कुम्भ उत्सव तब से अब तक एक नज़र

वो कहते हैं न एक डुबकी लगाने से सारे पाप नष्टï हो जाते हैं। यह विश्वास कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। उस पर कुम्भ स्नान की बात हो तो आस्था और बढ़ जाती है। न जाने कितनी सदियां बीत गईं पर कुम्भ का महत्व वहीं का वहीं है बल्कि गुजरते समय के साथ इसकी आस्था में बढ़ोतरी ही हुई है। कुम्भ की आस्था की छीटे अब सात समंदर पार भी लोगों को भिगोने लगीं हैं। इसके चलते ही हर कुम्भ में लाखों की संख्या में  श्रद्धालु शाही स्नान में शामिल होने आते हैं। यकीनन यह उत्सव, यह आयोजन या कहे आस्था का सैलाब भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रमाण है। इसकी झलक हर बारह वर्ष बाद गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर देखने को मिलती है। वर्ष 2013 में यह शुभ अवसर एक बार फिर आने वाला है। इस आयोजन की तैयारियां इलाहाबाद शहर में शुरू भी हो गई हैं। हाईटेक व्यवस्थाओं से लैस मेले के आयोजन की बात कही जा रही है। वास्तव में कुम्भ के आयोजन में भव्यता प्रशासनिक व्यवस्था से ही आई है| पेश है एक रिपोर्ट…

इलाहाबाद। भारत की हृदयस्थली, सोम वरूण और प्रजापति ब्रह्मïा की तपोभूमि, ऋषियों-मुनियों की यज्ञ स्थली इलाहाबाद में गंगा-यमुना और पौराणिक सरस्वती नदियों के संगम तट पर कुम्भ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से हुआ इस बारे में विद्वानों में अनेक भ्रांतियां हैं। कोई इसे समुद्र मंथन से जोड़ता है तो कोई गुप्तकाल से। आयोजन का कारण कुछ भी रहा हो पर कुम्भ की आस्था निरंतर बढ़ती गई। समय के साथ-साथ मेला व्यापक होता गया। लेकिन मेले का व्यवस्थित रूप वर्ष 1954 हादसे के बाद ही देखने को मिला। जब मेले की कमान प्रशासन के हाथों में आई|

15 अगस्त 1947 को देश आजद हुआ था। इसकी खुशी का इजहार असल में वर्ष 1954 में पड़े इलाहाबाद के कुम्भ मेले में ही दिखाई दिया था। करीब 50 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने आजादी की डुबकी लगाई थी। लेकिन इसे विडम्बना ही कहेंगे कि इसी कुम्भ के दौरान कुम्भ के इतिहास में आज तक की सबसे बड़ी घटना घट गई। जब पल भर में कुम्भ का आनंद सिसकियों में बदल गया था। इस मेले की अव्यस्था भी इसी समय उभर कर आई थी। हुआ यूं था कि भारत के प्रथम राष्टï्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी मेले के शाही स्नान के लिए आ रहे थे। लोगों में उन्हें देखने की उत्सुकता थी। इनके आगमन पर नागा संयासियों के जुलूस में अचानक भगदड़ मची और जो एक बार गिरा वह दोबारा उठ न सका। इसकी वजह भगदड़ के दौरान हुई बारिश भी रही। फिसलन के चलते लोग गिरते रहे और कुचलते गए। इस हादसे में भारी संख्या में श्रद्धालु असमय काल के गाल में समा गए थे। इस हादसे के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय कुम्भ मेले की व्यवस्था पर गम्भीर हुआ था। तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति कमला कांत वर्मा की अध्यक्षता में एक जांच आयोग बना और उसकी रिपोर्ट के आधार पर मेला व्यवस्थित करने का आदेश हुआ। यही रिपोर्ट कुम्भ और अद्र्धकुम्भ मेला व्यवस्था की आधारशिला बनी। मुख्य स्नान पर्वों पर महत्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई। इसके बाद प्रशासनिक हाथों में मेले की कमान होने से मेला व्यवस्थित होने लगा। मेले में सुरक्षा से लेकर चिकित्सा, बिजली, पानी, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं मिलने लगी। भूले-भटके शिविर ने बिछड़ों को मिलाना शुरू किया। यही नहीं संत समाज के सत्संग से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का चलन भी शुरू हो गया। पहले स्नान तक सिमटा मेले में विभिन्न देशों और भारत के विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों का मेल भी दिखा। मेला प्रशासन की कोशिशों के फलस्वरूप श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी तो हुई ही,

मेले की व्यवस्थाओं में आधुनिकीकरण का समावेश हुआ।

बदलाव की एक बानगी सन् 1977 में लगे कुम्भ में भी देखने को मिली। इस कुम्भ को ज्योतिषाचार्यों ने 144 वर्ष बाद पडऩे वाला अमृतयोग बताया था। जिसमें अपार भीड़ आने का अनुमान लगाया गया था। इसी के मद्देनजर संगम स्नान स्थल का विस्तार किया गया। प्रथम बार मेले का विस्तार नागबासुकी, शंख माधव और अरैल में किया गया। इस कुम्भ में जुटे श्रद्धालुओं की संख्या गिनीज बुक में भी दर्ज हुई थी। अमावस्या के दिन तो जलवृष्टि होने के बाद भी एक करोड़ से अधिक श्रद्धालु यहां पहुंचे थे। इस कुम्भ के दौरान इंदिरा गांधी भी साधु-समाज सम्मेलन में भाग लेने आई थीं|

एक बार फिर बड़े अंतराल के बाद वर्ष 2001 के कुम्भ मेले में व्यवस्थाएं बड़ीं। इस कुम्भ में पहली बार इंटरनेट पर जानकारी देने की सुविधा बनाई गई। इसका श्रेय तत्कालीन मेला आयुक्त सदाकांत को जाता है। इस कुम्भ में सात करोड़ से अधिक श्रद्धालु आए थे जिसमें एक लाख से ज्यादा विदेशी थे|

अब वर्ष 2013 में होने वाले कुम्भ की तैयारी चल रही है। शासन-प्रशासन की मंशा है कि 21 वीं सदी का यह कुम्भ हाईटेक व्यवस्थाओं से लैस हो। इस दिशा में काम भी शुरू हो गया है। खासकर पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पक्केघाट इस कुम्भ की विशेषता होंगे और भी तैयारियां चल रही हैं। रेलवे की अपनी तैयारी है। कई नये निर्माण और स्थाई निर्माण इस कुम्भ में होने जा रहे हैं। आज की तारीख में कुम्भ मेले की जिम्मेदारी 22 विभाग मिलकर उठा रहे हैं। मेले की प्रशासनिक व्यवस्था अलग है। अच्छी-खासी धनराशि मेले के आयोजन में सरकारें व्यय कर रही हैं। इस कुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं की अपार संख्या के मद्देनजर मेला क्षेत्र का भी विस्तार किए जाने की बात चल रही है। सबकुछ ठीकठाक रहा तो करीब 6 हजार हेक्टेयर भूमि पर मेला क्षेत्र बसाया जाएगा|

जबकि कुम्भ मेले के पुराने इतिहास पर नजर डालें तो वैदिक और पौराणिक काल में कुम्भ व अद्र्धकुम्भ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था। कुछ विद्वान जरूर कहते हैं कि कुम्भ के सुव्यवस्थित होने की शुरूआत के तथ्य सम्राट शीलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई के समय से प्राप्त होते हैं। साथ ही सबसे पहले श्रीमद् आघ जगतगुरू शंकराचार्य और उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य द्वारा दसमानी सन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था करने का उल्लेख मिलता है।

आस्था के साथ बढ़ी भीड़

वर्ष 1918 में जब कुम्भ मेले का आयोजन हुआ तो यहां स्नान करने के लिए 30 लाख यात्री आए थे। जिसमें 60 हजार वैरागी थे और 30 हजार शाही स्नान के जुलूसों में शामिल हुए थे। इसके बाद प्रत्येक बारह साल पर होने वाले कुम्भ मेले में संख्या बढ़ती गई। लेकिन एक समय वह भी आया जब कुम्भ मेले में बहुत कम श्रद्धालू आए। यह असर वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध तथा स्वतंत्रता आंदोलन छिड़ जाने से पड़ा था। इसके बाद वर्ष 1954 में 50 लाख श्रद्धालु आए। सन् 1966 में 60 लाख श्रद्धालुओं ने कुम्भ का शाही स्नान किया। वर्ष 1977 में श्रद्धालुओं की संख्या करोड़ों में थी। 1989 और 2001 में इस संख्या में कई गुना इजाफा हो गया। खासतौर पर सात समंदर पार से श्रद्धालु बड़ी संख्या में आने शुरू हुए। इस बार भी आठ करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है|

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