1हिन्दी और गुजराती के साहित्यकार, चर्चित कार्टून पात्र ढ़ब्बू जी और बहादुर के निर्माणकर्ता, प्रसिद्ध पेंटर और समाजसेवी आबिद सुरती जी की शख्सियत वास्तव में प्रेरणादायी है। जीवन के तमाम झंझावातों और अच्छे-बुरे दिनों को शिद्दत से जीते हुये आबिद सुरती हमेशा खुशमिजाज बने रहते हैं। 78 साल की उम्र में भी बेहद सक्रिय और महाराष्ट्र में पानी की एक-एक बूँद बचाते हुये लोगों को जल संरक्षण के लिये सजग भी कर रहे हैं। अपने कार्टून चरित्रों की तरह दृढ़निश्चयी और मुंबई में ड्रॉप डेड के संस्थापक आबिद सुरती से सोनी किशोर सिंह ने लम्बी बातचीत की… प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंशः
ड्रॉप डेड क्या है?
ड्रॉप डेड एक एक ऐसा एनजीओ है जो पानी की बर्बादी को रोकता है। वन मैन आर्मी वाले इस अभियान को संचालित कर रहे आबिद सुरती जी मुंबई के कई इलाकों में जाकर लोगों के लीक हो रहे वाटर टैप को मुफ्त में ठीक करते हैं। एक प्लंबर और एक वोलन्टियर की मदद से इन टैपों में लगे खराब रबर गैस्केट को बदल कर नया लगाया जाता है और पानी लीक होने की समस्या को ठीक किया जाता है। इस मुहिम को सेव एवरी ड्रॉप और ड्रॉप डेड का नाम दिया गया है।
ड्रॉप डेड की प्रेरणा कहाँ से मिली आपको?
मेरा बचपन काफी मुसीबतों में बीता। मैं जिस जगह रहता था वहाँ पानी की काफी किल्लत होती थी। मैंने पानी की एक-एक बूँद के लिये लोगों को तरसते देखा है, इसलिये मुझे शुरु से ही पानी का महत्व पता था। लेकिन सन 2007 में एक दिन अचानक जब मैं अपने दोस्त के घर बैठा था तो उसके लीक होते पानी के नल पर मेरा ध्यान चला गया। मैंने जब उससे इसका जिक्र किया तो उसने लापरवाही से इस बात को टाल दिया। उसी दौरान एक अखबार में मैंने आर्टिकल पढ़ा कि अगर हर सेकेंड एक बूँद पानी टपकता है तो एक महीने में एक हजार लीटर पानी बर्बाद होता है। तभी मैंने निश्चय किया कि अपने स्तर से पानी की इस बर्बादी को रोकना है और ड्रॉप डेड अस्तित्व में आया।
आपके प्रसिद्ध कार्टून कैरेक्टर ढब्बू जी को काफी प्रसिद्धि मिली, इसके बारे में विस्तार से बताइए।
ये मैंने धर्मयुग पत्रिका के लिये कार्टून स्ट्रिप बनाई थी। ढब्बू जी काले कपड़ों में और छोटी कद काठी के थे। इस चरित्र की प्रेरणा मुझे अपने पिता जी (जो वकील थे) से मिली। दरअसल धर्मयुग पत्रिका में छापने के लिये सिर्फ कुछ हफ्तों के लिये धर्मवीर भारती जी ने मुझे कोई कार्टून कैरेक्टर बनाने को कहा क्योंकि बाद में वो किसी प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट को कार्टून बनाने के लिये बुलाने वाले थे। इस बीच उन्होंने मुझे कुछ हफ्तों तक कोई कार्टून बनाने को कहा। तब मैंने अपने एक पुराने चरित्र को ढब्बू जी के नाम से छपवाना शुरू किया। लेकिन कुछ हफ्तों के लिये शुरू ये कार्टून कैरेक्टर लोगों को इतना पसंद आया कि उसे धर्मयुग ने नियमित कर दिया। फिर इसे कॉमिक्स का भी रूप दिया गया।
कार्टून बनाने की प्रेरणा कैसे मिली आपको>?
दूसरे महायुद्ध की बात है जब अंग्रेज सैनिक ट्रेन में बैठकर यहाँ आते थे और डॉक एरिया में उतरते थे और डॉक एरिया में उतरते थे। वहाँ से वो छोटी सी गाड़ी में बैठ कर वीटी स्टेशन पर जाते थे। हम सारे बच्चे, सैनिक जो फेंकते थे उसे उठा लेते थे। एक बार सैनिकों ने एक कॉमिक फेंकी। सभी बच्चे छीना-झपटी करने लगे। किसी के हाथ में दो पन्ने तो किसी के हाथ में चार पन्ने आये। किस्मत से मेरे हाथ में भी एक पन्ना आ गया। वो पन्ना था मिक्की माउस का था। उसे देखकर मुझे लगा कि ऐसा तो मैं भी बना सकता हूँ और मैंने उसकी नकल करना शुरू कर दिया। एक के बाद एक करते हुए उसके सौ से ज्यादा स्केचेज बना डाले।
कार्टून की शुरुआत कब और कैसे हुई?
मैंने पहली बार टाइम्स ऑफ इंडिया के लिये कार्टून बनाया। उसके बाद धर्मयुग में ढब्बूजी बनाया जो 15 रुपये में बिका और फिर तो धर्मयुग का वर्षों का साथ रहा। धर्मवीर भारती अक्सर कहते थे कि आबिद ने धर्मयुग को हिन्दी के बजाये उर्दू बना दिया क्योंकि पाठक धर्मयुग को आखिरी पन्ने से पढ़ना शुरू करते हैं।
साहित्य और कला दोनों में समान अधिकार है आपका। ज्यादा किसे पसंद करते हैं?
मैं वस्तुतऋ एक कलाकार हूँ। मैं सबसे ज्यादा पेंटिंग को पसंद करता हूँ। जहाँ तक साहित्य की बात है तो लिखना मैंने इसलिये शुरू किया था कि पेंटिंग को सपोर्ट कर पाऊँ। परिवार चलाने के लिये लेखन से पैसे आते थे इसलिये मैं लेखन करता रहा। पेंटिंग बड़ी एक्सपेन्सिव हॉबी है, राईटिंग से मुझे सपोर्ट मिलेगा, मैंने यही सोचा लेकिन पेंटिंग को सपोर्ट नहीं कर पाया। फिर मैंने कार्टूनिंग शुरू कर दी। इसलिये कार्टूनिंग से मेरा कोई कमिटमेंट नहीं था। राईटिंग से मेरे घर का राशन चलता था।
यानि आबिद सुरती सबसे ज्यादा एक पेंटर के रूप में अपने आपको पसंद करते हैं?>
जी बिल्कुल। पेंटिंग के लिये मेरा जुनून ही था कि जब मेरे जीवन में एक दौर ऐसा आ गया कि न राशन के लिये पैसे थे, न कैनवास के लिये, किसी तरह से गुजर-बसर हो रही थी तब मैंने अपनी दीवारों पर ही पेंटिंग करना शुरू किया। फिर फर्नीचर पर। घर में जो कुछ भी दिखा सब पर पेंटिंग किया। फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया।
आप दूसरे पेंटर की तरह ब्रांड में भरोसा करते हैं ?
मैं ब्रांड नहीं बन पाया। इसकी वजह ये है कि मैं हमेशा कुछ नया देने की कोशिश करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि हर बार कुछ न कुछ नया करूँ। मैंने मिरर कोलाज शुरू किया। जो बहुत ही कामयाब रही। मैंने उसकी तीन प्रदर्शनियाँ लगाईं और सारी की सारी बिक गईं। लेकिन मैंने उसे बंद कर दिया क्योंकि मैं एक ही तरह की पेंटिंग करके फेमस नहीं होना चाहता। बाद में मैंने और प्रयोग किये। मेरी पेंटिंग देखकर कोई ये नहीं बता सकता कि मैंने बनाया है क्योंकि मैं हर बार अलग-अलग तरह का काम करता हूँ। जबकि बाकी पेंटर्स की पेंटिंग देखकर दर्शक बता देते हैं कि अमुक पेंटर की पेंटिंग है। मेरी दुविधा ये थी कि मैं ब्रांड बनूँ या ना बनूँ और मैंने तय किया कि मुझे ब्रांड नहीं बनना। क्योंकि मुझे नये प्रयोग करने में आत्मसंतोष मिल रहा है। अगर एक ही तरह का काम करूँ तो मैं फैक्ट्री बन जाऊँगा।

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ढ़ब्बू जी के जनकः आबिद सुरती
प्रसिद्ध चित्रकार, कार्टूनिस्ट, समाजसेवक और हिन्दी तथा गुजराती के साहित्यकार आबिद सुरती का जन्म 5 मई, 1935 को राजुला, गुजरात के एक सम्पन्न घर में हुआ। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कुछ वर्षों बाद उनका शिपिंग का कारोबार ठप पड़ गया और आबिद जी अपने माता-पिता के साथ मुम्बई आ गये। इसी बीच बीमारी की वजह से उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनका बचपन घोर गरीबी में बीतने लगा। फाकांकशी के दिनों में उनकी माँ मेहनत-मजदूरी करके उन्हें पालने लगी और खुद आबिद सुरती जी सड़कों पर चिक्की और मीठी गोली बेचने लगे। अपनी गरीबी को दूर करने के लिये उन्होंने कार्टून बनाना स्कूल के दिनों से ही शुरू कर दिया था जो लोगों को काफी पसंद आने लगा था। फिर उन्होंने कार्टून बेचना शुरू किया जिससे आमदनी होने लगी और फिर उन्होंने जे.जे. कॉलेज ज्वाइन किया। आबिद जी कहते हैं कि तीन शख्स उन्हें बहुत याद आते हैं, एक डॉ. चीनवाला जो फोटोग्राफर और अच्छे लेखक थे, दूसरे मुश्ताक जलील जो फिल्म स्क्रिप्टिंग मंव माहिर ते और तीसरे थे युसूफ जो चित्रकार थे। इन तीनों ने मिलकर मेरा ऐसा मार्गदर्शन किया कि उनका अहसान मैं आज तक नहीं भूल पाया।
जुलाई 1963 में हिन्दी साहित्यिक पत्रिका धर्मयुग में शुरू हुआ उनका कार्टून का सफर ढ़ब्बू जी ने उन्हें लोकप्रियता के आसमान पर बिठा दिया। उनका कार्टून कैरेक्टर ‘बहादुर’ तो आम लोगों ही नहीं बल्कि सिने जगत की कई लोकप्रिय हस्तियों का पसंदीदा कैरेक्टर है। कार्टून और चित्रकला के साथ ही उन्होंने लेखन की सभी विधाओं में रचना की है। अबतक उनकी 80 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आबिद जी ने कहानियों और उपन्यासों के अलावा कुछ गजलें, नाटक और फिल्म स्क्रिप्ट भी लिखी हैं। बिज्जू, आतंकित, कैनाल, कोरा कैनवास, कोटा रेड जैसी चर्चित कहानियाँ और कई चर्चित उपन्यास लिखने वाले आबिद जी आज भी पूरी तरह से सक्रिय और समाजसेवा से जुड़े हैं।

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