krishnakant chnr युद्ध को अधर्म पर धर्म की जीत मानते हैं. पांडवों ने श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में कौरवों को पराजित किया था, लेकिन महाभारत के बाद क्या हुआ था ? क्या वाकई इस धर्मयुद्ध के बाद शांति और अमन कायम हो गया था ? श्री कृष्ण की बाल लीला, रास लीला के बारे में हम पढ़ चुके हैं, लेकिन उनकी विवशता और आत्मग्लानि के बारे में शायद बहुत कम जानकारी है हमें. जो समुद्र श्री कृष्ण का पांव धोता था वो भी महाभारत युद्ध के बाद उनसे नाराज रहने लगा था. महाभारत युद्ध के बाद सबको लगा था हर तरफ अमन और शांति होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि पांडवों के राज्य में अधर्म और अशांति की पराकाष्ठा देखने को मिल रही थी. राज्य में सूखा आया हुआ था और युधिष्ठिर अपनी जिम्मेदारियों से भागते फिर रहे थे. श्री कृष्ण एक भगवान से एक विवश इंसान बन गए थे, इतने विवश हो गए कि अपने राज्य और प्रजा किसी को भी नहीं बचा सके. इतना विवश कि दुर्वाषा ऋषि के समक्ष ऐसा कुछ किये जो लोक मर्यादा से बाहर की बात थी. महाभारत युद्ध के बाद उन्हें ये बात ताउम्र सालती रही कि वो चाहते तो महाभारत युद्ध रुकवा सकते थे. उनकी विवशता की कथा पढ़कर बहुत दुःख और आश्चर्य होता है कि उन जैसे के साथ भी ऐसा हो सकता है. उनकी व्यथा – कथा इतनी घोर दुखद है कि किसी का भी रोंगटे खड़े हो जाय. ऐसा भयानक कि कठोर से कठोर आदमी को भी भीतर तक कंपकपा देने वाला. अनेक कोशिश के बावजूद वो कई बातें नहीं रोक पाए और परिस्थिति के सामने विवश हो गए.

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