पवन सिंह
घोटाले का ताना-बाना कभी एक आदमी नहीं बुनता। उसके पीछे एक बड़ा गैंग काम करता है और यह भी आश्चर्य होता है कि अरबों रूपए का फर्जीवाड़ा हो जाता है और रिर्जव बैंक व सरकार को कानों-कान खबर तब होती है जब चिड़िया खेज चुग कर निकल चुकी होती है। एक कहावत कही जाती है कि घर को आग लग गई घर के चराग से, तो कुछ ऐसा हुआ है देश के बैंकों के साथ भीं। बैंक के कर्मचारी ही अपने बैंक को उद्योगपतियों व जालसाजों के साथ मिलकर तबाह कर गये।
बैंकों में हुए घोटाले को लेकर आईआईएम, बंगलुरू द्वारा एक अध्ययन किया गया था जिसमें सामने आया कि वर्ष 2012 से वर्ष 2016 के बीच सरकारी बैंकों का 22 हजार 743 अरब रूपए डूब चुके हैं। अकेले 2017 में 179 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ। खुद रविशंकर प्रसाद ने रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के आंकड़ों का हवाला देते हुए यह संसद को यह बताया था कि 21 दिसंबर से लेकर दिसंबर 2017 तक 179 करोड़ रूपए के बैंक फर्जीवाड़े के 25 हजार 800 से ज्यादा केस सामने आए। तमाम फर्जी लोन को स्वीकृति करने व अरबों रूपए के खेल में बड़ी संख्या में बैंकों के अधिकारी व कर्मचारी शामिल रहे हैं।
मार्च, 2017 के आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016-17 में स्टेट बैंक के 64 कर्मचारी व अधिकारी, एचडीएफसी के 49 कर्मचारी, ऐक्सिस बैंक के 35 कर्मचारी भ्रष्टाचार में शामिल पाए गये। अप्रैल से दिसंबर 2016 के बीव 177.50 अरब रूपए के फर्जीवाडे के 3870 केस दर्ज करावाए गये जिसमंे 450 कर्मचारी शामिल पाए गये थे। कुछ खास घटनाओं का जिक्र कर दूं इलेक्टोथर्म इंडिया नाम की कंपनी ने सेंट्ल बैंक ऑफ इंडिया को 4.36 अरब रूपए का चूना लगा दिया,। कोलकाता के व्यापारी विपिन वोहरा ने भी 1.04 अरब रूपए का लोेन लेकर सेंट्ल बैंक आॅफ इंडिया से लिया और वह खा-पीकर बराबर कर गया। इसी तरह से सिंडीकेट बैंक के पूर्व चेयरमैन व एमडी एम के जैन द्वारा रिश्वत लेकर 80 अरब रूपए का लोन जारी कर दिया गया जो डूब गया। फर्जी लोन के खेल का स्तर देखिए कि विभिन्न बैंकों के कर्मचारियों ने फारेन एक्सचेंज में 60 अरब रूपए का खेल कर दिया। इस खेल में नकली हांगकांग काॅरपोरेशन का भी सहारा लिया गया। वर्ष 2016 में चार लोगों ने सिंडिकेट बैंक में 386 एकाउंट खुलवा कर जाली चेक लेटर आफ क्रेडिट्स और एलआईसी पाॅलिसी के जरिए 10अरब का चूना लगा दिया।
सीबीआई ने दो सरकारी बैंकों को 2.09 अरब रूपए का नुकसान पहुंचाने के आरोप में अभिजीत ग्रुप के प्रमोटर्स व केनरा बैंक के पूर्व डीजीएम को दबोचा था। इनफोर्समेंट डायरेक्टेट यानी ईडी ने आंध्रा बैंक के डायरेक्टर को पांच अरब के बैंक लोन घोटाले में दबोचा। इस घोटाले में गुजरात की एक फार्मा कंपनी के मालिक शामिल थे, इस दवा कंपनी के प्रमोटर्स का क्या हुआ, इस पर खामोशी है। यही नहीं सीबीआई ने 8.36 अरब रूपए के घोटाले के मामलें में बैंक आप महाराष्ट् के पूर्व जोनल हेड व सूरत की एक निजी लाॅजिस्टिक्स कंपनी के निदेशक के अभियोग पंजीकृत किया है। बैंक के एक बड़े अधिकारी ने पिछले दिनांे मुझसे बातचीत में बताया था कि आप केवल बैंकों के कर्मचारियों व निदेशकों को ही दोषी करार दे, यह उचित नहीं है। वह कहते हैं कि इसमें राजनैतिक स्तर पर भी लोन देने का जबरदस्त दबाव रहता है। वह कहते हैं कि इतने उपर से दबाव बाता है कि बैंक का निदेशक या चेयरमैन या तो नौकरी से त्यागपत्र दे दे या फिर फाइल पर हस्ताक्षर कर दें। यानी बैंकिंग सेक्टर में हो रहे अरबों रूपए के फर्जीवाड़ा एक बड़ा नेटवर्क करता है जिसमें उद्योगपति से लेकर नेता व बैंक अधिकारियों व कर्मचारियों तक की पूरी फौज शामिल होती है।…वरना अकेला चना कहां भाड़ फोड़ सकता है।

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