गोरखपुर से लौटकर मोहित सिंह की रिपोर्ट
वर्ष 1989 से गैर भाजपा दलों के लिए चुनौती बनी गोरखपुर संसदीय सीट की डगर इस बार कुछ और कठिन दिख रही है। 1996 तक गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ और 1998 से उनके उत्तराधिकारी yogi यहां से जीतने आ रहे हंै। योगी ने हिन्दुत्व की राजनीति और विकास को मिलाकर ऐसा हथियार तैयार किया है कि गैर भाजपा दल उसकी काट आज तक नहीं खोज पाए। इस बार लड़ाई इसलिए और कठिन हो गई है कि योगी को पीएम पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी का भी साथ मिल गया है। योगी की पांचवीं जीत रोकने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा मैदान में ‘आपÓ भी है। सबने पूरी ताकत झोंक दी है। मामला बनता न देख अब ध्रुवीकरण का दांव खेला जा रहा है, जो संयोग से योगी और भाजपा का भी प्रिय दांव है। इस बार योगी को टक्कर देने के लिए सपा ने अपनी विधायक राजमति निषाद, बसपा ने पूर्व विधायक रामभुआल निषाद, कांग्रेस ने पूर्व ब्लाक प्रमुख अष्टभुजा तिवारी और ‘आपÓ ने गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो0 राधेमोहन मिश्र को मैदान में उतारा है। योगी या महंत अवैद्यनाथ के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस सीट के निषाद वोट है। निषादों के लोकप्रिय नेता जमुना निषाद इसी वोट बैंक के बूते कांटे की लड़ाई लड़ा करते थे। 1998 में वह योगी से महज 26 हजार वोटों से पीछे थे तो 1999 में यह अंतर घट कर सिर्फ 7339 रह गया। इसके बाद लोग कहने लगे थे कि अगली बार योगी की हार तय है। विरोधी आशान्वित थे तो योगी भी चिंतित। अंतत: उन्होंने इसकी ऐसी काट खोजी कि 2004 में जीत का अंतर कई गुना बढक़र 1.41 लाख हो गया। इसके बाद जमुना निषाद सपा छोड़ बसपा में चले गए और सांसदी का सपना छोड़ विधायक बन गए। 2009 में जमुना जैसी हस्ती तो मैदान में नहीं उतरी, लेकिन बसपा ने प्रभावशाली नेता पं0 हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनयशंकर तिवारी और सपा ने फिल्म स्टार मनोज तिवारी को उम्मीदवार बनाया। निषाद उम्मीदवार न होना योगी के पक्ष में गया और उन्होंने बसपा को 2.20 लाख मतों से हरा कर एक रिकॉर्ड बना दिया। निषाद वोट बैंक की इसी ताकत को सपा-बसपा ने योगी के खिलाफ अचूक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की सोची। रणनीति यही कि निषाद तो अपने साथ रहेंगे ही। उनके कारण अल्पसंख्यक भी साथ आ ही आएंगे। इससे योगी को हराना संभव हो जाएगा। लेकिन चूक यह हो गई कि दोनों ने ही निषाद उम्मीदवार उतार दिया। सपा ने जमुना निषाद की पत्नी एवं विधायक राजमति निषाद को तो बसपा ने पूर्व विधायक रामभुआल निषाद को प्रत्याशी बनाया। अब निषाद वोटों का बिखराव शायद ही कोई रोक पाए। संभवत: यही कारण है कि योगी के वार रूम के सदस्य डॉ0 प्रदीप राव कहते हैं कि अबकी चुनाव हारने-जीतने के लिए नहीं, मार्जि और बड़ी करने के लिए लड़ा जा रहा है। विकास के मोर्चे पर खुद को खरा साबित करने के लिए योगी अपनी उपलब्धियों के रूप में रामगढ़ताल परियोजना, बीआरडी मेडिकल कॉलेज का उच्चीकरण, गोरखपुर बाईपास का शुभारम्भ, गोरखपुर-लखनऊ रेलवे लाइन दोहरीकरण-विद्युतीकरण, गोरखपुर-सौनौली मार्ग को अपग्रेड किए जाने और जवाहर लाल नेहरू शहरी एवं ग्रामीण विकास योजना के तहत पेयजल शुद्धता के लिए मिले सौ करोड़ रूपए का जिक्र करते है। समर्थक लोकसभा में उनके मुखर रहने और पूर्वांचल की सबसे बड़ी बीमारी इंसेफेलाइटिस पर सर्वाधिक सवाल पूछने को भी उपलब्धियों में जोड़ते है। लेकिन सपा, बसपा और ‘आपÓ उम्मीदवार इन दावों को खारिज करते हैं। बसपा प्रत्याशी रामभुआल कहते है, ‘यह सच होता तो इंसेफेलाइटिस हर साल कहर न बरपा रही होती।Ó सपा प्रत्याशी के पुत्र अमरेन्द्र निषाद का कहना है कि ‘ इंसेफेलाइटिस पर काबू पाने के लिए सारा उपाय राज्य सरकार ने किया। योगी सिर्फ श्रेय ले रहे हैं।Ó ‘आपÓ समर्थक भी योगी के दावे को छलावा करार देते है। इस चुनाव में भी फर्टिलाइजर कारखाना, चीनी मिलों की बंदी, ठप पड़े औद्योगिकीकरण, खस्ताहाल सडक़ों और बिजली की आवाजाही जैसे मुद्दों की चर्चा तो है लेकिन इस पर पक्ष-विपक्ष स्पष्ट नहीं। सपा, बसपा, कांग्रेस जब कभी सांसद को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करती हैं तो भाजपा उत्तर प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक से विरोधियों की सरकार होने का हवाला देकर ठीकरा उन्हीं के सिर फोड़ देती है।योगी समर्थक चाहे अतिविश्वास में हों, योगी सतर्क हैं। इसीलिए वह पार्टी के लिए स्टार प्रचार की भूमिका निभाते हुए भी अपनी सीट से पल भर के लिए भी निगाह नहीं हटाते। कोशिश करते हैं कि शाम होते-होते गोरखपुर आ जाएं और कोई नुक्कड़ सभा या किसी समाज-संगठन से सम्पर्क जरूर करें।मतदान के करीब पहुंचता चुनाव प्रचार तीखी गर्मी के बावजूद इस बार 2004 या 2009 जैसा तल्ख नहीं दिख रहा। भाजपा के फायर ब्रांड स्टार प्रचारकों में शुमार योगी भी पहले जैसे आक्रामक नहीं है। भटहट का एक नौजवान कहता है, ‘उनके स्टाइल में काफी बदलाव आ गया है। पहले उनके भाषणों में विरोधियों पर तीखा प्रहार होता था। अब राष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय मुद्दों के साथ विकास की बातें ज्यादा होती है।Ó

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