन्य चीजों के दाम भी बढ़ गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस महाश्मशान घाट पर लगातार कई वर्षों से शव जलाए जा रहे हैं वहां पर जन सुविधाओं की भयानक कमी है। लोगों को सिर छुपाने की जगह नहीं है। न ही पीने के पानी की व्यवस्था है। लकड़ी एवं अन्य सामान बेचने वालों पर कोई नियंत्रण नहीं है और वे मनमानी कर रहे हैं। पूरे मणिकर्णिका घाट पर दबंग लोगों ने कब्जा कर रखा है। सैकड़ों टन राख प्रतिदिन गंगा में प्रवाहित हो रही है। यहां तक कि अधजले शवों को भी सीधे गंगा मे डाला जा रहा है। गंगा प्रदूषण की बात करने वाले यहां पर मौन धारण किए हैं। डोमराजा के मैनेजर धर्मवीर चौधरी के अनुसार जब भी ज्यादा गर्मी या ठंड बढ़ जाती है तब यहां एेसे हालात बन जाते हैं।
वैदिक काल से भी पहले की इस काशी नगरी को सिर्फ नंगी आखों से नहीं देखा जा सकता है, बल्कि इसे देखने के लिए अनुभूति की सूक्ष्म नजर चाहिए। शायद इसीलिए लोग इस नगरी को अलग-अलग ढंग से देख पाते हैं और महसूस करते हैं। अगर योगियों और तपस्वियों की बात करें, तो काशी में रहते हुए आत्म-साक्षात्कार के लिए हिमालय पर जाने की जरूरत नहीं होती है। महानतम योगी और सूर्य विज्ञान के प्रणेता महायोगी बाबा विशुद्धानंद परमहंस तमाम घोषित और तपस्थलियों के रूप में मशहूर स्थानों को छोडक़र खास अनुभूति के लिए काशी निवास करते थे। उनका स्पष्ट मानना था- ‘पूरी धरती पर काशी ऐसी इकलौती नगरी है, जहां सबसे ज्यादा ‘ब्रह्मांडीय ऊर्जा (कास्मिक एनर्जी)’ प्रवाहित होती रहती है। किसी अन्य तपस्थली की तुलना में इस नगरी में साधना करना अपेक्षाकृत कम समय में ज्यादा पा लेना है।’ इस नजरिए से भी काशी विशिष्ट आध्यात्मिक नगरी है। आम धारणा है कि काशी मरने के लिए है। यहां मौत मंगलकारिणी होती है। यानी यहां मरने पर मोक्ष प्राप्ति होती है, किंतु काशी खंड (96/24-25) में स्पष्ट कहा गया है कि काशी जीने के लिए है। यहां रहते हुए मोक्ष ही क्या, किसी भी चीज की आकांक्षा उचित नहीं होती, बल्कि काशीवास का महाफल समृद्ध करने के लिए स्वस्थ और सुंदर बने रहते हुए दीर्घजीवन की कामना करनी चाहिए। यहां मौत एक लीला मात्र है, जीवन का अंत नहीं। शरीर की भस्मी का काशी की गंगा में प्रवाहित करना क्षुद्रता से उबरकर विशालता में विलीन होने की ही इच्छा है। यही मृत्यु से अभय की इच्छा का अर्थ है। हालांकि छह अन्य पुरियां (नगर) मोक्ष क्षेत्र माने जाते हैं, लेकिन काशी में विशेष प्रक्रिया से मिलने वाला मोक्ष प्रकाश रूप में मिलता है। काशी का अर्थ ही प्रकाश, शुद्ध चैतन्य का प्रकाश है। यहां अंतिम क्षण बिताने की कामना स्वरूप का साक्षात् करना नहीं, अपितु स्वरूप में स्थित होना है और वह स्वरूप प्रकाश ही है। यहां मरने का अर्थ जीवन की अछोर अनंनता में सात्म होना है, मरना नहीं। आध्यात्मिक ही नहीं, अर्धचंद्राकार उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसी यह पवित्र नगरी सौंदर्य-बोध के लिहाज से भी काफी उत्कृष्ट साबित होती रही है।

साभार कैनविज टाइम्स

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