16_11_2013-16smriti ईरानी और मीनाक्षी लेखी पर मोदी की मेहरबानी को रेखांकित कर रहे हैं हमारे सहयोगी मोहित सिंह
छोटे परदे की पटरानी एकता कपूर ने जब अपने धारावाहिकों के माध्यम से टीवी को उद्योग का दर्जा दिलाया तो उनके दो धारावाहिक सर्वाधिक लोकप्रिय हुये। कहानी घर घर की और सास भी कभी बहू थी। इन दो धारावाहिकों के माध्यम से एकता कपूर ने दो कला नेत्रियों का उदय कराया। साक्षी तंवर और स्मृति ईरानी।
साक्षी तंवर अपने छोटे परदे के सफर को विस्तार देने में लगी रहीं लेकिन स्मृति ईरानी ने अपनी यात्रा कला यात्रा को नया मोड़ दे दिया और भाजपा के पितामाह लालकृष्ण अडवाणी की उंगली पकड़ कर उन्होंने अपने जीवन में राजनीति के साथ नया अध्याय जोड़ा। कला नेत्रियां आम तौर पर राजनीति में विफल ही होती हैं लेकिन स्मृति ईरानी के बारे में कहा जा सकता है कि उन्होंने राजनीति के अनुभवी महा पण्डितों के साथ कदम ताल मिलाते हुये भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका को लगातार आगे बढ़ाने का काम किया है।
ऐसा लगता है कि वह यह जानती थीं कि राजनीति में कब और कैसे खेल खेलना है शायद वह इन्हीं वजहों से जल्दी जल्दी पैंतरे बदलती रहीं आज उनके इसी पैंतरे ने उन्हें भारतीय राजनीति की शिखर पर पहुंची महिलाओं के समक्ष लाकर खड़ा कर दिया है।
स्मृति ईरानी पर तामिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की टिप्पणी गौर करने लायक है। जयललिता कहती हैं कि स्मृति को जब मैंने पहली बार छोटे परदे पर देखा था तो मुझे लगा था कि वह अभिनय की पटरानी है लेकिन चन्द सालों बाद जब मैंने राजनीति में उसकी वाकपुटता देखी तो मुझे लगा कि यह भारतीय राजनीति में लम्बी रेस का घोड़ा है और अपने कौशल से राजनीति में उसने स्वयं को ऐसा परिभाषित कर दिया जिसमें भाजपा के कई शिखर पुरूष उसके कायल हो गये।
गौरतलब है कि एक कार्यकारिणी सदस्य की हैसियत से भाजपा में प्रवेश करने वाली स्मृति ईरानी ने 2009 में दिल्ली के चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव कपिल सिब्बल के खिलाफ लड़ा पर वे चुनाव तो नहीं जीत सकीं लेकिन लोगों के दिलों पर उन्होंने अपनी गहरी छाप छोड़ी।
समय आगे बढ़ता रहा और स्मृति ईरानी भारतीय राजनीति में दूसरी महिलाओं के समकक्ष पहुंचने के लिए तेजी से दौड़ती रहीं। इसी दौड़ के चलते भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें महिला मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। यह वो दौर था जब भाजपा के मोर्चा और प्रकोष्ठ बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे थे। ऐसे समय में स्मृति ईरानी ने राष्टï्रीय स्तर पर महिलाओं को एकजुट करने का काम किया। शायद यही कारण था कि उन्होंने भारतीय राजनीति में महिलाओं की एक नई धमक पैदा की। उनकी यात्रा यहीं नहीं रूकी बल्कि वह राष्टï्रीय प्रवक्ता बनकर अपनी प्रतिभा को और निखारने में लग गर्इं। अब उनकी इसी प्रतिभा के चलते अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा अपना प्रत्याशी बनाने में विचार कर रही है।
गौरतलब है कि स्मृति ईरानी लाल कृष्ण अडवाणी की खोज थीं,लेकिन भाजपा की राजनीति मेें तेजी से बदलते घटना क्रम में जब भाजपा की सत्ता नरेन्द्र मोदी के हाथ में आई तो स्मृति ईरानी ने तेजी से पैंतरा बदला। आज व नरेन्द्र मोदी की टीम में बहुत ऊपर की पंक्ती में खड़ी नजऱ आती हैं। इस मसले पर स्मृति कहती हंै ऐसा कुछ नहीं है। लाल कृष्ण अडवाण्ी हमारे विकास पुरूष हंै, मार्गदर्शक हैं और मेरा उनके साथ परिवार जैसा रिश्ता है। नरेन्द्र मोदी मेरे लिए आदर्श हंै। मैं इन्हीं के मार्गों को प्रशस्त करने की कोशिश कर रही हूं। स्मृति कुछ भी कहें लेकिन आज उन्हें मोदी की नई बहू के रूप में देखा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर मोदी की सर्वाधिक चॢचत बहू हैं मीनाक्षी जो सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। भाजपा की धारदार प्रवक्ता हैं और 2014 के लोकसभा चुनाव में नई दिल्ली लोकसभा से प्रत्याशी हैं। मोदी ने दिल्ली में ऐसे लोगों को चुनाव में उतार कर केजरीवाल और कांग्रेस के लिए घोर संकट पैदा कर दिया है। यह तो आने वाला समय ही बताएगा की भारतीय राजनीति की रेस में मोदी की यह बहुएं कौन सा नया कीर्तिमान बनाएंगी लेकिन मोदी ने इन दोनों के माध्यम से भाजपा के वृद्व व पितामाह कहे जाने वाले लाल कृष्ण अडवाणी के साथ साथ पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे अजीज सुषमा स्वराज का तोड़ ढूंढऩे की कोशिश की है।

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