चित्रा जी को अभी हाल ही में रुस का अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान मिला है। इनकी नौ कहानी संकलन, तीन उपन्यास, एक लेख-संकलन, एक बाल उपन्यास, चार बालकथा-संग्रह, छह संपादित पुस्तकों समेत गुजराती में भी दो पुस्तकें अनुदित हो चुकी हैं।

संघर्ष की उर्वर जमीन से साहित्य का सृजन होता है ये सुना था लेकिन जब प्रख्यात साहित्यकार चित्रा मुदगल से मुलाकात हुई तब पता चला कि उनका संघर्ष और साहित्य समानांतर चल रहा है। हिन्दी की इस वरिष्ठ कथा लेखिका ने न सिर्फ अपनी लेखनी से पाठकों के विचारों को उद्वेलित किया बल्कि अपने जीवन में भी लीक को तोड़कर कुछ क्रांतिकारी कदम उठाए। 60 के दशक में अंतरजातीय प्रेम विवाह और श्रमिक संगठनों से जुड़कर समाज सेवा के लिए प्रतिबद्ध चित्रा जी ने अपने लिए तो नये रास्ते बनाए हीं अपने पाठको को भी अपने विचार प्रवाह को गतिमान करने के लिए प्रेरित किया। उनसे मिलकर ऐसा लगा मानों साहित्य के सागर में गोते लगाता उनका व्यक्तित्व वात्सल्य से परिपूर्ण और समाज सेवा को समर्पित है। सफलता किसी को भी निर्वात में नहीं मिलती। क्योंकि सफलता लगन, परिश्रम और विद्वता की माँग करती है और जिस शख्स में ये सारे गुण हों वो अपने आप में एक मुकम्मल व्यक्तित्व है। 2003 में अपने उपन्यास आवां के लिए व्यास सम्मान और सहस्त्राब्दि के पहले अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान से पुरस्कृत चित्रा मुद्गल जी को उनके साहित्य और सृजन के लिए रुस के अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान से भी नवाजा गया है।

 

चित्रा जी से उनके प्रारंभिक जीवन, साहित्य कर्म, समाज के प्रति उनके नजरिये समेत कई मुद्दों पर चर्चा हुई। प्रस्तुत है सोनी किशोर सिंह के साथ चित्रा मुद्गल की की बातचीत का संक्षिप्त अंशः

सबसे पहले आपको बहुत-बहुत बधाई। पहली बार किसी महिला साहित्यकार को रुस का अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान दिया गया। कैसा लग रहा है?

(हँसते हुए) धन्यवाद। वैसा कुछ खास तो महसूस नहीं हो रहा है। फिर भी अच्छा ही लग रहा है।

आपने साहित्य सृजन का एक लंबा दौर तय कर लिया है। ये बताइए कि साहित्य की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ?

कई बार घर का माहौल और आस-पड़ोस की कई समस्याएं मुझे दुखी कर देती थीं। मैं सोचती कि इस समस्या का कोई तो हल होगा। पढ़ते-पढ़ते लगने लगा कि इन समस्याओं का निदान तभी संभव है जब इस समस्या की जड़ तक जाया जाये। ये समस्याएं पाठक के मर्म को छुएं और पाठक सोचे कि कहाँ तक निदान हुआ है। जो युवा हैं, किशोर हैं, जिसने जीवन के आरंभ को समझना शुरु किया है वो अभिव्यक्ति के लिए साधन तो ढ़ूँढ़ ही लेता है। इसके साथ ही निजी कारणों ने भी लिखने के लिए प्रेरित किया। कई बार घरेलू माहौल की वजह से भी क्षोभ होता था। तो अगर आपके अंदर आग है तो आप अपने भीतर की इस आग का सकारात्मक उपयोग क्या करेंगे? जो आक्रोश उभरता है, वो आम जन के साथ साझा होता है। मेरे अंदर का गुस्सा और असंतोष ने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया।

आप साहित्य के साथ सामाजिक कार्यों से भी जुड़ी हैं। साहित्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए समाज सेवा के लिए वक्त कैसे निकाल पाती हैं?

मेरा शुरु से ही सामाजिक कार्यों में मन लगता था। सौमैया कॉलेज मे पढ़ाई के दौरान ही मैं संगठित और असंगठित दोनों तरह के श्रमिक आंदोलनों से जुड़ गई। 20 साल की उम्र में मैं जागरण संस्था की सचिव बनी। ये संस्था घरों में झाड़ू-पोछा करने वाली गरीब और शोषित बाईयों (महिलाओं) को उनका हक देने के लिए संघर्षरत है।
दरअसल रुचि और जरुरत के अनुसार वक्त निकल जाता है। जब मैं देखती हूँ कि लोग अपने ही देश में विस्थापन के लिए मजबूर हैं, उन्हें खाने के लिए, पहनने के लिए यानि उनकी मूलभूत जरुरतों के लिए भी सरकार कुछ नहीं कर रही तो एक इंसान होने के नाते मुझे इनकी सहायता करनी चाहिए और मैं यही प्रयास करती हूँ। जिस तरह साहित्यकार कभी समझौता नहीं  करता, एक पत्नी और माँ अपना दायित्व नहीं भूलती उसी तरह एक समाजसेवी भी समाज के प्रति अपना कर्तव्य नहीं भूलता। सबकी अपनी-अपनी सीमाएं और प्रतिबद्धताएं हैं।

तमाम विरोध के बावजूद आपकी शादी आपके अंदर का सामाजिक विद्रोह था या फिर प्रेम की सहज अभिव्यक्ति?

हमारी शादी 17 फरवरी 1965 को हुई थी। उस जमाने में अंतरजातीय विवाह करने का फैसला लेने के कारण काफी कठिनाई हुई। लेकिन मुझे कठिन मार्ग अपनाने में कभी कोई झिझक नहीं हुई। अवध नारायण मुद्गल जी से मेरी शादी को लेकर घर वालों का काफी विरोध था। घर में बहुत हंगामा हुआ। किसी तरह शादी हुई लेकिन उनलोगों की नाराजगी कम न हुई। यहाँ तक कि मेरी शादी के बाद मुझे उनलोगों ने शादियों में भी बुलाना बंद कर दिया। इसके बाद जब मैं माँ बनी तो शायद पिताजी के गुस्से में कहीं कुछ कमी आई और वो अस्पताल में मेरे बेटे को देखने आये, लेकिन उन्होंने मुझसे कोई बात नहीं की। शादी के लगभग 10 साल बाद उन्होंने मुझसे बातचीत शुरु की। तो इस तरह जिंदगी बहुत चुनौतीपूर्ण रही।

स्त्री विमर्श के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करें.

वास्तव में स्त्री विमर्श भटक चुका है। इसकी दशा और दिशा वो लोग तय करने लगे हैं जो स्त्री विमर्श को सही से समझ तक नहीं पाते हैं। तथाकथित स्त्रीवादी विचारक ये नहीं सोचते कि वो जिस विमर्श की बात कर रहे हैं उसमें स्त्री की स्वीकार्यता भी जरुरी है। वो भूल जाते हैं कि स्त्री का मस्तिष्क भी है। वो अपने लिए रास्ते ढ़ूढ़ कर मंजिल तक पहुँच सकती है। मैं यही कहना चाहती हूँ कि तमाम नापाक इरादों को पीछे छोड़कर स्त्री को आगे बढ़ना चाहिए।

आजकल महानगरों में लिव-इन-रिलेशनशिप धड़ल्ले से अपनाया जा रहा है। हमारे यहाँ ऐसी चीजों को सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिलती, आप इस बारे में क्या कहेंगी?

मैं स्त्री की आजादी की पक्षधर हूँ। लेकिन मेरा मानना है कि खुद लड़कियों को सोचना चाहिए कि जबतक हमारे देश का माहौल इस तरह का नहीं हो जाता तब तक उन्हें संयम तो दिखाना ही चाहिए। अगर ऐसे रिश्तें में उनके साथ छल होता है तो इस मामले में कानून भी लड़कियों की ज्यादा सहायता नहीं कर पाता है। समाज तो दरकिनार कर ही देता है। लिव इन में रहने वाली लड़कियों को कहना चाहती हूँ कि उन्हें कानूनी मजबूती चाहिए, हक चाहिए। लेकिन अगर न मिले तो शोर नहीं मचाएं और न कानून की दुहाई दें। यदि आप प्रेम में होते हैं तो अपने बूते अपने प्रेम को पनपने दीजिए, रोना-पीटना मत करो। वास्तव में अभी अनुकूल वातावरण नहीं है और न आये तो बेहतर है।

अगर अचला नागर को कहा जाये कि वो खुद को चंद पंक्तियों में व्यक्त करें तो क्या कहना चाहेंगी?

मैंने अपने जीवन को खुद चुना कि मैं खुद कैसे जाना चाहती हूँ। उसकी सारी चुनौतियाँ मेरे लिए होंगी। मैं संघर्ष करुँगी, मैं लड़ूँगी और अपने तरीके से अपने होने के उद्देश्य को भी पूरी सुदृढ़ता से जीउँगी। अगर मुझे लगता है कि मेरा चुनाव ही गलत है तो मुझे लगना चाहिए कि मैंने जिंदगी को नादानी भरे माहौल का वारिस बना दिया। लेकिन मुझे आजतक ऐसा नहीं लगा। मैं पूरी संवेदना से अपने लक्ष्यों और चुनौतियों को जी रही हूँ। मैं ये भी मानती हूँ कि यदि हम अपने समाज के प्रति दायित्वपूर्ण नहीं हैं तो फिर अपने प्रति भी दायित्वपूर्ण नहीं है।

— सोनी किशोर सिंह

2 Comments

  1. Ganesh Khaniya 04/01/2019
  2. Ganesh Khaniya 04/01/2019

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.