सप्तम मां कालरात्रिkali
नवरात्र का आज सातवां दिन है. आज आदि शक्ति मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना का विधान है. व्यापार संबंधी समस्या, ऋण मुक्ति एवं अचल संपत्ति के लिए मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है. देखने में मां का स्वरूप विकराल है. परंतु मां सदैव ही शुभ फल प्रदान करती हैं. इस दिन साधकगण अपने मन को सहस्रार चक्र में स्थित करते हैं और मां की अनुकंपा से उन्हें ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं. मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना एवं साधना द्वारा अकाल मृत्यु, भूत-प्रेत बाधा, व्यापार, नौकरी, अग्निभय, शत्रुभय आदि से छुटकारा प्राप्त होता है.
नवरात्र का सातवां दिन भगवती कालरात्रि की आराधना का दिन है. श्रद्धालु भक्त व साधक अनेक प्रकार से भगवती की अनुकंपा प्राप्त करने के लिए व्रत-अनुष्ठान व साधना करते हैं. कुंडलिनी जागरण के साधक इस दिन सहस्त्रार चक्र को जाग्रत करने की साधना करते हैं. वे गुरु कृपा से प्राप्त ज्ञान विधि का प्रयोग कर कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर शास्त्रोक्त फल प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं. जगदम्बा भगवती के उपासक श्रद्धा भाव से उनके कालरात्रि स्वरूप की पूजा कर उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं.
सहस्त्रार चक्र पर सूर्य का आधिपत्य होता है। लोक – सत्यलोक (अनंत), मातृ देवी – छहों चक्रों की देवियां, देवता – परमशिव, तत्व – तत्वातीत. इसका स्थान तालु के ऊपर मस्तिष्क में ब्रह्म रंध्र से ऊपर सब शक्तियों का केंद्र है और अधिष्ठात्री देवी – शक्ति कात्यायनी हैं.

साधना विधान-
सर्वप्रथम लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां कालरात्रि की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करें तथा चौकी पर कालरात्रि यंत्र को रखें. उसके बाद हाथ में पुष्प लेकर मां कालरात्रि का ध्यान आह्वान करें. यदि मां की छवि ध्यान अवस्था में विकराल नजर आएं तो घबराएं नहीं बल्कि मां के चरणों में ध्यान एकाग्र करें. मां का स्वरूप देखने में भले ही विकराल है परंतु हर प्रकार से मंगलकारक है.
ध्यान मंत्र –
कराल रूपा कालाब्जा समानाकृति विग्रहा।
कालरात्रि शुभ दधद् देवी चण्डाट्टहासिनी॥

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