देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और अब राज्यसभा सांसद रंजन गोगोई ने कहा है कि ऐसे जजों पर सवाल क्यों नहीं उठाए जाते जो सेवानिवृत्त होने के बाद एक्टिविस्ट बन जाते हैं। सौ में से 70 जज सेवानिवृत्त होने के बाद सरकारी पद ग्रहण करते हैं। क्या इससे न्यायपालिका की आजादी से समझौता हो गया। गोगोई सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के बाद राज्यसभा की सदस्यता लेने पर की गई अपनी आलोचनाओं के जवाब में एक वेबिनार में बोल रहे थे, जिसे राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के एल्युमनी कन्फेडरेशन ने आयोजित किया था।

उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त होने के बाद जजों का सरकारी पद ग्रहण करने से न्यायपालिका की स्वायत्ता से समझौता नहीं होता। यह किसी की व्यक्तिगत समझ या सोच हो सकती है। जब तक आप अपने कार्य में साफ या सच्चे हैं, कोई समस्या नहीं है।

कौन मंच मुहैया करा रहा: गोगोई ने कहा कि एक्टिविस्ट जज किसके साथ काम कर रहे हैं। इस पर कोई सवाल क्यों नहीं करता। इन जजों पर ये सवाल भी नहीं उठाए जाते कि उनके बयान उन फैसलों से जुड़े हैं जो उन्होंने बेंच में रहते हुए दिए हैं।

तीन तरह के सेवानिवृत्त जज: 
गोगोई ने कहा कि तीन तरह के सेवानिवृत्त जज होते हैं, एक हैं सेवानिवृत्त एक्टिविस्ट जज, जो सेवानिवृत्त होने के तुरंत बाद कई चीजें बोलते हैं, जो वे ऑफिस में रहकर नहीं बोलते। ये बोलने की आजादी और न्यायिक प्रणाली के बारे में होता है।

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