बदलते मौसम में सर्दी जुखाम की या वायरल की चपेट में आना आम बात है. लेकिन हमारे देश में लोग मेडिकल स्टोर में जाकर कई तरह की एंटीबायोटिक्स लेकर इन मर्जों से जल्दी निजात पाने की कोशिश करते हैं. हालांकि इससे लोगों को तात्कालिक तौर पर आराम जरूर मिल जाता है लेकिन हर कोई इसके दूरगामी प्रभावों को नज़रअंदाज कर देते हैं. डॉक्टर की सलाह के बगैर किसी भी बीमारी में एंटीबायोटिक्स का उपयोग करना घातक साबित हो सकता है. या कहें कि अनावश्यक एंटीबायोटिक्स का उपयोग करने से आपके स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं. हाल ही में हुए शोध के परिणामों के मुताबिक ऐसा करने से संक्रमण और एलर्जी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. जार्ज वाशिंगटन, कार्नेल और जांस हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि लोगों के बीच यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि एंटीबायोटिक्स हर मर्ज का इलाज है. बिना चिकित्सकों की सलाह के इन्हें बिल्कुल नहीं लेना चाहिए क्योकि एंटीबायोटिक्स वायरस संक्रमण में असर नहीं करती. शोध के अनुसार अधिकांश मरीजों का मानना था कि एंटीबायोटिक्स लेने से बीमारी पर जल्दी असर होता है और उनकी सेहत पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है. शोध के मुताबिक मरीजों के विश्‍वास के विपरीत एंटीबायोटिक्स का अत्याधिक और अनावश्यक प्रयोग एलर्जी और संक्रमण का खतरे को बढ़ा देता है. अनुपयुक्त एंटीबायोटिक उपचार और एंटीबायोटिक्स का ज्यादा प्रयोग प्रतिरोधी जीवाणुओं के उभरने का एक मुख्य कारक है. समस्या तब और जटिल हो जाती है, जब व्यक्तिचिकित्सकीय निर्देशों के बिना एंटीबायोटिक्स लेना शुरू कर देता है. कृषि में एंटीबायोटिक का गैर चिकित्सकीय उपयोग होता है. एंटीबायोटिक दवाओं में बार-बार ये निर्देश दिये जाते हैं कि कहां इनकी जरूरत नहीं हैं, या उपयोग गलत है या दी गई एंटीबायोटिक मामूली असर वाला है. आज से तकरीबन 86 साल पहले महान वैज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने दुनिया को पेनिसिलीन नामक एंटीबायोटिक की खोज का तोहफा देकर चिकित्सीय क्षेत्र में एक चमत्कारी काम किया था. पेनिसिलिन और एंथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबायोटिक्स, जो एक समय चमत्कारिक दवा मानी जाती थी, उनके ज्यादा प्रयोग की वजह से 1950 के दशक के बाद लोगों के शरीर में इनके प्रतिरोधक तत्व उभरने शुरू हो गये है. मौजूदा समय में एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध इस्तेमाल होने लगा है. आम इंफेक्शन से पीड़ित मरीजों के इलाज में इसका बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जो कि बेहद खतरनाक है. अनुपयुक्त एंटीबायोटिक उपचार एंटीबायोटिक दुरुपयोग का एक आम रूप है. उदाहरण के तौर पर हम आम सर्दी-जुकाम के लिए वायरल संक्रमण दूर करने वाली एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, जबकि आम सर्दी-जुकाम पर वह बेअसर होती हैं. एंटीबायोटिक का इस्तेमाल सिर्फ बैक्टीरियल इन्फेकशन पर काबू पाने के लिए ही किया जाता है. आम वायरल समस्याएं जैसे कि नज़ला, जुक़ाम, साधारण दस्त आदि रोगों के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन स्थिति यह है कि कई बीमारियों में एंटीबायोटिक्स का असर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. पूरी दुनिया में हजारों एंटीबायोटिक्स हैं, जिसमें कई बेअसर होने की कगार पर हैं. दुनिया भर में एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है. वे खतरनाक जीवाणु जो पहले एंटीबायोटिक दवाओं से खत्म हो जाते थे, वे ही जीवाणु उस दवाई के लिए प्रतिरोधक हो गये हैं. एंटीबायोटिक्स सिर्फ मान्यता प्राप्त डॉक्टरों की सलीह पर ही लेनी चाहिए. भारत के संबंध में डब्ल्यूएचओ के एक अध्ययन के मुताबिक यह बात सामने आयी है कि यहां के आधे से अधिक लोग दवाओं के नकारात्मक पक्ष को दरकिनार करते हैं और बिना डॉक्टरी परामर्श के एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करते हैं. जो लोग एंटीबायोटिक दवाओं का डोज से अधिक और अनियमित रूप से सेवन कर रहे हैं, उनमें दवा का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है इससे अधिक एंटीबायोटिक लेने से शरीर एंटीबायोटिक का आदी हो जाता है और बड़ी जरूरतों के समय वे बअसर हो जाती है. भारत जैसे विकासशील देशों में, बदलती जीवन शैली दवाओं के आकस्मिक और लापरवाह उपयोग करने के लिए ज़िम्मेदार है. यहां एंटीबायोटिक दवाओं के प्रसार के पीछे का कारण बढ़ती आय और सामर्थ्य हैं. डॉक्टर के पर्चे के बिना दवाई की उपलब्धता, स्वतंत्र रूप चिकित्सकों का एंटीबायोटिक दवाओं का निजी हित के कारण लिखना और साफ-सफाई और टीकाकरण की कमी से इन्फेक्शन का बार-बार होना. भारत में बैक्टीरियल डिजीज यानि बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियां तेजी से बढ़ रही है जिनके रोकथाम के लिए एंटीबायोटिक्स का उपयोग हो रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में एंटीबायोटिक्स का उपयोग इतनी तेजी से बढ़ा है, कि उसके दुष्परिणाम दवाओं की गुणवत्तत्ता पर हावी हो रहें हैं. कई तरह की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि एंटीबायोटिक्स का अनावश्यक उपयोग हो रहा है, बिना विवेक के मरीजों को एंटीबायोटिक्स दवायें दी जा रही हैं इस वजह से मरीज को साइड इफेक्ट्स का सामना तो करना ही पड़ता है साथ ही इन दवाओं के प्रति विषाणुओं में प्रतिरोधक क्षमता (ड्रग रेसिस्टेंस) भी विकसित हो रही है. इन दवाओं के लगातार सेवन से जीवाणु अब इतने ताकतवर हो गये हैं कि उन पर कई एंटीबायोटिक दवाओं का असर होना बंद हो गया है. मामले की गंभीरता को समझते हुए भारत में भी बिना जाने समझे एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को रोकने की कवायद में तेजी लाने की ज़रूरत है. एंटीबायोटिक अति प्रयोग से प्रभावित होने वाली सबसे आम बीमारियों में से कुछ हैं ,अस्पताल में संक्रमण विशेष रूप से वो जिनसे सेप्सिस का खतरा हो, निमोनिया और यूटीआई ( यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन).जरूरत से ज्यादा और अनियमित दवा खाने से ड्रग रेजिस्टेंट का खतरा है, किसी बैक्टीरिया पर बार-बार एंटीबायोटिक का हमला होता है, तो कुछ समय बाद वे इसके आदि हो जाते हैं. फ़िर बैक्टीरिया उस एंटीबायोटिक दवा से नहीं मरते हैं. क्योंकि वे इन दवाओं के प्रतिरोधी बन जाते है. इस स्थिति को ड्रग रेजिस्टेंस कहते है.इसके अलावा इंसानों में डायरिया, कमजोरी, मुंह में संक्रमण, पाचन तंत्र में कमजोरी, योनि में संक्रमण होने की खतरा अधिक हो जाता है. इसके अलावा किडनी में स्टोन होने, खून का थक्का बनने, सुनाई न पड़ने आदि कई गंभीर शिकायतें बढ़ जाती है. इससे कई लोगों को एलर्जी भी हो जाती है. प्रिगनेंट महिला और वे लोग जिन्हें लीवर की बीमारी हो, उन्हें खासकर बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक दवा नहीं लेनी चाहिए. बिना डॉक्टर के सलाह और अनियमित एंटीबायोटिक के सेवन से शरीर पर इसका प्रभाव कम हो जाता है. दवा का असर न होने पर व्याक्ति जब डॉक्टर के पास इलाज कराने जाता है, तो भी उसे इन दवाओं से आराम नहीं मिलता. डॉक्टर को जब तक मरीज की बीमारी का पता चलता है, तब तक बीमारी बढ़ चुकी होती है, जिसका खामियाजा उसे महंगा इलाज कराकर भुगतना पड़ता है.2

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