विनायक राजहंस
कक्का जी जब नीम की दातुन अपने बचे-खुचे दांतों पर रगड़ते हैं तो ऐसा लगता है जैसे संगेमरमर के छोटे-छोटे टुकड़े तराश रहे हों। दातुन करने के बाद जब कुल्ला करते हैं तो मोती से जगमगाते दंत सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए एक अनुशासन में दूर-दूर खड़े नजर आते हैं। बीच-बीच के दांत कबका कक्का जी से नाता तोड़ चुके। कक्का जी अब अपनी बच्ची हुई दौलत को बड़े जतन से सहेजकर रखते हैं। देखना है, इनमें से कौन-कौन अंतिम समय तक साथ निभाता है।
दातुन के जमाने से टूथपेस्ट का दौर देखने वाले कक्का जी ने कभी सूखा या गीला मंजन नहीं किया। नीम या बबूल की दातुन ही उनके संगी बने रहे। इसीलिए उनके दांत आज भी झकाझक हैं, और दर्द भी नहीं होता। मजबूत इतने कि बचे-खुचे औजार से गन्ने को फाड़कर रख दें।
आज दातुन को ऐसे भुला दिया गया है, जैसे वह पाषाण काल की कोई चीज हो। जिनके घर-आंगन में नीम का पेड़ होता है, वे भी जब टीवी पर देखते हैं कि टूथपेस्ट नहीं करेंगे तो दातों में कैविटी हो जाएगी, तो पेस्ट खरीदने दौड़ पड़ते हैं। जबकि टूथपेस्ट के अब्बा तो उनके घर में ही हैं। आखिर घर की मुर्गी दाल बराबर ही होती है।
दांतों के लिए दातुन से बेहतर कुछ नहीं… यह हम जानते हैं, सब जानते हैं पर मानते नहीं। कथित आधुनिकता के ढोंग में सुविधाभोगी होता जा रहा इंसान पेड़ से दातुन तोड़कर, उसकी कूची बनाकर दांत साफ करने से गुरेज करता है।
जब टूथपेस्ट का अविष्कार नहीं हुआ था तब सब अपने दांतों को साफ रखने के लिए दातुन का ही इस्तेमाल किया करते थे। दातुन करने से दांतों में मजबूती तो आती ही है, साथ ही मुंह के तमाम बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं। हालांकि गांव-देहात में आज भी लोग दांतों की सफाई के लिए दातुन का प्रयोग करते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या काफी कम है। अब टूथपेस्ट्स और ब्रश ने दातुन की जगह ले ली है। इन पेस्ट में काफी मात्रा में केमिकल्स मिलाए जाते हैं। यह दांतों की सफाई तो कर देते हैं लेकिन उनकी वजह से मसूढ़ों में तकलीफ भी होने लगती है। दांत की ऊपरी परत भी क्षरित होती है।
दातुन आज भले कम इस्तेमाल किया जाता हो, पर इससे दातुन की उपयोगिता और औषधीय गुण खत्म नहीं हो जाते। दातुन के उपयोग का सबसे बड़ा समर्थक आयुर्वेद है। आयुर्वेद के अनुसार कफ दोष को दूर करने के लिए हर सुबह पेड़ों की टहनियों को तोड़कर बनाए गए दातुन का प्रयोग सबसे बेहतर होता है।
महर्षि वाग्भट के ‘अष्टांगहृदयम’ में दातुन के बारे में बताया गया है। वे कहते हैं कि दातुन वो कीजिए, जो स्वाद में कड़वी हो और नीम की दातुन कड़वी ही होती है। उन्होंने नीम से भी अच्छी एक दातुन बताई है- मदार की दातुन। इसके अलावा महर्षि ने कई अन्य दातुनों का भी उल्लेख किया है- जिनमें बबूल, अर्जुन, आम, अमरूद जामुन, महुआ, करंज, बरगद, अपामार्ग, बेर, शीशम, बांस इत्यादि हैं। ऐसे 12 वृक्षों का नाम उन्होंने बताया है जिनके दातुन आप कर सकते हैं। हालांकि इन सबमें नीम सबसे उत्तम है।
चैत्र के महीने से शुरू कर के गर्मी भर नीम, मदार या बबूल की दातुन, सर्दियों में अमरूद या जामुन की और बरसात के लिए उन्होंने आम या अर्जुन की दातुन करने को बताया है। वैसे नीम की दातुन साल भर की जा सकती है।
दातुन के फायदे इतने हैं कि पूछो मत। जैसे नीम में एंटी बैक्टीरियल गुण होने के कारण दांतों में कीड़ों से बचाव, दांतों के दर्द में असरदार, दांतों का पीलापन दूर करे, मसूड़ों की मजबूती, पायरिया का उपचार और प्राकृतिक माउथ फ्रेशनर भी है दातुन।
लोक जीवन में दातुन सिर्फ दांत साफ करने का ही माध्यम नहीं, कला और गीत-संगीत से भी इसका जुड़ाव है। झारखंड की लोककला कोहबर, जो मूलतः चित्रकला है, में रंग भरने के लिए प्राकृतिक ब्रश का इस्तेमाल होता है। इसके लिए दातुन से चित्र उकेरे जाते हैं। बुंदेलखंड और ब्रज में दातुन गीत गाने की भी परंपरा है, जो कृष्ण और राधा की जीवन चर्या से संबंधित होते हैं।
मैं भी गांव में अक्सर दातुन का ही इस्तेमाल करता हूं। और जब बुद्धू बक्सा पूछता है कि क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है, तो मैं हंस पड़ता हूं। कहां ढूंढने जाएं नमक! कैसे ढूंढे नमक! हमारे पास तो टूथ स्टिक है, जिसमें सेहत का रस भरा हुआ है, नमक नहीं।
तो सवाल ऐसे पूछना चाहिए- क्या आपकी दातुन में रस है?
विनायक राजहंस की फेसबुक वाल से साभार

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