General V K Singhसेना के ताजा प्रकरण में एक बात तो सीधे तौर पर साबित हो गई कि हमारे देश की सरकार देश की अस्मिता और सुरक्षा के सवाल पर पूरी तरह अगम्भीर है। सरकार के किसी भी आचरण में कोई भी परिपक्वता नहीं दिख रही है। जैसे एक तरफ घोटाला तो दूसरी तरफ सियासत। दोनों का स्तर एक ही जैसा। अधर में लटका है तो वह है सेना का भविष्य। भारत के थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह के आरोप तो भ्रष्टाचार की एक कड़ी भर हैं, लेकिन घोटालों और भ्रष्टाचार के बीच सेना का भविष्य क्या होगा, यह समूचे हिंदुस्तान के लिए गम्भीर प्रश्न है, जो बेशर्म सत्ताधारियों के लिए कोई मसला नहीं है। पूरे देश ने महसूस किया सेनाध्यक्ष का लेटर-बम। प्रधानमंत्री को भेजा गया यह लेटर बम फटा भी और पूरा देश आहत हो गया लेकिन नेताओं की गंदी मोटी खाल पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। दीनबंधु कबीर का जायजा…

सेनाध्यक्ष द्वारा सेना के खस्ता हाल पर किए गए खुलासे के बाद संसद में बवाल हो रहा है। विरोधी सरकार पर बरस रहे हैं, तो कुछ सेनाध्यक्ष को हटाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन इस सियासत के बीच एक सवाल उतने ही जोरदार तरीके से उछल रहा है। अगर सेना की हालत इतनी खस्ता है, तो केंद्र उसे गम्भीरता से क्यों नहीं ले रहा? आखिर 13 लाख से ज्यादा सैनिकों, परमाणु क्षमता की मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और हर तरह के अत्याधुनिक साजो-सामान से लैस भारतीय सेना जो कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में दुश्मन से लडऩे में सक्षम होने का दावा करती है, क्या वह दावे हवा-हवाई हैं? क्या बीमारी उस हद तक जा चुकी है कि सेना के मुखिया को पत्र लिखकर केंद्र सरकार को ध्यान दिलाने के लिए विवश होना पड़ा?

सेना में घोटाले की चर्चा तो पुरानी है, लेकिन सेना अंदर से इतनी सड़ चुकी है, इसका देश को पता नहीं था। 80 के दशक में बोफोर्स तोपें खरीदी गईं। फिर इस खरीद में घोटाला सामने आया। तब से आज तक हर इलाके में लड़ाई लडऩे में सक्षम यह तोपें भारतीय सेना को मिली ही नहीं। सेना को बोफोर्स जैसी 400 ऑटोमेटिक तोपें, 3000 मध्यम दर्जे की तोपें, 50 हजार तोप के गोले, डेढ़ लाख राउंड गोली-बारूद चाहिए, लेकिन यह चीजें सेना से कोसों दूर हैं। तात्पर्य यह है कि सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह का पत्र बेमानी नहीं है, जैसा केंद्र सरकार साबित करना चाह रही है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर के कार्यकाल में अमेरिका से बोफोर्स जैसी एलडब्लू-155 तोपों का सौदा हुआ। लेकिन जनरल वीके सिंह ने गद्दी सम्भालते ही कहा कि यह तोपें सेना के लिए बेकार हैं। लिहाजा यह सौदा भी ठंडे बस्ते में जाता नजर आ रहा है। यह जनरल दीपक कपूर वही हैं, जो उत्तरी कमान का कमांडर रहते हुए न केवल सेना का साजो-सामान बल्कि रसद और अंडे तक खा गए थे। इनके भ्रष्टाचार की जांच कराने वाले अधिकारी ले. जनरल जीएस पनाग को सेनाध्यक्ष नहीं बनने दिया गया और उन्हें लखनऊ ट्रांसफर कर रिटायर करा दिया गया। और दीपक कपूर को देश का सेनाध्यक्ष बना दिया गया। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है। सेना में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। कोई भी सौदा होने में कम से कम तीन साल लगते हैं। कई सौदे तो वर्षों से रुके हुए हैं। सेना की मांग की सूची बढ़ती जा रही है। वक्त के साथ पड़ोसी अपनी सेना को अत्याधुनिक बनाते जा रहे हैं, लेकिन सेना पर घोटालों और नौकरशाही का साया इतना घना है कि अक्सर कई सौदे पूरे होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

सेना के पास मौजूद टी-72 टैंक की हालत भी अलग नहीं है। जनरल दीपक कपूर के कार्यकाल में इन टैंकों को नाइट विजन तकनीक से लैस करने का सौदा हुआ, लेकिन आज भी तकरीबन साठ फीसदी टी-72 टैंक ऐसे हैं जो रात में लडऩे में सक्षम नहीं हैं। इसके अलावा इन फैन्ट्री बटालियन और राष्ट्रीय राइफल्स से हर जवान को अत्याधुनिक तकनीक के साजो-सामान से लैस करने की एक महत्वाकांक्षी योजना बनी। अगर ऐसा होता तो 2020 तक वह अमेरिकी सैनिकों जैसे नजर आने लगते। हेलमेट से लेकर उनके जूते तक अत्याधुनिक होते। लेकिन आज तक सिर्फ उनके लिए असॉल्ट राइफल का ही टेंडर निकाला गया है। सेना को अभी भी 44 हजार कार्बाइन, 66 हजार टेवौर-21 जैसी एसॉल्ट राइफलें, लाइट मशीनगन, मॉड्यूलर बुलेट प्रूफ जैकेट्स निगरानी रखने वाले साजो-सामान जैसी चीजों के लिए तरसना पड़ रहा है। वर्षों पहले सेना की जरूरतों की सूची बनी थी लेकिन आज तक उन पर कोई फैसला नहीं हुआ। सेना को 1500 युद्धक टैंक की जरूरत है। साढ़े तीन हजार हल्की और भारी होवित्जर तोपों की जरूरत है। सेना को लैंड माइन से सुरक्षित 600 गाडिय़ां चाहिए। उसे जरूरत है 2000 निगरानी राडार, दुश्मन के हथियारों का पता लगाने वाले 40 अत्याधुनिक राडार, दुश्मन पर नजर रखने के लिए 200 यूएवी यानी अनमैन्ड एरियल व्हेकिल की। यही नहीं, सेना को दुश्मन का पता लगाने के लिए 3000 थर्मल इमेजर भी चाहिए। सेना की स्पेशल यूनिट के लिए 50 हजार बुलेट प्रूफ जैकेट्स, 5 हजार हैंड हेल्ड एंटी टैंक गाइडेड हथियार और 12.5 मिलिमीटर की हेवी मशीनगन की खरीद अभी अधर में ही लटकी है। इस तरह सेना की जरूरतों की सूची काफी लम्बी होती जा रही है, क्योंकि इन सब खरीद में नेताओं को खूब सारा पैसा दिखता है।

सेना की यह हालत न होती अगर करगिल युद्ध के बाद बनाई गई करगिल रिव्यू कमेटी की सिफारिशें सरकार ने मान ली होती। कमेटी की सिफारिश में सबसे अहम था सीडीएस यानी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति। इतने वर्ष बीत गए लेकिन सरकार अभी तक इस बारे में फैसला नहीं कर सकी है। कमेटी ने सेना के एयर डिफेंस और रात में लडऩे की क्षमता में भारी कमी को जल्द से जल्द ठीक करने की भी सिफारिश की थी, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। कमेटी ने यह भी सिफारिश की थी कि रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय को एकीकृत कर दिया जाए, जिससे फैसले लेने और उन पर अमल करने में आसानी हो। लेकिन आज भी खरीद की फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर चक्कर खा रही हैं। नौकरशाही और सेना के बीच सैन्य साजो-सामान के सौदे दम तोड़ रहे हैं।

इतने संवेदनशील मसले पर पूरी संसद बकवास में मुब्तिला है। रक्षामंत्री एके एंटनी संसद में कुछ कहते हैं तो बाहर कुछ और। सरकार ने संसद में यह तो स्वीकार किया कि सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी, लेकिन यह नहीं बताया कि असली मुद्दा क्या है? इससे पहले मीडिया पूरे देश को बता चुका था कि जनरल के पीएम को लिखे गए पत्र में मुद्दा क्या है? मीडिया में आई खबरों के अनुसार सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में भारतीय सेना के पास हथियारों और बारूद की कमी की जिक्र किया है। मीडिया को लीक हुआ यह पत्र इस साल 12 मार्च को सेनाध्यक्ष की ओर से प्रधानमंत्री को लिखा गया जिसमें कहा गया है कि ‘प्रधानमंत्री, सेना को मुस्तैद बनाने के लिए जरूरी आदेश जारी करें।’ इस पत्र में सेनाध्यक्ष ने लिखा है कि भारत में सैन्य हथियारों, हवाई सुरक्षा और पैदल सेना की हालत चिंताजनक है। सेनाध्यक्ष ने यहां तक लिखा कि ‘दुश्मन सेना के टैंकों से लडऩे के लिए सेना के पास जरूरी युद्ध सामग्री तक नहीं है और हवाई सुरक्षा का 97 फीसदी साजो-सामान बेकार हो चुका है।’ विडम्बना यह है कि देश के रक्षा मंत्री देश को झांसा देते रहे हैं और यह कहते रहे हैं कि भारतीय सेना की तैयारियां मजबूत हैं और आगे भी रहेंगी। एक तरफ सेनाध्यक्ष कहते हैं कि घूसखोरी के कारण सेना में घटिया साजो-सामान की सप्लाई हो रही है तो दूसरी तरफ एंटोनी कहते हैं कि हमारी सैन्य तैयारियां मजबूत हैं और हम अपनी सेनाओं को बेहतरीन साजो-सामान मुहैया करवाते हैं। रक्षा मंत्री यह बात संसद में उस समय कह रहे थे, जब सेनाध्यक्ष को घूस की पेशकश किए जाने और प्रधानमंत्री को पत्र लिखे जाने का प्रकरण उठा था।

पाकिस्तानी अखबारों ने कहा खुली भारतीय सेना की पोल
भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह की ओर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे गए पत्र की पाकिस्तानी मीडिया और अखबारों में ख़ूब चर्चा हुई। अखबारों ने जनरल वीके सिंह के पत्र वाली खबर को प्रमुखता से तो नहीं छापा, लेकिन सभी अखबारों ने इसको जगह दी। टीवी चैनलों ने भी इस खबर को काफी प्रमुखता दी।

पाकिस्तानी मीडिया में प्रकाशित व प्रसारित खबरों में भारतीय सेना की खोखली तैयारियों को खूब परोसा गया। हेडलाइनें भी उसी तरह बनीं, मसलन, ‘हवाई सुरक्षा का 97 फीसदी सामान बेकार’, ‘लीक हुए पत्रों से भारत की सैन्य ताकत का खुलासा’, ‘भारतीय सेना के टैंकों में बारूद नहीं’, ‘एरयर डिफेंस भी बेकार’, पाकिस्तान के ‘टूडे’ अखबार ने तो लिखा कि जनरल वीके सिंह ने पत्र लिख कर भारत में नई चिंताओं को जन्म दिया है और इससे भारतीय सेना के मनोबल पर प्रभाव पड़ेगा।

पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार ‘दी नेशन’ ने लिखा है कि जनरल वीके सिंह के पत्र से भारत सरकार को तगड़ा झटका लगा है और उन्होंने प्रधानमंत्री को सीधे तौर पर पत्र लिख कर सेना की पोल खोल दी है। अखबारों में जनरल वीके सिंह के पत्र के कुछ हिस्से भी छापे गए हैं।

टाट्रा ट्रक सौदे पर गिरी गाज, मामला दर्ज
सीबीआई ने टाट्रा ट्रक सौदा दलाली मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है। सीबीआई सिर्फ सेनाध्यक्ष की चिट्ठी की सिफारिशों के मुताबिक ही नहीं, बल्कि पूरे मामले की जांच करेगी। टाट्रा ट्रक कम्पनी के चीफ रवि ऋषि से भी सीबीआई पूछताछ करेगी। उनके कार्यालयों की तलाशी भी सीबीआई ले सकती है। सीबीआई ने टाट्रा चीफ को इस सम्बन्ध में नोटिस जारी किया है। सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह को टाट्रा डील में रिश्वत की पेशकश के आरोप के बाद यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर यह टाट्रा डील है क्या?

ट्रकों की सप्लाई में एक कम्पनी बीईएमएल ने भारी मुनाफा कमाया। एक करोड़ रुपए में खरीदे गए ट्रक पूर्वी यूरोप से आधी कीमत पर खरीदे जा सकते थे। भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड यानी बीईएमएल सेना को 1986 से ही टाट्रा ट्रकों की सप्लाई करती आ रही है। 2010 में बीईएमएल को 632 करोड़ के अनुमानित खर्चे पर 788 और टाट्रा ट्रक की सप्लाई का ऑर्डर दिया गया।

जनरल वीके सिंह ने तीन मुद्दों पर गम्भीर आपत्ति जताई थी। पहला टाट्रा ट्रकों को बीईएमएल ने खुद न बनाकर आयात किए थे। दूसरा ट्रकों में ड्राइविंग सीट बाईं ओर थी जबकि भारत में वाहनों की ड्राइविंग सीट दाईं ओर होती है और तीसरा ट्रकों की सप्लाई में बीईएमएल भारी मुनाफा कमा रही थी। एक करोड़ रुपए में खरीदे गए यही ट्रक पूर्वी यूरोप से आधी कीमत पर खरीदे जा सकते थे। टाट्रा ने साल 1997 में 7000 हजार गाडिय़ां सप्लाई की थी। 1964 से टाट्रा इंडियन सेना को अलग-अलग गाडिय़ां सप्लाई करते आ रहा है। इन सभी पहलुओं की सीबीआई जांच करेगी। साथ ही टाट्रा के साथ सौदे की मियाद की भी जांच की जाएगी। सीबीआई का कहना है कि उसने सैन्य सौदों से जुड़े 18 मामले दर्ज किए गए हैं और वर्ष 2004 से उनमें से 13 में आरोपपत्र दाखिल किए गए। सीबीआई ने कहा है कि यह मामले कुछ वरिष्ठ रक्षाकर्मियों सहित विभिन्न सरकारी अधिकारियों के खिलाफ दायर किए गए हैं। बयान के मुताबिक, इनमें से 13 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं। जबकि दो मामलों में आरोप साबित न होने पर उन्हें बंद कर दिया गया है। तीन मामले अन्य देशों द्वारा अनुरोध पत्र पर कार्रवाई न होने से लम्बित हैं। बयान के मुताबिक जांच एजेंसी की अनुशंसा पर कई कम्पनियों को काली सूची में डाला गया है|

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