तमिलनाडु और राजस्थान दो ऐसे प्रदेश हैं, जहां कुल श्रमशक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी कम है लेकिन मनरेगा के अंतर्गत निर्मित कार्यों में इनकी भागीदारी क्रमश: 82 एवं 69 प्रतिशत है। वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार और ओड़ीशा जैसे गरीब राज्यों में जहां पर रोजगार की अधिक जरूरत है, वहां महिलाओं की भागीदारी बहुत कम, मात्र 22 से 23 प्रतिशत ही है। इसके कारण भी देखें तो वही कृषि कार्यों में महिलाओं की अधिक संलग्नता सामने दिखेगा। धान की खेती मानव श्रम आधारित खेती है और उसमें महिला श्रमिकों की संख्या अधिक होती है पढि़ए कैवनिज टाइम्स में छपी नाजऩीन की रिपोर्ट

लाख मुसीबत सह कर आगे बढ़ती है नारी, आज भी अपने हक के खातिर लड़ती है नारी, और कहलाती है दुनिया की आधी आबादी… बात कर रहे हैं एक ऐसे वर्ग की जो समाज में तो दोयम दर्जे पर है लेकिन उसने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए और साबित कर दिया कि वह भी किसी से कम नहीं है। आज महिलाओं ने सभी क्षेत्रों में अपनी पहचान बना ली है। फिर वह चाहे अंतरिक्ष में उड़ान भरती हो, देश की रक्षा करती हो, घर की जिम्मेदारियां निभाती हो या फिर अन्न का उत्पादन करती हो। उसने सभी जगहों पे सफलता के झंडे गाड़े हैं। लेकिन खेतों में काम करने वाली महिलाओं और पत्थर तोड़ती महिलाओं के योगदान की गिनती सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में नहीं होती।

एक कमजोर महिला जो अपनी पीठ पर अपने बच्चे को बांध कर खेतों में काम करती है। उसके योगदान के बारे में कोई भी कल्पना कर सकता है। आमतौर पर कृषक महिलाएं मिट्टी तैयार करने, खेतों की जुताई और पानी की व्यवस्था, बीज बोना, कटाई के दौरान परिश्रम, भंडारण और उत्पादक तक में महिला खेतिहर मजदूरों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसके अलावा घर और बच्चों की देखभाल, चौपाया जानवर, घर के लिए पानी और खाना बनाने के लिए लकडिय़ां इकठ्ठा करती हैं, ताकि परिवार का भरण-पोषण कर सकें लेकिन अफसोस की बात है कि आज तक उनको वह अधिकार नहीं मिला है। अगर महिलाओं के किसानी में योगदान की बात करें तो इसमें भी महिलाओं का पुरुषों के मुकाबले 80 प्रतिशत योगदान है। खेतों में काम करने के मामलों में पुरुषों को महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा सक्षम माना जाता रहा है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक सेमिनार हुआ जिसमेंं यह बात आई कि महिलाएं महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक हैं। गोरखपुर इन्वायर्नमेंटल एक्शन ग्रुप (जीईएजी) की इस पहल में राज्य के कई इलाकों से आई महिलाएं भी शामिल थीं और उन सबने अपनी बात रखी और उनकी समस्याओं पर बातचीत हुई। यह बात तो उन महिलाओं की  आपबीती की तरह स्पष्ट हुई कि देश हो या उत्तर प्रदेश, श्रम-शक्ति का वामा-पक्ष पूरी तरह उपेक्षित है। जब अपने देश में व दुनियाभर में महिलाएं अपने अधिकार के लिए सडक़ों पर उतर रही हैं। तो महिला श्रमिकों और खास कर खेतिहर महिला मजदूरों की बदहाली के खिलाफ और उनके अधिकारों के लिए महिलाओं को ही आगे आना होगा। सभी वेतनभोगी मजदूरों और कर्मचारियों में महिलाएं एक तिहाई हिस्सा हैं। संगठित मजदूर वर्ग और महिलाओं के संघर्ष में उनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन असंगठित मजदूरों के अधिकार का संघर्ष भी असंगठित होकर रह गया है। ऐसे दलदल से बाहर निकालने में महिलाओं को हिस्सा लेना होगा। ‘जीईएजी’ के मीडिया कोऑर्डिनेटर जितेंद्र द्विवेदी ने बताया कि 2007 में 41 हजार से ऊपर जागृत महिला किसानों ने अपनी पहचान बनाने के लिए प्रदेश में अपने हित-अधिकार की आवाज बुलंद की। इसके लिए अन्य लोगों को भी उनका साथ देना चाहिए। 2008 में महिलाओं ने कृषि भूमि पर पतियों के साथ सहखाता खोलने की मांग की, इसमें उनके पतियों ने भी सहमति पत्र लगाए और सरकार के समक्ष यह मांग पेश की गई। सामाजिक योजनाओं में महिलाओं की सहभागिता और समाज व परिवार के मामलों में महिलाओं द्वारा पुरुषों के बराबर भाग लेने की जरूरत की मान्यता हो, इसके लिए यह संघर्ष जरूरी है।

आप देखिए न मनरेगा में क्या होता है। मनरेगा योजना के तहत कार्य करने वाले श्रमिक को प्रतिदिन 125 रुपए का मानदेय दिया जाता है। वहीं सरकारी कार्यक्रम के तहत विद्यालयों में पोषाहार बनाने वाली महिला श्रमिकों को प्रतिदिन 35 रुपए मानदेय दिया जा रहा है। ऐसा क्यों है? पोषाहार बनाने वाली महिला श्रमिक कम भुगतान मिलने के कारण अपने परिवार का पालन पोषण भी नहीं कर सकती है। इसका नतीजा यह हुआ है कि कई महिला श्रमिकों ने पोषाहार बनाने से ही मना कर दिया है। इस वजह से विद्यालयों में यह राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाना मुश्किल हो गया है। विद्यालयों में पोषाहार बनाने के लिए महिला श्रमिकों को सुबह 9.30 बजे से 2.30 बजे पोषाहार बनाना पड़ता है और उसके बाद विद्यार्थियों को खिलाना भी पड़ता है। उसके बाद बर्तनों को सफाई करने में उनका पूरा दिन गुजर जाता है। वहीं मनरेगा योजना में काम करने वाले श्रमिकों को दिनभर की मजदूरी के 125 रुपए मिल जाते हैं।

जिन राज्यों में गरीबी अधिक है वहां उम्मीद की जा रही थी कि मनरेगा के अंतर्गत महिलाओं की भागीदारी में बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि जिन राज्यों में अत्यधिक गरीबी है वहां पर महिलाएं मनरेगा में कम भागीदारी कर रही हैं। पूर्व में सार्वजनिक मजदूरी कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी उम्मीद से अधिक थी। 1970 से 2005 के बीच भारत में रोजगार या स्वरोजगार के 17 बड़े कार्यक्रम लागू किए गए थे। 2000 तक लागू किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, भूमिहीन ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना और रोजगार आश्वासन योजना के अंतर्गत कुल रोजगारों में से एक चौथाई पर महिलाएं काबिज हुई थीं। वहीं आई.आर.डी.पी. (समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम) और ग्रामीण युवाओं को रोजगार हेतु प्रशिक्षण देने के उपक्रम में 2000 तक महिलाओं की भागीदारी 45 प्रतिशत तक पहुंच चुकी थी।

तमिलनाडु और राजस्थान दो ऐसे प्रदेश हैं, जहां कुल श्रमशक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी कम है लेकिन मनरेगा के अंतर्गत निर्मित कार्यों में इनकी भागीदारी क्रमश: 82 एवं 69 प्रतिशत है। वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार और ओड़ीशा जैसे गरीब राज्यों में जहां पर रोजगार की अधिक जरूरत है, वहां महिलाओं की भागीदारी बहुत कम, मात्र 22 से 23 प्रतिशत ही है। इसके कारण भी देखें तो वही कृषि कार्यों में महिलाओं की अधिक संलग्नता सामने दिखेगा। धान की खेती मानव श्रम आधारित खेती है और उसमें महिला श्रमिकों की संख्या अधिक होती है।

देश में 90 प्रतिशत महिला श्रमिक या तो खेतिहर मजदूर हैं या सीमांत कृषक हैं। उनके द्वारा किए गए कार्य में से अधिकांश का भुगतान भी नहीं होता। अपने खेतों में कार्य करना भी बिना पैसे का काम है। मनरेगा ने इस स्थिति को थोड़ा बदला है। अब महिलाओं को भुगतान न किए जाने वाले कार्य जैसे भूमि का समतलीकरण और अपने ही खेतों में तालाब खोदने के लिए भी भुगतान किया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में इसके भुगतान को लेकर भीषण भ्रष्टाचार अवरोधक की तरह खड़ा हो जाता है।  जबकि दक्षिण के राज्यों या राजस्थान में भुगतान की बेहतरीन स्थिति है, इसलिए महिलाओं की सक्रियता भी काफी बढ़ी है। उत्तर प्रदेश मे 5 करोड़ से ज्यादा कामगार हैं। जिसमें 76 प्रतिशत पुरुष व 23 प्रतिशत महिलाएं हैं। महिलाओं के इस समूह में 41 प्रतिशत मजदूर व 34 प्रतिशत खेतिहर हैं जबकि पुरुषों में 20 प्रतिशत मजदूर व 42 प्रतिशत खेतिहर हैं। वास्तविक स्थितियों व जमीनी सच्चाइयों से परिचित लोगों को यह पता है कि कृषि से जुड़ी महिलाओं की संख्या कहीं अधिक है और 80 प्रतिशत लघु-सीमान्त किसान परिवारों की शायद ही कोई ऐसी महिला होगी जो खेती-मजदूरी के कामों से जुड़ी हुई न हो। वास्तव में खेती मजदूरी में उनका योगदान पुरुषों से कहीं अधिक ही है। जनगणना ही यह बता देती है कि कृषि कार्यों से महिलाओं के इतने अधिक जुड़ाव के बावजूद उनकी पहचान खेतिहर के रूप में कम, मजदूरों के रूप में ज्यादा है। यह एक ऐसा वर्ग है जिस पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया और उसके बाद भी उन्होंने वह कर दिखाया है जिसकी कोई आशा भी नहीं कर सकता है। महिला किसानों के अधिकारों व उनके हितों की बात की जाए तो कुछ प्रमुख चुनौतियां दिखाई देती है जिन पर काम किया जाना जरूरी है। इससे न सिर्फ महिलाओं के आत्मबल में वृद्धि होगी वरन् देश के कृषि के उत्थान में भी मदद मिलेगी।

गोरखपुर इन्वायर्नमेंटल एक्शन ग्रुप के लखनऊ में हुए सेमिनार में संतकबीरनगर से आईं महिला किसान शान्ती देवी कहती हैं कि हमारा आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है और अपने दम पर हम महिला किसानों ने जनसुनवाई का आयोजन किया जिसमें महिला किसानों की स्थानीय समस्याओं के साथ ही पट्टा आदि मुद्दा भी उठाया गया। अभियान और जनसुनवाई के प्रभाव का ही परिणाम है बहनों ने लगभग दो पीढिय़ों से दबंगों के कब्जे से महिला किसानों की जमीन मुक्त कराई। अब हमारा जो समूह है वह दिन-प्रतिदिन काफी मजबूत हो रहा है। सहारनपुर से आईं सुमेरी देवी का कहना था कि महिला किसान को पहचान दिलाने का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। खेती तो हम पहले से करते चले आ रहे थे, किन्तु अब हमें यह अहसास हुआ है कि हम भी किसान हैं और हमें भी वो सब सुविधाएं मिलनी चाहिए जो एक किसान को मिलती हैं। इस अभियान में महिला किसानों के किसान होने व महिला किसान को जमीन में पति के साथ सहखातेदार बनाने की बात कही गई।

शाहजहांपुर की रमा देवी ने कहा कि हम बहनें मिलकर सहखातेदारी के लिए सरकार को पत्र लिखेंगे कि सरकार महिला किसानों के सहखातेदारी के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी सहानूभूति पूर्वक विचार करें। महिला को किसान का सहायक नहीं अपितु महिला किसान समझा जाए। ये महिलाओं और इनकी तरह वह सारी महिलाएं जो कृषक का काम करती हैं उन्हें सिर्फ मजदूर नहीं समझा जाना चाहिए बल्कि उसे एक किसान की तरह ही वह सारी सुविधाएं देनी चाहिए जो एक किसान होने के नाते उनका हक है। महिलाओं की 80 प्रतिशत भागीदारी को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि भारत की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है जिनमें 60 प्रतिशत ग्रामीण किसानी करके अपना गुजर बसर करते हैं उनमें से जो 40 प्रतिशत महिलाएं हैं जो खेतों में काम करती हैं। 1990 में जब हजारों किसानों ने सूखे के कारण और कर्ज न चुका पाने के चलते आत्महत्या की थी तब आंध्रप्रदेश और महाराष्टï्र में महिलाओं की दारुण स्थिति के बारे में मीडिया ने देश को जानकारी दी थी। पति की मौत, बच्चों के पालन-पोषण और साथ ही कर्ज के भार ने उन्हें आधा कर दिया था। ऐसी विषम स्थिति में भी महिलाओं ने साहस के साथ काम किया और चुनौतियों का डट कर मुकाबला किया। जिन मांगों को लेकर महिलाएं आवाज उठा रही हैं वह जायज हैं। पुरुष किसान अभी तक महिलाओं को केवल अपना सहयोगी ही समझते थे, लेकिन अब उनको यह मान लेना चाहिए की वह भी एक किसान हैं। और इन किसानों को भी, तमाम योजनाओं का लाभ उठाने का हक है जो सरकार के द्वारा पुरुष किसानों के लिए चलाई जा रही हैं।

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