अब इस देश को सरकार नही बल्कि अदालतें चला रही हैं और चुने हुए हमारे नेताओं से कहीं अच्छा चला सकती हैं । राजीव गांधी के हत्यारों के मामले में उच्चतम अदालत का फैसला सरकार को न सिर्फ एक झटका है बल्कि संदेश भी । बडी विनम्र्ता से अदालत ने यह भी कह दिया कि संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के लिए कुछ कहना सही नही होगा ।
सच भी है। यह कोई पहला मामला नही है । आज भी तमाम दया याचिकाएं वर्षों से फैसले का बाटजोह रही हैं । राज्यपाल व राष्ट्र्पति बदलते रहते हैं लेकिन दया याचिकाओं की फाइलें धूल खाती रहती हैं । यही नही, अति विलम्ब से निस्तारित की गई दया याचिकाएं विवाद का विषय भी बनती हैं । अफजल गुरू को देर से दी गई फांसी का मामला सामने है। बीतते समय के साथ, निस्तारण न होने के पीछे राजनीतिक कारण भी तलाशे जाने लगते हैं । यहां सवाल यह भी है कि अगर इतनी महत्वपूर्ण फाइलें किसी सरकारी बाबू या अफसर के पास इतने समय तक लंबित पडी रहती तो क्या उसे सरकार सस्पेंड या टरमिनेट नही करती ? जरूर करती । तो क्या यह मान लिया जाए कि ससंद व कार्यपालिका के लिए नैतिकता के मापदंड अलग अलग हैं ।
माना कि इन याचिकाओं के निस्तारण हेतु संविधान में कोई समय सीमा का प्राविधान नही है लेकिन इसका मतलब यह भी नही कि कोई व्यक्ति फैसले के इंतजार मे रोज तिल तिल कर मरता रहे । यह तो फांसी से भी बडी सजा है। ससंद मे बैठ कर कानून बनाने वाले हमारे राजनेता क्या कभी इस मानवीय पहलू पर भी सोच पायेगें और खाश कर वे जिन्हे यह संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं ?bist ji

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