कुछ समय पहले की बात है. कभी शोमैन और अब फ्लॉप मैन सुभाष घई अपने घर में बैठे थे. कुछ फुर्सत में थे तो अपनी आखिरी हिट फिल्म ताल की डीवीडी देखने लगे. मन भर आया उनका. प्रेरित हो गए. सोचा अब साख पर बट्टा हटाने का वक्त आ गया. लिखने लगे एक स्क्रिप्ट. तभी उनकी नजर टीवी पर चली गई. पहले चैनल पर भूमि अधिग्रहण पर न्यूज पैकेज चल रहा था. चैनल बदला तो नारी शक्ति की थीम वाला एक सीरियल चल रहा था. घई ने फटाफट स्क्रिप्ट पूरी की. फिल्म का नाम रखा कांची. अपनी प्रतिष्ठा के मुताबिक लीड रोल के लिए एक नई लड़की खोजी. ऐश्वर्या की याद दिलाती. नाम मिष्टी. यानी मीठा दही.
KANCHIमगर उनकी ये फिल्म कांची दिमाग का दही कर देती है. ऐसी वाहियात फिल्म कि बस किसी तरह आप सबकी भलाई का सोच बैठा रहा आखिरी तक. छोटे मुंह, बड़ी बात, फिर भी कहे देता हूं. भइया सुभाष घई. अब आपसे न हो पाएगा. शटर गिरा दो अब. क्यों अपनी पुरानी फिल्मों की याद की नाक कटाने पर लगे हो.
कहानी भी लगे हाथों सुन ही लीजिए आप. रिटायर्ड फौजियों का एक नकली सा नजर आता पहाड़ी गांव. यहां स्कूल में पढ़ती है तेज तर्रार और गलत को गलत कहने वाली लड़की कांची. उसका प्रेमी कम दोस्त है बिंदा. वह भी तेज तर्रार. सब कुछ हैप्पी सॉन्ग सा चल रहा है. तभी गांव में पर मुंबई के प्रॉपर्टी डिवेलपर्स काकड़ा की गिद्द दृष्टि पड़ती है. वह गांव में टाउनशिप बनाना चाहते हैं. उधर काकड़ा का कलाकार लड़का कांची के साथ पेंटिंग करते करते उससे प्यार करने लगता है. जब उसे बिंदा का पता चलता है, तो प्रतिशोध जाग जाता है. काकड़ा के हाथों अपना प्यार गंवाने के बाद कांची चंडी बन जाती है. सबको धता बताते हुए मुंबई जाती है और काकड़ा नाम के दुष्टों का नाश करती है.इस काम में उसकी कुछ मदद बचपन का दोस्त बगुला भी करता है. इति सिद्धम.
फिल्म की लीड एक्ट्रेस मिष्टी बहुत कच्ची हैं. डायरेक्टर और एक्टर ये तय ही नहीं कर पाए कि उनको अबोध दिखाना है, संकल्पवान दिखाना है या पहले तरल और फिर ठोस दिखाना है. मिष्टी में फिलहाल तो कोई संभावना नहीं दिखती. आगे रब जाने. कार्तिक तिवारी अच्छे हैं, मगर यहां ओवर एक्टिंग करते नजर आए. बिंदा का रोल खानापूर्ति के लिए लिखा गया लगता है. इसी तरह काकड़ा के सुपुत्र के रोल में ऋषभ सिन्हा भी बोदे दिखते हैं. इंस्पेक्टर बगुला के रूप में चंदन राय सान्याल जरूर अपने तईं फिल्म को कुछ संभालने और राहत देने की कोशिश करते हैं. दो मंझे हुए एक्टर्स मिथुन दा और ऋषि कपूर को भी फिल्म में वेस्ट कर दिया गया. पहला नेता के रूप में है, तो दूसरा बिल्डर के रूप में. ऋषि कपूर ने पता नहीं क्यों ये रोल कबूल कर लिया.
फिल्म के डायलॉग सतही और जबरन राष्ट्रवाद जगाने की जुगत भिड़ाते हैं. गाने फिल्म की लेंथ और उबाऊपन को और बढ़ाते हैं. एक फूहड़ गाना कंबल के नीचे और भी गोबर कर देता है.
अगर सुभाष घई के अंधभक्त हैं, तो भी अपने ही रिस्क पर यह फिल्म देखने जाएं. बाकी के लिए एक ही सलाह, रिवॉल्वर रानी या सम्राट एंड कंपनी का रुख करें.
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