न्यूज नेटवर्क प्रतिनिधि मोहित सिंह की खास रिपोर्ट
naqvi-265_1327035380सिकन्दर बख्त और आरिफ मोहम्मद खां के भारतीय जनता पार्टी से विदा होने के बाद संगठन से लेकर सत्ता तक अल्पसंख्यक समुदाय से चेहरे के तौर पर शून्यता के दौर से गुजरती रही भारतीय जनता पार्टी अब किसी नये रास्ते की तलाश में नजर आ रही है। लोग आते रहे जाते रहे लेकिन कोई चेहरा ऐसा उभरकर नहीं आया जिसका मुस्लिम समाज में अपना एक जनाधार हो या वह अपनी तरफ मोड़ पाया हो। लम्बे समय तक मुख्तार अब्बास नकवी भी संघर्ष करते रहे जब मुख्तार पहली बार सांसद बने तो अटल सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने । इतना सब होने के बावजूद नकवी की छवि एक कट्टïरवाद मुस्लिम नेता की नहीं बन सकी बल्कि वह स्वंय को भाजपा और एक उदारवादी मुस्लिम नेता को रूप में ही स्थापित करने में लगे रहे।
भाजपा सत्ता से बाहर हुर्ई तो नकवी ने भी स्वंय को बदला पार्टी और संघ में वह संगठन के शिखर पुरूषों के करीब पहुंचते गये। इसी बीच बिहार से एक युवा चेहरे का भाजपा में प्रवेश हुआ नाम था शाहनवाज हुसैन जो आम तौर पर मुस्लिम समाज में एक कट्टïर पंथी मुसलमान के तौर पर जाने गये शायद मुख्तार अब्बास नकवी को शाहनवाज की यहां चाल और चेहरा पंसद नहीं आया। शायद यही कारण था कि मुख्तार अंदर खाने से शाहनवाज हुसैन का विरोध करते रहे और उनके जनाधार को कमजोर करने के लिये संगठन में अन्दरूनी तौर पर सवाल उठाते रहे। उधर शाहनवाज हुसैन भी मुख्तार केउदारवादी मुस्लिम चेहरे को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे। दोनों एक दूसरे का विरोध अंदर ही अंदर करते रहे लेकिन दोनों ने ही इतना सन्तुलन जरूर बनाकर रखा कि उनका सत्ता और समाज का संघर्ष पार्टी से बाहर निकल सडक़ों और चौराहे तक नहीं पहुंचा लेकिन शाहनवाज कई बार अनौपचारिक रूप से इतना जिक्र जरूर करते रहे कि पार्टी मुख्तार को कुछ ज्यादा ही महत्व दे रही है। 2014 से चुनाव की तैयारी में मुख्तार अब्बास नकवी की मुख्य भूमिका रही यह कहा जा सकता है कि नकवी संगठन के मुस्लिम चेहरे के तौर पेश किये गये। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब मोदी की लहर के चलते हुये प्रचण्ड बहुमत आया लेकिन इस लहर में शाहनवाज हुसैन जैसी जनाधार वाला कार्यकर्ता चुनाव हारता है तो इसे किस रूप में देखना चाहिए इस पर शाहनवाज कुछ खुल कर तो नहीं बोलते है लेकिन संकेतों के आधार पर वह इतना जरूर कहते हैं कि मेरे साथ परदे के पीछे से कुछ खेल जरूर हुआ है वह नकवी का नाम भले ही न लें लेकिन उनके निशाने पर तो मुख्तार अब्बास नकवी ही हैं। शाहनवाज के संकेतों के आधार पर जो तस्वीर उभर रही है वह आरोप गलत नहीं है। यह तो सच है कि दिल्ली से लेकर झण्डेवालान और झण्डेवालान से लेकर नागपुर और गुजरात तक मुख्तार की मुख्तारी कायम है। नरेन्द्र मोदी जब अपने मंत्रीमंडल के लिये चेहरे तलाश रहे थे तो पहले ये चर्चा हुई थी कि शाहनवाज को मंत्रीमंडल में जगह दी जा सकती है बाद में उन्हें राज्य सभा भेजा जा सकता था। यहां भी मुख्तार अब्बास नकवी ने अपना खेल खेल दिया उन्होंने शाहनवाज का तो रास्ता
रोका ही साथ ही नजमा हेपतुल्ला को भी इस परिदृश्य से लगभग दूर कर दिया। क्या ये माना जाना चाहिए कि मुख्तार संगठन और सत्ता में अपना वर्चस्व कायम रखने के लिये किसी के भी पर कतर सकते हैं। दअसल ये इसलिये भी है कि मुख्तार केन्द्र के साथ साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी अपना दबदबा कायम रखता चाहते हैं। दरअसल उनकी नजर 2017 के विधानसभा चुनावों पर है। मोदी लहर के चलते इस बार भाजपा ने मुस्लिम बाहुल्य संसदीय क्षेत्रों में बड़ी जीत हासिल की है जाहिर सी बात है कि इसका श्रेय मुख्तार स्वंय लेना चाहते हैं उत्तर प्रदेश में वह एक अलग माहौल खड़ा करने के मूड में हैं उनकी नजर किसी अहम जगह पर है इसके लिये वह किसी को भी अपने रास्ते से हटा सकते हंै उनकी महत्वकांक्षा आने वाले समय में उनके लिये कहीं जी का जंजाल न बन जाये। नजमा हेपतुल्ला मोदी से आस लगाये बैठी हैं। उधर शाहनवाज को भी उम्मीद थी लेकिन मुस्लिम राजनीति के ये दोनों चेहरे इस बात को अच्छी तरह से समझते हंै कि नकवी का विरोध करके उन्हें कुछ हासिल नहीं होना है इसलिये उनके पास सिर्फ बैठकर प्रतीक्षा करने के आलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.