नई दिल्लीः टूल किट मामले में बेंगलुरु की एक्टिविस्ट दिशा रवि को पटियाला हाउस कोर्ट से जमानत मिलने के बाद पेशे से वकील और टूलकिट केस में आरोपी निकिता जैकब और इंजीनियर शांतनु मुलुक को राहत मिलने की उम्मीदें बढ़ गई हैं. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल टूलकिट गूगल डॉक्यूमेंट की जांच में जुटी है जिसे पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने सोशल मीडिया पर साझा किया था. इस मामले में दिशा रवि को गिरफ्तार किया गया था जबकि मुम्बई की वकील निकिता जैकब और पेशे से इंजीनियर शान्तनु मुलुक को अग्रिम जमानत मिली है.
22 साल की पर्यावरण एक्टविस्ट दिशा रवि को मिली जमानत का स्वागत वरिष्ठ वकीलों , विपक्ष के कुछ नेताओ और सामाजिक कार्यकर्ताओ ने की है. निकिता जैकब की वकील संजुक्ता डे ने कहा, ”दिशा रवि को जमानत मिलना बहुत सकारात्मक है. निकिता जैकब को ट्रांजिट अंतरिम राहत मिली है. हमारी टीम दिल्ली में आगे की कानूनी प्रक्रिया की तैयारी कर रही है. हमे उम्मीद है कि निकिता को भी दिल्ली की संबंधित अदालत से राहत मिलेगी.” इसके साथ ही जमानत अधिकार है इसपर बहस छिड़ गई है.
पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने दिशा रवि केस जमानत के जजमेंट पर कहा, ”यह डिस्ट्रिक्ट जज का साहसी कदम है. उच्च न्यायलय को इससे सीखना चाहिए. पूरे सम्मान के साथ कहना चाहता हु की हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पिछड़ रही है. इस प्रकार के केस में ऊंची अदालतों ने जमानत को नकारा है. पिछले कुछ सालों में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुवक्किल को जमानत देने में अनिच्छुक दिखी है. निचली अदालतों ने दूसरे कोर्ट के लिए उदाहरण तय किया है.
मुम्बई के नामी सेलिब्रिटी वकील नीरज गुप्ता ने जमानत अधिकार है इसपर छिड़े बहस पर कहा की, ऐसे बहुत से मामले है जिसमे मुवक्किल पर चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद उसे जमानत नही मिली है जबकि चार्जशीट दाखिल होने के बाद कस्टडी में रखे जाने की जरूरत नही नज़र आती है. अगर समय पर पुलिस चार्जशीट दाखिल नही करती है तो आरोपी को जमानत मिलना अधिकार है. यहा तक को विचारधीन कैदियों को भी जमानत लंबे समय तक नकारा गया है. वैसे भी सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुका है – ‘Bail is a rule, jail is an exception.’
‘जमानत अधिकार है’ इसपर छिड़ी बहस पर महिलाओं के हक और अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वाली एडवोकेट निशा अरोरा का कहना है कि, ‘ जब तक आरोपी कोर्ट द्वारा दोषी ना ठहराया जाए वो कानून की नज़र में निर्दोष है. ऐसे पर यदि जांच अधिकारी को सबूतों और गवाहों से जुड़े साक्ष्य नही जुटाने है तो मुवक्किल को जमानत का अधिकार है. चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी जमानत ना मिलना एक नागरिक के अधिकारों के वंचित रखने जैसा है. डिफॉल्ट बेल ना मिलने के मामले भी बढ़े है जिसपर न्यायपालिका को सोचना चाहिए.

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