rajnathमोहित सिंह की एक रिपोर्ट
अटल की विरासत के उत्तराधिकारी बनने की कोशिश कर रहे राजनाथ सिंह के पैर लखनऊ में तीन दिनों के प्रवास के दौरान लडख़ड़ा गये होंगे। उनकी समझ में आ गया होगा कि रास्ता काफी पथरीला और कांटों भरा रास्ता हैं जिसपर चलना इतना आसान नहीं होगा।
शायद इसी वजह से दिल्ली से लौटने से पहले उन्होने सभी महत्वपूर्ण मोर्चो पर अपने विश्वसनीय लोगों की तैनाती की। अपने लोगों को कई जिम्मेदारियां सौंपी। साथ ही ब्राहमणों की नाराजगी भांपते हुए संघ से बातचीत करके पूर्व संगठन मंत्री जय प्रकाश चतुर्वेदी को समन्वयक बनवाया। कायस्थ वोटों को साधने के उद्देश्य से डा0 एस0सी0राय जैसे पुराने नेताओं से मिलकर सियासी सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश की। चुनाव की जिम्मेदारी दूसरों पर डालने की बजाए पत्नी सावित्री सिंह व पुत्र पंकज सिंह को सौंप कर दिल्ली लौटे।
लेकिन राजनाथ सिंह उन पौने दो लाख पहाड़ी मतदाताओं का कोई तोड़ अभी तक नही ढूंढ़ पाये हैं। जो सीधे तौर पर कांग्रेस की प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी के साथ जुड़ चुका है। स्थानीय स्तर पर भाजपा के पास ऐसा कोई पहाड़ी नेता नही है जो इन वोटों को भाजपा और राजनाथ सिंह के पक्ष में कर सके। यही पौने दो लाख वोट लखनऊ संसदीय सीट पर एक नये समीकरण के उभार का संकेत दे रहें हैं।
चर्चा है कि पिछले दिनों लखनऊ में गोमती के किनारे आयोजित उत्तराखण्ड महोत्सव उइसी की एक कड़ी था। रीता ने इसके माध्यम से पहाड़ी वोटरों को खूब लुभाया है जो भाजपा की कमजोर कड़ी साबित हो सकता है।
स्थानीय सांसद लालजी टण्डन और महापौर डा0 दिनेश शर्मा के आश्वासन के बावजूद यह घोषणा भी की कि वह कोशिश करेंगे कि प्रतिदिन शाम को लखनऊ में रहें। कार्य कर्ताओं को भी यह भरोसा दिलाने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी कि भले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अभी लखनऊ कम आ पाते हो लेकिन सांसद बन गये तो राजधानी के एक एक कार्यकर्ता से सीधा संवाद रखेंगे।
दरअसल तीन दिनों के लखनऊ प्रवास के दौरान राजधानी का काफी सच उनके सामने आ चुका है राजनाथ के लखनऊ पहुंचने से लेकर यही से रवाना होने तक इस बार वैसी भीड़ नही दिखी जैसी आम तौर पर दिखाई देती थी। उनके आवास पर भी पहले जैसा माहौल नही था। निराला नगर ़़़़क़े माधव सभागार में हुये कार्यकर्ता सम्मेलन में कानपुर, वाराणसी, बाराबंकी, उन्नाव, रायबरेली से कम उपस्थिति से भी उन्हें चिंता हुई होगी।
रही सही कसर पूरी हो गई उनके दिल्ली रवाना होने से पहले उनके आवास पर पार्टी के प्रमुखकार्यकर्ताओं की बैठक में, जहाँ मंच पर मौजूद कुछ नेताओं का गुस्सा मुखर हो गया। राजनाथ के लिये यह पहला मौका होगा जब लखनऊ के कार्यकर्ता इस रूप में उनके सामने आये हो। भले ही इस पर राजनाथ ने कोई सार्वजनिक टिप्पणी न की हो लेकिन इतना तो उनकी समझ में आ ही गया कि लखनऊ का मूड उतना अच्छा नही है जैसा समझ कर वह आये हैं।
राजनाथ समझ चुके है कि लखनऊ की लड़ाई आसान नही है उन्हें चुनाव न सिर्फ भरोसेमन्द लोगों की देख रेख में लडऩा होगा बल्कि कार्यकर्ताओं को जोडऩे के लिये उनसे सीधे संवाद भी करना होगा। स्वाभाविक है कि इसके लिये राजनाथ कुछ ऑपरेशन भी करेंगे। इसका तौर तरीका तो आगे सामने आयेगा पर लखनऊ की पटकथा पढऩे के बाद राजनाथ यह समझ चुके होंगें कि प्रतिष्ठा बढ़ाने के चक्कर में वे अपनी प्रतिष्ठा दॉव पर लगा बैठे है।
लखनऊ को कहा तो बाबुओं का शहर जाता है लेकिन यहां के माहौल में पता नहीं ऐसी क्या खास बात है जो हर आदमी को यहां की सियासत में रमने-जुडऩे और सियासी संसार में अपनी शख्सियत को संवारने तथा पैर जमाने को बेकरार कर देती है। हो सकता है कि लखनऊ को इसलिए नवाबों का शहर कहा जाता हो। कभी कांग्रेस का गढ़ तो फिर अटल का घर बनने वाले लखनऊ के मिजाज देखिए कि चुनाव में यहां का विकास बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता। कभी-कभार किसी हिस्से में सडक़, स्कूल व अस्पताल की बात उठना दीगर बात है। मुद्दा सिर्फ लखनऊ के किले पर परचम फहराकर शान बरकरार रखने या बढ़ाने का रहता है। मतदाताओं की भी प्राथमिकता अभी तक उन चेहरों को ही दिल्ली दरबार में भेजने की रही है जिससे उनकी शान बढ़े। जिसकी अपनी पहचान हो। स्वराजवती नेहरू से लेकर लालजी टंडन तक लखनऊ ने यही संदेश दिया है।
ऐसी ही जद्दोजहद इस बार भी दिख रही है। भाजपा और कांग्रेस अपनी-अपनी विरासत की शान के लिए मैदान में हैं। सपा और बसपा की कोशिश है कि वे अपने उम्मीदवारों के जरिये लखनऊ के गौरव को अपने खाते में भी दर्ज कर लें। भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को मैदान में उतारकर अटल की विरासत का दावा ठोंक दिया है तो कांग्रेस ने कभी अपने गढ़ और पार्टी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को सबसे ज्यादा फीसदी मत दिलाकर विजय दिलाने वाले लखनऊ में उनकी पुत्री रीता बहुगुणा जोशी को मैदान में उतारकर चुनावी लड़ाई को विरासत बनाम विरासत में तब्दील करने की कोशिश की है। कुल मिलाकर भाजपा अटल की विरासत बचाने तो कांग्रेस हाथ से निकल चुकी विरासत को पाने में लगी है तो वहीं सपा यह बताने में जुटी है कि विधानसभा चुनाव में लखनऊ में सपा को बढ़त संयोग नहीं बल्कि शहर का मिजाज बदलने का सबूत है। शहरी क्षेत्रों में भी सपा का दखल बढ़ा है। बसपा यह बताने के लिए मैदान में है कि लखनऊ किसी नाम व पहचान से बंधा नहीं है।

लखनऊ के सामजिक समीकरण ब्राह्नमण, कायस्थ, वैश्य व मुस्लिम मतदाताओं के रूझान से प्रभावित होते हैं। इसीलिए सपा ने पहले यहां से अशोक वाजपेयी को उताकर ब्राह्नमण व मुस्लिम समीकरणों को साधकर सफलता पाने की सोची थी पर भाजपा से राजनाथ सिंह के

आने के बाद सपा ने अशोक वाजपेयी की जगह प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री अभिषेक मिश्र को मैदान में उतार दिया है। अभिषेक लखनऊ की ही उत्तर सीट से विधायक है। सपा को उम्मीद है कि पहली बार विधायक चुने गए अभिषेक के युवा चेहरे की चमक के साथ ब्राह्नमण मतदाताओं में सेंधमारी और मुस्लिम मतदाताओं की लामबंदी से उसकी उम्मीदें बढ़ सकती है। बसपा ने भी ब्राह्नमण चेहरे नकुल दुबे को उतारकर ब्राह्नमण मतदाताओं में सेंधमारी और परंपरागत दलित वोटों के सहारे अपने लिए उम्मीदें पाली है। पिछली बार गाजियाबाद से सांसद चुने गए राजनाथ सिंह के लखनऊ आने की मुख्य वजह भी अटल की विरासत के साथ लखनऊ के सामाजिक समीकरण ही माने जा रहे है। भाजपा और खुद राजनाथ को उम्मीद है कि अटल से जुड़ाव के कारण ब्राह्नमण मतदाता उन्हें वोट देगा ही। उधर, आम आदमी पार्टी ने फिल्म अभिनेता जावेद जाफरी को उतारकर 4.5 लाख मुस्लिम वोटों को साधने की कोशिश की है।
अब कार्यकर्ता यह सवाल उठाने लगे है कि लखनऊ जैसी चिंता उत्तर प्रदेश के लिए सबसे बड़े राज्य की 80 सीटों को केन्द्र में रखकर क्या मोदी को रोकने के लिये अन्दर से कोई खेल खेला जा रहा है इसके लिये कार्यकर्ता अब अमित शाह और हृदयनाथ सिंह को भी दोषी ठहराने लगे है।
सबसे ज्यादा गुस्सा धौराहारा, बाराबंकी, सीतापुर, हरदोई और रायबरेली सीट को लेकर है। कार्यकर्ताओं का साफ तौर पर कहना है कि इन सीटों पर गलत टिकट वितरण हुआ। कुछ सवाल उभरे रहे है जो काफी गंभीर हंै।
कार्य कर्ताओं का सीधा सवाल है कि हृदयनाथ सिंह और सुंनील बंसल को जब अलग से जोड़ा गया और इन दोंनो को लेकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि पारदर्शिता का पूरा ख्याल रखा जायेगा।
बाराबंकी में दो दावेदार थे ऊषा रावत और प्रियंका रावत। टिकट मिला प्रियंका रावत को। सारे सर्वेक्षण बता रहे थे कि ऊषा रावत यही से सशक्त दावेदार है संघ की वह पहली पसन्द थी टिकट घोषित होने के बाद बाराबंकी लोक सभा क्षेत्र में प्रियंका रावत का जबरदस्त विरोध हो रहा है। मात्र जिलाध्यक्ष उनके साथ घूम रहे है। आखिर संसदीय बोर्ड ने यह चिंता क्यों नही की। यही हाल हरदोई का है यहां से अंशुल वर्मा को टिकट दिया गया है। उनके ऊपर आरोप है कि वह बाहरी उम्मीदवार है। अंशुल को चंडीगढ़ से लाकर उम्मीदवार बनाया गया है। उनके चाचा सपा से विधायक है और उनके सपा के राज्य सभा सांसद नरेश अग्रवाल से गहरे सम्बन्ध है।
रायबरेली से अजय अग्रवाल को टिकट दिया गया है। चर्चा है कि वह कांग्रेस के हाथों में खेल रहे है उन्हें आगे बढ़ाने में प्रदेश ध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई की भूमिका अहम रही है। यहाँ से अतुल सिंह प्रबल और सशक्त दावेदार थे।
धौराहारा में दिवंगत अरूण वर्मा की पत्नी रेखा वर्मा को टिकट दिया गया है। रेखा वर्मा अत्यन्त कमजोर प्रत्याशी साबित हो रही है यहाँ से डा0 आशीष कुमार सिंह मैसी प्रबल दावेदार थे। रेखा वर्मा पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने लाखों देकर टिकट खरीदा है। अब बेचा किसने है यह गंभीर मामला है।
धौराहारा और सीतापुर को लेकर गंभीर आरोप है कि राजनाथ सिंह ने केवल ब्राह्नमणों का विरोध करने के लिये कुर्मियों को महत्व दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन दोनों ही सीटों पर भाजपा काफी नीचे की पंक्ति में है। यहां कार्यकर्ताओं के गुस्से का गुबार लखनऊ की सीट तक पहुंचाकर राजनाथ का खेल सीधे तौर पर बिगाड़ सकता है।

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