Viswanathan Anand - King of Chessविश्वनाथन आनंद ने कामयाबियों के अपने आलीशान शिखर को और भी गौरवान्वित कर लिया है। उनके माथे पर पिछले पांच साल से सजा विश्व चैम्पियन का ताज अब कम से कम दो साल और सजा रहेगा, क्योंकि बोरिस गेलफांद कड़ी चुनौती देने के बावजूद उनका खिताब छीनने में नाकाम रहे। उनकी इस उपलब्धि को देख कर ही खेल प्रेमियों में इधर यह चर्चा चल निकली है कि वह भारत के अब तक के महानतम खिलाड़ी हैं। पहली बार उन्होंने वल्र्ड चैंपियनशिप सन् 2000 में जीती थी। वे रूस के व्लादीमीर क्रमनिक और बल्गारिया के वेसेलीन टोपालोव जैसे दिग्गजों को हरा चुके हैं। लेकिन विश्वनाथन खुद यह मानते हैं कि सबसे कठिन उनकी अब तक की अंतिम जीत है।
12 मैचों तक मुकाबला बराबर रहने के बाद आखिरकार जब टाई-ब्रेकर तक मामला पहुंचा तो विश्वनाथन आनंद के धीरज और जीवट का तोड़ वे नहीं ढूंढ़ पाए। अपने अनुभव और आत्मविश्वास से आनंद इजरायली प्रतिद्वंद्वी पर भारी पड़े। 43 वर्षीय आनंद की उपलब्धियां अप्रतिम हैं। 1989 में विश्व जूनियर शतरंज चैम्पियन और सिर्फ 16 वर्ष की उम्र में भारत का पहला ग्रैंड मास्टर बनने के बाद 2000 में वे पहली बार विश्व चैंपियन बने।
खिताब खोने के बाद 2007 में उन्होंने इसे दोबारा हासिल किया। 2008 और 2010 में अपनी बादशाहत कायम रखी और अब एक बार फिर उसे दोहराकर उन्होंने दुनिया में अपनी श्रेष्ठता निर्विवाद साबित कर दी है। इसलिए यह अस्वाभाविक नहीं है कि बहुत-से लोग उन्हें समकालीन भारत के महानतम खिलाडिय़ों में से एक मानने लगे हैं। इसलिए कि जितने समय तक और जितने साधिकार ढंग से उन्होंने अपने खेल में दुनिया पर अपना वर्चस्व कायम रखा है, उसकी भारत में मिसाल ढूंढऩा कठिन है। गौरतलब यह है कि आनंद ने उस खेल में जाकर अपना झंडा गाड़ा, जहां पहले विकसित देशों के खिलाडिय़ों का दबदबा होता था। जब सारे विवाद खत्म हो गए और निर्विवाद वल्र्ड चैंपियनशिप सन् 2007 में हुई, तब भारत के विश्वनाथन आनंद ने फिर खिताब अपने नाम कर लिया। जो लोग शतरंज से प्यार करते हैं, वे इस अनूठे खिलाड़ी के अनोखे करतबों का इतिहास अपने पास रखना चाहते हैं। शायद आपको भी याद हो कि विश्वनाथन आनंद ने हैदराबाद में हुए अधिवेशन के दौरान एक साथ 40 गणितज्ञों के साथ शतरंज खेल कर हर किसी को चौंका दिया था। हमारे देश में शतरंज की जोरदार रवायत रही है। आज के तेज रफ्तार समय में जैसे दूसरी चीजें हमसे छूटती जा रही हैं, शतरंज की लोकप्रियता भी कुछ कम हो गई थी। लेकिन भारतीय खिलाड़ी की इस बड़ी उपलब्धि के चलते अब हमें गंभीर हो जाना चाहिए। कुछ युवा शतरंज खिलाडिय़ों को भी तैयार करने की योजना बनानी चाहिए। हम यह आसानी से कर सकते हैं। आखिर आज हम शतरंज के सिरमौर हैं।
उनकी सफलता से भारत में शतरंज की ऐसी लोकप्रियता बनी, जो क्रांतिकारी साबित हुई है। आज भारत में अगर अनेक ग्रैंडमास्टर मौजूद हैं तो इसका काफी श्रेय आनंद की उपलब्धियों को जाता है। यानी आनंद ने न सिर्फ अपने खेल में अनोखा प्रदर्शन किया है, बल्कि उससे वे शतरंज को देश में एक नए मुकाम पर भी ले गए हैं। यह न सिर्फ खेल, बल्कि किसी भी अन्य क्षेत्र में महानता को मापने का माकूल पैमाना होता है। लेकिन आनंद के इस अनुपम योगदान का महत्व देश में ठीक से नहीं समझा गया है। अब उनका सही मूल्यांकन जरूर होना चाहिए।

आनंद का खिताबी सफर

पहला खिताब 2000-2001 नई दिल्ली और तेहरान- आनंद ने पहला खिताब नाकआउट प्रारूप में जीता था। इसमें शुरुआत में 128 खिलाड़ी थे। आनंद ने नई दिल्ली में खुद को आगे रखा। उनका फाइनल स्पेन के अलेक्सी शिरोव के साथ था। यह छह बाजियों का फाइनल था जो केवल चार बाजियों तक चला। आनंद ने ईरान की राजधानी तेहरान में खेले गए फाइनल में तीन बाजियां जीती जबकि एक ड्रॉ कराई और इस तरह से वह पहली बार विश्व चैम्पियन बनें।
दूसरा खिताब 2007 मैक्सिको सिटी- दुनिया के सर्वश्रेष्ठ आठ खिलाडिय़ों के बीच यह मैच टूर्नामेंट खेला गया था जो 14 बाजियों तक चला था। आनंद ने अपनी बादशाहत साबित करके बड़े दमदार अंदाज में इसमें जीत दर्ज की थी। इससे उन्हें मैच प्रारूप की अगली विश्व चैम्पियनशिप में तब उन्हीं की तरह अजेय माने जा रहे रूस के व्लादीमीर क्रैमनिक से भिडऩे का हक भी मिला।
तीसरा खिताब 2008 बोन (जर्मनी)- विश्व चैम्पियनशिप फिर से मैच प्रारूप में खेली जाने लगी जैसा कि शतरंज में बहुत पहले से होता रहा है। आनंद को क्रैमनिक के सामने पहले खिताब का प्रबल दावेदार नहीं माना जा रहा था लेकिन पूरी दुनिया ने इस भारतीय में बड़ा बदलाव देखा था। यह 12 बाजियों का मुकाबला था जो 11 बाजियों में समाप्त हो गया। आनंद ने तीन बाजियां जीती, एक गंवाई और बाकी सात ड्रॉ कराकर 6.5 अंक हासिल करके खिताब अपने नाम किया। आनंद की शानदार तैयारियों के सामने क्रैमनिक की एक नहीं चली। आनंद इस तरह से नाकआउट, मैच टूर्नामेंट और मैच तीनों प्रारूप में खिताब जीतने वाले पहले दुनिया के पहले खिलाड़ी बने।
चौथा खिताब 2010 सोफिया (बुल्गारिया)- आइसलैंड में ज्वालामुखी फूटने के कारण पूरे यूरोप में व्यवधान पैदा हुआ। आनंद भी 30 किलोमीटर रास्ता सडक़ मार्ग से तय करके सोफिया पहुंचे थे। उन्होंने प्रतियोगिता तीन दिन बाद आयोजित कराने के लिए कहा था लेकिन उन्हें केवल एक दिन दिया गया। उन्हें तमाम विपरीत परिस्थितियों में वेसलिन टोपालोव के खिलाफ उनके देश में खेलना था। आनंद पहले दौर में हार गए लेकिन उन्होंने आखिरी बाजी काले मोहरों से जीतकर खिताब अपने नाम किया था। इस हार से टोपालोव बुरी तरह आहत हो गए थे। वह तब नम्बर एक खिलाड़ी थे लेकिन अब 12वें नम्बर पर खिसक गए हैं।
पांचवां खिताब 2012, मास्को- खिताब के लिए आनंद का सबसे कड़ा मुकाबला आखिर में टाईब्रेकर में छूटा। बोरिस गेलफांद की मुकाबला शुरू होने से पहले ही हार तय मान ली गई थी। आनंद खिताब का प्रबल दावेदार था लेकिन इस्राइली खिलाड़ी ने उन्हें कड़ी चुनौती दी। वह यहां तक कि एक रैपिड टाईब्रेक बाजी जीतने के करीब भी पहुंच गए थे। यदि गेलफांद वह बाजी जीत जाते तो पता नहीं क्या होता। लेकिन सारा श्रेय आनंद को जाता है। उन्होंने जरूरत के समय अच्छा खेल दिखाया। चाहे वह सातवीं बाजी गंवाने के बाद आठवीं बाजी की जीत हो या रैपिड बाजियां जब वह एक बाजी में मुश्किल में दिखने के बावजूद गेलफांद को बराबरी पर लाए। 6-6 की बराबरी के बाद रैपिड बाजियों में विश्व चैम्पियन ने 2.5-1.5 से जीत दर्ज की।

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