पूरी दुनिया जब कोविड महामारी का सामना कर रही है तो इस बीच ग्लोबल वार्मिंग को लेकर एक चेताने वाला शोध सामने आया है। यह बताता है कि अमेरिका में 1930 के दशक में ‘डस्ट बाउल’ काल जैसी गर्मी पड़ने की आशंका अब ढाई गुना ज्यादा है।

नेचर में प्रकाशित यह अध्ययन हालांकि अमेरिका आधारित है लेकिन इसके संकेत पूरे विश्व के लिए हैं क्योंकि बढ़ती गर्मी का सामना भारत समेत तमाम देश कर रहे हैं। यहां तक कि यूरोप भी। अध्ययन में कहा गया है पहले यह माना गया था कि ‘डस्ट बाउल’ जैसी गर्मी सौ साल में एक बार पड़ सकती है लेकिन अब 40 साल में यह स्थिति पैदा हो सकती है। उम्मीद की जा रही है कि यह परिणाम कई देशों पर लागू हो सकते हैं।

अमेरिका में सबसे ज्यादा गर्मी: 1934-1936 के बीच पड़ी थी। भारी गर्मी के कारण सूखा पड़ा और धूल भरी आंधियां चलीं, जिनसे फसलों को भारी क्षति हुई थी। इस घटना को ‘डस्ट बाउल’ के नाम से जाना जाता है।

तपती गर्मी बेहद दुर्लभ घटना थी: यूनिवर्सिटी आफ सदर्न क्वींसलैंड ने यह शोध किया है कि1930 के दशक में मानव की गतिविधियों की वजह से पैदा होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का स्तर कम था, मगर ऐतिहासिक ‘डस्ट बाउल’ तपती गर्मी की पुष्टि करती है। अध्ययन के मुख्य लेखक और यूनिवर्सिटी के रिसर्च फेलो टिम कोवन ने कहा कि ‘डस्ट बाउल’ काल की तपती गर्मी बेहद दुर्लभ घटना थी और माना गया कि 100 साल में ऐसा एक बार होता है।

वैश्विक खाद्य प्रणालियों पर भी असर पड़ेगा: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एनवॉयरमेंटल चेंज इंस्टीट्यूट के कार्यवाहक निदेशक और अध्ययन के सह लेखक फ्रीडीराइक ओटो ने कहा कि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति होने से बुरा असर न सिर्फ अमेरिका पर ही नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य प्रणालियों पर भी पड़ेगा। अध्ययन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा तैयार किए गए जलवायु मॉडल का इस्तेमाल किया गया है।

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