केंद्र सरकार की तरफ से चीन समेत भारतीय सीमा से जुड़े हुए देशों से सार्वजनिक क्षेत्र के टेंडर पर नियंत्रण से देश में अपनी क्षमता बढ़ाने का एक बड़ा मौका सामने आ गया है। विशेषज्ञों की राय में वैसे तो ये राजनीतिक फैसला है लेकिन इसी बहाने देश की कंपनियों को और मौके दिए जाने चाहिए साथ ही उनकी क्षमता और मजबूत करने के प्रयास होने शुरू होंगे।

एसोचैम के महासचिव दीपक सूद ने हिंदुस्तान से बातचीत में कहा ये भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है। साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों में चीन का विकल्प बनने की पूरी क्षमता मौजूद है। सरकार को अब इनका इस्तेमाल करना चाहिए।

वहीं अर्थशास्त्री प्रणब सेन ने कहा कि ये फैसला पूरी तरह से राजनीतिक है। जब देश में राजनीतिक फैसले लिए जाते हैं तो उसके फायदे और नुकसान नहीं देखे जाते हैं। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि देश में इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का बड़ा फोकस है और चीन की कंपनियां उसमें अच्छा खासा दखल रखती हैं।

प्रणब सेन के मुताबिक मौजूदा दौर में देश की कंपनियों में उतनी क्षमता नहीं है कि वो चीन के मुकाबले सस्ता विकल्प बन सकें। ऐसे में अब देश का खर्च बढ़ जाएगा। अब ये सरकार को तय करना होगा कि मौजूदा परिस्थियों से वो किस तरह निपटती हैं।

गुरवार देर रात सरकार ने निर्देश जारी कर साफ कर दिया कि इन देशों का कोई कंपनी सुरक्षा मंजूरी और विशेष समिति के पास पंजीकरण के बाद ही टेंडर भर सकेगी। जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि भारत सरकार सामान्य वित्तीय नियम, 2017 को संशोधित किया है ताकि उन देशों के बोलीदातओं पर नियंत्रण लगाया जा सके जिनकी सीमा भारत से लगती हैं। देश की रक्षा और सुरक्षा से जुड़े मामलों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।

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