दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार मधुरेश सिंह की फेसबुक वाल से साभार
अरे, है कोई डॉक्टर …?
यह खबर इक्कीसवीं सदी में आदमी के विकास को बेहद शर्मनाक चुनौती है। पिछले कई साल से उत्तर बिहार के खासकर मुजफ्फरपुर इलाके में बच्चे थोक भाव में मर रहे हैं और उनकी मौत के कारण तक का पता नहीं है।
आदमी, चांद पर तो पहुंच गया लेकिन धरती पर आदमी की जान नहीं बचा पा रहा है। क्या यही 21 वीं सदी में आदमी, उसका और चिकित्सा विज्ञान का विकास है?
गर्मी आते ही बच्चों का मरना शुरू हो जाता है। ये मुख्यत: गरीबों के बच्चे हैं। पिछले एक हफ्ते में मुजफ्फरपुर में दर्जन भर बच्चों की मौत हो चुकी है। अस्पताल में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
सबसे दिलचस्प कि डॉक्टर इस अज्ञात बीमारी को एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रॉम) मानकर पीडि़तों का इलाज कर रहे हैं। अब बीमारी का पता लगाने के लिए लखनऊ के इंस्टीच्यूट ऑफ टॉक्सिस रिसर्च सेंटर में शोध करने की बात कही जा रही है। इससे पहले कई बार विशेषज्ञों की टीम ने बीमारी का पता लगाने की कोशिश की लेकिन …!
इस बीमारी से 2013 में 38 बच्चों की मौत हुई। 2012 में 225 बच्चे मरे और
2011 में 150।
सबकुछ खुलेआम है। आदमी, उसकी सरकार …, सबकुछ। कोई (डॉक्टर) है, जो इन बच्चों को बचाएगा?madhuresh sing

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