प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सरकारी पदों पर नियुक्ति के समय अभ्यर्थी से नाबालिग रहते हुए किए गए अपराध के खुलासे की मांग उसके अनुच्छेद 21 में मिले निजता व गरिमा के मूल अधिकारों का उल्लंघन है. किसी भी नियोजक को नाबालिग रहते किए गये अपराधों के संबंध में जानकारी मांगने का अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नाबालिग रहते हुए किए गए अपराध (जघन्य नहीं) में मिली सजा के आधार पर नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि चयनित अभ्यर्थी नाबालिग रहते हुए किए गए अपराध (यदि वह जघन्य न हो) पर चुप रह सकता है. उसे इसकी जानकारी देने से इनकार करने का पूरा अधिकार है. ऐसा करना तथ्य छिपाना या झूठी घोषणा नहीं माना जाएगा. कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड से अपराध में मिली सजा को नियुक्ति से इंकार का आधार नहीं बनाया जा सकता. यह सरकारी नियुक्ति की अयोग्यता नहीं मानी जाएगी.
हत्या, दुराचार जैसे जघन्य अपराध में दोषी होने पर छूट नहीं
कोर्ट ने कहा कि नाबालिग और बालिग दोनों अनुच्छेद 14 के तहत अलग वर्ग हैं. बालिग के अपराध की जानकारी नियुक्ति के समय मांगी जा सकती है. छिपाने पर नियुक्ति से इंकार किया जा सकता है किन्तु यह नाबालिग के अपराध पर लागू नहीं होगा. 16 से 18 वर्ष के नाबालिग हत्या, दुराचार जैसे जघन्य अपराध के दोषी हो तो यह छूट उन्हें नहीं मिलेगी.
इसी के साथ कोर्ट ने नाबालिग रहते हुए परीक्षा में नकल के आरोप में लोक अदालत से जुर्माने की सजा पाये याची को पीएसी कांस्टेबल पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया है. कमांडेंट 43 बटालियन पीएसी एटा में नियुक्ति देने से इंकार करने के आदेश को मनमानापूर्ण करार देते हुए रद्द कर दिया है.
याची 2018 पुलिस-पीएसी भर्ती में चयनित हुआ
यह फैसला न्यायमूर्ति अजय भनोट ने अनुज कुमार की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है. मालूम हो कि याची 2018 पुलिस, पीएसी भर्ती में चयनित हुआ. एसपी एटा की रिपोर्ट पर नियुक्ति देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया गया कि उसे नकल के अपराध में लोक अदालत से सजा मिली है. उसने जानकारी छुपायी है. इस आदेश को कोर्ट में चुनौती दिया गया.

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