इंसान को इंसानियत प्रिय होनी चाहिए या हैवानियत? मां को अपना बच्चा प्रिय होना चाहिए या समाज? न्यायधीश को अपनी न्यायप्रियता प्यारी हो या कुर्सी?
प्रेमिका को अपना प्रेमी प्रिय होना चाहिए या सांसारिक वस्तुएं? कर्म क्षेत्र में कर्म प्रिय हो या अपनी सुविधा? ऐसे ही बहुत से सामान्य से प्रश्र हैं जिनका जबाव आप जानते होंगे लेकिन उन्हें मानते कितने लोग हैं गौर ये करना है। जी हां जिंदगी के इन उतार चढ़ावों में इंसान को कई अनोखे अनुभव सीखने को मिलते हैं। लेकिन ये बेमतलब के बड़े मतलब वाले जो प्रश्र ऊपर मैने पूछे हैं इनसे भी कई अनुभव मिले हैं। कि कैसे एक इंसान जिसे कार्र्य के क्षेत्र में सबका लीडर बनाया जाता है और कार्य को न्यायोच्चित ढंग से करने की वह भारी डोर उसे सौंपी जाती है। वही कार्य के बजाय सिर्फ अपनी लीडरशिप या कहें इगो को तबज्जो देता है। अपने अधीनस्थ कार्य करने वालों का आकलन वह कार्य कुशलता से नहीं अपने सम्बन्धों के आधार पर करता है। वह अपने छोटे छोटे से स्वार्थ के लिए वह दूसरों का बड़े से बड़ा नुकसान करने से पीछे नहीं हटता। वह योग्य कर्मचारियों को बात बात पर नीचा दिखाता है और उन्हें उनके मातहतों के आगे कमतर करने की कोशिश करता है। धीरे धीरे वह अपनी ईगो को सुपर ईगो में बदल लेता है। उसे हर उस व्यक्ति से खतरा नजर आने लगता है जो अपना कार्य ईमानदारी से कर रहा है। वह आसपास चाटुकारों की पूरी फौज जमा कर लेता है जो उसे दीमक की तरह चाट रही होती हैं और वह भांप भी नहीं पाता। वह हर छोटे बड़े फैसले चाटुकारों की सलाह से लेता है और चाटुकारों की नजर से ही सारे स्टाफ को देखना शुरू कर देता है। काम के अलावा सब कुछ करने वाले उसे टैलेण्टेड नजर आते हैं। ऐसे महान लोग पहले बॉस और फिर पूरे संस्थान को नष्टï करने में लग जाते हैं।
अपनी झूठी तारीफ में मस्त बॉस पर सुविधा और ख्याति का ऐसा जूनून चढ़ता है कि अपने मातहतों के अधिकार और उनकी सुविधाएं छीनने में परम आनंद की अनुभूति करने लगता है। कर्मचारियों को वेतन देना उसे खैरात लगने लगता है और चाटुकारों के लिए मोटी पगार भी उसे कम लगती है।
वह सत्ता के मद में चूर खुद को ऐसा समझता है मानो मदर टेरेसा के बाद उसी ने लोगों की सहायता की है। उसमें यह एक अलग ही प्रकार का स्वार्थ है जिसमें वह वफादारी भी पूरी तरह से निभाता है यानि जो लो¿¿¿ग उसकी चाटुकारिता करते हैं उनके लिए जान भी हाजिर? वाह इस प्रकार का वफादारी से भरा स्वार्थ। ऐसे ही स्वयं सुविधाओ से जुड़ी एक बड़ी गंभीर समस्या ने जब दिमाग में खतरनाक बीमारी का घर कर लिया हो और दिल परेशान रहने लगा हो, स्टाफ को शक की नजरों से देखने लगे। उस पर चौबीसों घंटे निगरानी का फार्मूला तैयार करने को बेचैन हो तो कैसे कोई संस्थान तरक्की कर सकता है। चमचों की बेवकूफी भरी सलाहों पर उछलने वाले अफसर संस्थान को कैसे तरक्की की राह पर ले जा पाएंगे यह चिंता का विषय है। अपने चमचों और स्वयं को ज्यादा से ज्यादा सुविधा दिलाने की दुविधा में फंसे लीडर को कैसे बाहर निकाला जाए कोई युक्ति आप लोगों के पास हो तो बताएं..
पूजा कौशिक

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