जिला पंचायत की राजनीति से हिस्ट्रीशीटर बने विकास दुबे ने शहर और कुछ गांवों में कब्जा जमाए रखा था। दबंगई का अंदाजा इसी से लगता है कि बिकरू से लगभग 40 किमी दूर स्थित घिमऊ जिला पंचायत निर्वाचन क्षेत्र में विकास का ही सिक्का चलता था। पिछले 20 साल में दस साल वह और उसकी पत्नी ही जिपं सदस्य हैं। वर्ष 2005 और 2010 में घिमऊ जिला पंचायत सीट पिछड़ा और एससी वर्ग आरक्षित जरूर रही लेकिन विकास के करीबी ही जीते।

बिल्हौर तहसील के घिमऊ जिला पंचायत निर्वाचन क्षेत्र में बिकरू गांव भी आता है। आतंक के बूते विकास इस सीट पर वर्ष 2000 से 2005 तक जिला पंचायत सदस्य रहा। वर्ष 2015 में सीट महिला के लिए रिजर्व हुई तो विकास ने पत्नी रिचा दुबे को मैदान में उतार दिया। रिचा वर्तमान में घिमऊ क्षेत्र से सदस्य है। वैसे बिकरू कभी कानपुर देहात के शिवली थानाक्षेत्र का गांव होता था पर राज्यमंत्री संतोष शुक्ल की हत्या के बाद यह गांव नगर के चौबेपुर थाने से जुड़ गया है। विकास का एक घर शिवली में भी है।

विकास से दोगुने वोटों से विजयी हुई थी रिचा
वर्ष 2000 में विकास दुबे 1854 मतों से विजयी हुए थे, जबकि उनकी पत्नी रिचा 2015 के चुनाव में 3000 से अधिक मतों से विजयी जीती। वर्ष 2015 के जिला पंचायत सदस्य चुनाव के प्रत्याशी रहे संतोष वाजपेयी का दावा है कि विकास अपने वर्चस्व वाले गांवों में पूरा बूथ कब्जा कर लेता है। घिमऊ न्याय पंचायत का अधिकतर हिस्सा बिकरू के आसपास का जुड़ा है।

पत्नी कभी प्रचार में नहीं निकलती थी
वर्ष 2015 के चुनाव में रिचा दुबे भले ही घिमऊ जिला पंचायत सीट से विजयी हुई हो पर वह कभी प्रचार को नहीं निकली। रानेपुर निवासी राजेश व रमाकांत का कहना है कि मतदान के एक दिन पहले विकास या फिर उनके साथी गांवों आकर फरमान जारी करके चले जाते थे। इसी दहशत की वजह से उनकी पत्नी बिना प्रचार पर निकले ही सदस्य चुनी गईं।

ईंट-भट्ठों और कोल्ड स्टोरों में जमाता था महफिल
हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे बिकरू के आसपास के गांवों की राजनीति करता था। पंचायत चुनाव में भी इन्हीं गांवों में उसका दखल रहता था लेकिन विधानसभा या लोकसभा में किसी न किसी की मदद करता रहा। बड़े नेताओं को वोट दिलाता था और उनसे अपने गुनाहो के लिए  मदद मांगता रहा। हर सरकार में उसके करीबी नेताओं की कमी नहीं थी। पिछले 20 साल से नगर व देहात की ग्रामीण राजनीति में सक्रिय ही नहीं था बल्कि सपा-बसपा की सरकार हो या फिर अन्य दलों की रही हो, हर एक में उसका रुतबा गालिब रहा है। वर्ष 2007 से 2017 तक विकास आतंक के बूते चौबेपुर से लेकर लालपुर तक और घिमऊ से लेकर बिल्हौर तक बने कोल्ड स्टोरेजों, ईंट-भट्ठों में बैठकें करता था। यही वजह रही कि कई सालों से बिल्हौर इलाके के रहने वाले लोग ही जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज रहे।

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