उत्तर प्रदेश में आगामी कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी पूरी तैयारी कर रही हैं कि वह किसी भी हाल में यूपी की सत्ता तक पहुंच जाएं. भारतीय जनता पार्टी यहां अपने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर मुखरता से आगे बढ़ रही है, वहीं समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस पार्टी भी सॉफ्ट हिंदुत्व के मुद्दे को ही लेकर आगे बढ़ रही है.
यह बातें कोई हवा हवाई नहीं हैं. इसका नजारा दिखा मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना में, यानि अपने विधानसभा क्षेत्र में किसी एक स्थल को चुनकर उसका विकास करने में. इस योजना के तहत 373 विधानसभा क्षेत्रों के स्थलों को विकास के लिए चिन्हित किया गया है.
इस योजना के तहत हर विधायक को अपने विधानसभा क्षेत्र के एक पर्यटन स्थल को चुनना होगा और उसका सौंदर्यीकरण करना होगा. उसके लिए उसे इस योजना के तहत 50 लाख की राशि आवंटित की जाएगी और बाकी की अतिरिक्त धनराशि उसे विधायक निधि और सीएसआर निधि से मिलेगी. सरकार ने इस योजना के बजट के लिए 180 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है.
इस योजना में सबसे खास बात जानते हैं क्या है, विधायकों द्वारा अपने विधानसभा क्षेत्र में चुने गए स्थल. 373 विधानसभा क्षेत्रों के प्रतिनिधियों में ज्यादातर लोगों ने हिंदू धार्मिक स्थलों को सौंदर्यीकरण के लिए चुना. और इन विधायकों में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अधिकांश विधायक शामिल हैं.
आलाकमान से विधायकों तक पहुंचा सॉफ्ट हिंदुत्व का मंत्र
देश और प्रदेश की राजनीति बीते कुछ सालों में बहुत बदल गई है. एक वक्त था जब कुछ एक पार्टियों को छोड़कर हिंदुस्तान की तमाम राजनीतिक पार्टियां अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण पर जोर दिया करती थीं. लेकिन अब वही राजनीतिक पार्टियां धीरे-धीरे सॉफ्ट हिंदुत्व के रास्ते पर चलने को मजबूर हो गई हैं. 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो या फिर 2019 का लोकसभा चुनाव, इन दोनों चुनावों में दिखा कि किस तरह विपक्षी पार्टियां अब धीरे-धीरे सॉफ्ट हिंदुत्व का चोला ओढ़कर जनता के बीच जाने लगी हैं.
हालांकि उस वक्त इसका ज्यादा असर इन पार्टियों के परफॉर्मेंस पर दिखा नहीं और दोनों ही चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से विपक्ष को करारी हार झेलनी पड़ी. लेकिन अब इन राजनीतिक पार्टियों ने अपने एजेंडे में थोड़ा सा बदलाव किया है. पहले जहां सिर्फ पार्टी के आलाकमान ही सॉफ्ट हिंदुत्व का झंडा लिए दिखाई देते थे, अब उनका हर एक विधायक इस झंडे को लेकर अपने विधानसभा क्षेत्र में घूमता दिखाई दे रहा है.
सॉफ्ट हिंदुत्व पर चलने को क्यों मजबूर हुईं राजनीतिक पार्टियां
भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस पार्टी. उत्तर प्रदेश में यह चार बड़ी राजनीतिक पार्टियां मानी जाती हैं. इनमें भारतीय जनता पार्टी जहां मुख्य रूप से शुरू से ही अपने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे को आगे बढ़ा रही है. वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, जातीय समीकरणों के आधार पर यूपी में चुनाव लड़ती हैं. कुछ हद तक कांग्रेस भी यही करती है. समाजवादी पार्टी जहां एम-वाई (मुस्लिम + यादव) के समीकरण से चुनाव लड़ती है. वहीं बहुजन समाज पार्टी (दलित+मुस्लिम) के समीकरण से चुनाव लड़ती है.
लेकिन इन राजनीतिक पार्टियों को पता चल चुका है कि प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी जो हिंदू है अब धीरे-धीरे जातिवाद से उठकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट देने लगी है. उसके साथ-साथ ही मुस्लिम समाज भी अब पहले की तरह एकजुट होकर एक मत से वोट नहीं देता है. उसमें भी काफी बिखराव देखा गया है. 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी का लगातार जीतना भी इन्हीं कारणों से हो रहा है. क्योंकि बीजेपी इन तमाम राजनीतिक पार्टियों को हिंदू विरोधी राजनीतिक पार्टी सिद्ध करने में लगी रहती है. इसीलिए ये राजनीतिक पार्टियां और उनके विधायक अब अपने आप को हिंदू समर्थक घोषित करने में लगे हुए हैं.
किस पार्टी के विधायक ने क्या चुना
द हिंदू में छपी एक खबर के अनुसार मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्धन योजना के तहत 33 समाजवादी पार्टी विधायकों में से 29 विधायकों ने हिंदू मंदिरों और आश्रमों के साथ-साथ स्थानीय हिंदू देवी-देवताओं और बाबाओं को समर्पित स्थलों को सौंदर्यीकरण के लिए चुना. वहीं बहुजन समाज पार्टी के 16 विधायकों में से 13 ने अलग-अलग हिंदू धार्मिक स्थलों को सौंदर्यीकरण के लिए चुना. इन विधायकों में मुख्तार अंसारी जैसे बाहुबली विधायक का भी नाम है, जिसने एक हिंदू धर्म स्थल को सौंदर्यीकरण के लिए चुना. कांग्रेस पार्टी यहां थोड़ा सा अलग करते हुए नजर आई, उसके सात विधायकों में से तीन ने दो मंदिरों, दो जल निकायों और एक अंबेडकर पार्क को इस योजना के तहत सौंदर्यीकरण के लिए चुना.
वहीं कांग्रेस के एक विधायक ने कानपुर में एक गोल्फ कोर्स के पास की एक साइट को सौंदर्यीकरण के लिए चुना. यही नहीं जो निर्दलीय विधायक हैं, उन्होंने भी हिंदू धार्मिक स्थलों को ही सौंदर्यीकरण के लिए चुना. अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव हों, चाहे निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया हों, विनोद सरोज हों या अमन मणि त्रिपाठी हों या फिर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर. इन सभी ने भी अपने विधानसभा क्षेत्र के किसी मंदिर या धाम को ही सौंदर्यीकरण के लिए चुना.
हिंदुत्व के खिलाफ बोलने वालों पर राजनीतिक पार्टियां कर चुकी हैं कार्रवाई
बीते साल जब राम मंदिर का मुद्दा चरम पर था, समाजवादी पार्टी के समाजवादी पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पद पर तैनात लोटन राम निषाद ने भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठा दिया था. उन्होंने कहा था, ‘अयोध्या में राम मंदिर बने या कृष्ण मंदिर उससे मुझे कोई लेना देना नहीं है. मेरी आस्था उनमें है जिनकी वजह से मुझे सीधा लाभ मिला. मैं बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, कर्पूरी ठाकुर, महात्मा ज्योतिबा फुले और छत्रपति शाहूजी महाराज को अपनी आस्था मानता हूं.’ इस बात पर अखिलेश यादव नाराज हुए और उन्होंने लोटन राम निषाद की पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी. कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी भी अपने नेताओं को यह नसीहत देते हुए दिखाई देती हैं कि वह बहुसंख्यक समाज की आस्था का पूरा ख्याल रखें और उसके खिलाफ कोई टीका टिप्पणी ना करें.

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