zafarपीटीआई के वरिष्ठ पत्रकार जफर इरशाद की फेसबुक वाल से साभार
आज़ादी के बाद यह शायद पहला चुनाव होगा जिसने मुस्लिम वोट बैंक के मिथक को तोड़ा..और मुसलमानो के नाम पर मलाई खाने वाले नेताओं और मौलानाओं की दुकाने बंद करा दी..लोकतंत्र के लिहाज़ से देखे तो यह एक अच्छी बात है, क्योंकि देश की तरक्की में सब की बराबर की भागीदारी होती है. जितना टैक्स आप देते हो उतना हम, जितनी मेहनत से आप अपना काम करते हो उतनी मेहनत से हम..फिर किस बात का मुस्लिम वोट बैंक.? अभी भी वक्त है देश के मुसलमानो को चाहिए की वो देश के विकास में मिलजुल कर भागीदारी करें और किसी मुस्लिम वोटों के ठेकेदार के बहकावे में न आये.. क्योंकि यहीं वक्त का तकाज़ा और मांग हैं, ये देश जितना रामलाल का है, उतना ही जुम्मन मियां का भी…

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