मूलतः वैशाली, बिहार की रहने वाली सोनी किशोर सिंह ने राजनीतिशास्त्र से स्नातक करने के बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर किया। छात्र जीवन से ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया एवं आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिये उद्घोषिका के रुप में कार्य किया। साहित्यिक अभिरुचि और लेखकीय कौशल के मद्देनजर विभिन्न विज्ञापन एजेंसी, अखबार, पत्रिकाओं एवं समाचार चैनलों में कार्य किया। कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ एवं कवितायें प्रकाशित एवं डॉक्यूमेन्ट्री तथा फीचर फिल्म व टीवी धारावाहिकों के लिये स्वतंत्र लेखन। सोनी मुम्बई के एक मीडिया हाऊस से जुड़ी हैं और समय समय पर अपनी संवेदनाओं को कलम से उड़ेलती हैं पढि़ए उनकी मार्मिक रचना

आलि! आलि! उठो बेटा, आज कॉलेज नहीं जाना है क्या? आलि लेटे-लेटे ही बोली, ‘नहीं माँ, तबीयत ठीक नहीं लग रही, आज नहीं जाउँगी।‘ पार्वती देवी सोच में पड़ गयीं। जितनी चिंता अपनी इकलौती बेटी की खराब तबीयत की बात सुनकर नहीं हुई उससे ज्यादा यह सुनकर की वह कॉलेज नहीं जा रही। आलि जिसे पढ़ने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं और कभी बीमार हो तो भी लाख मना करने के बावजूद कॉलेज जाने की जिद नहीं छोड़ती। आज अचानक उसका बेलाग कहना कि कॉलेज नहीं जाना, पार्वती देवी को अखर सा गया। धीरे से बेटी के सिराहने जाकर सर पर हाथ रखा, हल्का बुखार था। सिर पर हथेलियों का स्पर्श पाकर आलि ने आँखें खोल दी और मुस्कुराकर बोली, “आप परेशान मत हों, आज तो कॉलेज की छुट्टी है।”

अगले दिन से आलि अपनी दिनचर्या में बँध गयी। परीक्षाएं हुयी और वह अच्छे नम्बरों से पास होकर स्नातक बन गयी। परंतु आलि का बचपन यथावत था। वह हँसती तो खूब हँसती अन्यथा उदासी और गांभीर्य जो उसे प्रकृति से मिला था, खूब सहेज कर रखती। माँ आगे की पढ़ाई के लिए कहती तो वो हँसकर टाल देती। एक दिन पार्वती देवी ने पूरी गंभीरता से प्रश्न रख ही दिया, “ आलि! मैंने तुम्हे लेकर बहुत सारे सपने देखें हैं, मैं चाहती हूँ कि तुम खूब पढ़ो, पढ़-लिखकर कोई अच्छी सी सरकारी नौकरी हो जाये, यही मेरी इच्छा है। लेकिन तुम आगे पढ़ने से टाल-मटोल कर रही हो, आखिर तुम चाहती क्या हो?”
आलि भी गंभीर हो उठी! “माँ अब मैं आगे नहीं पढ़ूँगी। सरकारी सेवा में जाना तो एक ऐसे बंधन में बँधना है जहाँ हमारी स्वयं की विचारधाराओं का गला घोंट दिया जाता है। न चाहते हुए भी भ्रष्टाचार और चाटूकारिता से मैं ग्रसित हो जाउँगी। माँ, क्या पढ़ाई का लक्ष्य सिर्फ सरकारी सेवा या येन-केन-प्रकारेण अपने अध्ययन पर किये गये धन और परिश्रम के व्यय को सूद समेत निकाल लेना है? हम उसी समाज को घुन की तरह खोखला करने लगते हैं जिसमें हम पले-बढ़े और उस शिखर पर जा बैठे जहाँ से आराम से हम लोगों का शोषण करने लगते हैं। नहीं माँ, यह मुझसे संभव नहीं है और न हीं आप ऐसा चाहेंगी कि मैं सत्ता और अधिकारों के बल पर ऐसा कुकृत्य करुँ। माँ ऐसे हजारों लोग हैं जिन्हे सहारे की जरुरत है। भले ही मैं उन्हें आर्थिक संबंल न दूँ लेकिन भावनात्मक संबंल देकर उन्हें मुख्य धारा से जोड़ सकती हूँ। ऐसे हजारों लोग हैं जो इतने निर्मल हो चुके हैं कि अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का सामर्थ्य खो चूके हैं, जो थोड़ी बहुत आवाजें निकलती भी हैं वो भ्रष्टाचार तंत्र की मोटी दीवारों से टकरा कर लौट जाते हैं। मैं उन्हें अपनी आवाज दूँगी। अपने स्वर के साथ उनकी आवाजों, कराहों, पीड़ाओं को मिलाउँगी फिर एक ऐसी महाध्वनि बनेगी कि उन दीवारों को भेदते हुए अंदर के कानों को कंपित कर देगी। माँ, जीवन स्वयं के सुख के लिए नहीं है। अपने लिए तो सभी जीते हैं, मैं दूसरों के लिए जीना चाहती हूँ। मेरा जीवन तो स्वयं परिपूर्ण हो जायेगा गरीबों की दुआओं और मुस्कुराहटों से। माँ, मैं तुम्हारे सपनों को तोड़ नहीं रही हूँ, उनकी दिशाओं को बदल रही हूँ और यही दिशाएँ मुझे मंजिल तक ले जायेंगी। मैं तुम्हारा नाम जरुर रौशन करुँगी। देखना तुम्हे गर्व होगा एक दिन मेरे इस निर्णय पर।”
आलि को लगा कि वह ज्यादा बोल गई। पर अपनी बातों को समझाने के लिए तो यह सब कहना ही था। पार्वती देवी चुपचाप सुन रही थीं। आलि ने फिर धीरे से कहा, “माँ मैंने अपना निर्णय सुना दिया है। हाँ, अगर तुम्हे ये सब पसंद नहीं है तो मैं जिद नहीं करुँगी। मैं तुम्हारी देन हूँ। मेरे शरीर पर तुम्हारा मुझसे भी ज्यादा हक है। अगर तुम चाहती हो कि मैं सरकारी मशीनरी के भीड़तंत्र में खो जाउँ, तो ठीक है, परंतु वहाँ मैं शायद तुम्हारे दिये संस्कारों को बचा कर न रख पाउँ ।”
“नहीं आलि! तुम अपनी राह चुनने के लिए स्वतंत्र हो। तुम्हारे इस फैसले से मुझे बहुत खुशी मिली है।” पार्वती देवी ने आलि को मुस्कुराते हुए गले से लगा लिया और आलि को खुशियों का खजाना-सा मिल गया।
छोटे से शहर देवास में आलि को करने के लिए तो बहुत कुछ था लेकिन उसने महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज उठानी शुरु कर दी। लेकिन कहते हैं कि अच्छाई की राह आसान नहीं होती और ऐसा ही हो रहा था। खुद वो महिलाएं जिनके लिए आलि जूझ रही थी उसका अपमान करती और बाकी लोगों से उसे दुत्कार के सिवा कुछ न मिलता। इस समाजसेवा के जुनून ने उसे समाज से ही काट कर रख दिया था। जब कभी वो यौन-शोषण, दहेज प्रताड़ना की शिकार औरतों  की मौन चीखें सुनती तो उसकी अंतर्आत्मा झंकृत हो जाती और वह विरोध के लिए खड़ी हो उठती। लेकिन अकेले, न समाज के तथाकथित संभ्रान्त लोग उसका साथ देते, न पुलिस, न स्वयंसेवी संस्थाएं। इस सफर में वह अकेली थी और उसे मंजिल तक पहुँचना था।
निराशा और असफलता के सागर में आलि को अपने आत्मविश्वास, माँ का आशीर्वाद और कुछ शोषित महिलाओं की दुआओं की पतवार मिल जाती, फिर वह नयी ऊर्जा संचित कर दृढ़ होती अन्याय के खिलाफ। धीरे-धीरे अपने प्रयासो से आलि देवास की दबी-कुचली महिलाओं की नायिका बन गयी। सभी आलि तक अपनी समस्याएं पहुँचाना चाहतीं क्योंकि उन्हें विश्वास होने लगा था कि उन्हें वो मुक्ति दिलायेगी और आलि उनके इस विश्वास को और दृढ़ करती जाती।
आलि अब अकेली नहीं थी बल्कि उसके पीछे जमघट था, उसके सत्कार्यों से उपकृत हुई महिलाओं का, कुछ बुद्धिजीवियों का और कुछ ईमानदार अफसरों का। आलि देवास का हृदय बन गयी थी। एक ऐसी लोकप्रिय हस्ती जिसके लिए सिर्फ दुआएं थी, आशीर्वाद थे। परंतु देवास के पीड़ितों की ये नायिका अत्याचारियों के लिए खलनायिका बन गयी थी। आलि को एक तरफ पूजने वाली महिलाओं का हुजूम था तो दूसरी तरफ उससे घृणा करनेवालों का समूह। परंतु, आलि को न जननायिका बनने का गर्व था न घृणा की धुरी बनने का मलाल। उसका तो एक ही लक्ष्य था- पीड़ितों की सेवा करना। आलि ने देवास को देवों की भूमि बना दिया, परंतु देवभूमि पर भी कभी-कभी राक्षस उपद्रव कर ही देते थे और देवास इसका अपवाद कैसे हो सकता था?
एक दिन आलि को एक मुस्लिम महिला का पत्र मिला। पत्र में विस्तार से समस्याओ को लिखा गया था। हालाँकि आलि के लिए आसान नहीं था कि वह सम्प्रदाय और धर्म के लौह आवरण को तोड़कर उस पीड़िता को स्वतंत्रता की तरफ खींच ले लेकिन वह इस्पाती विचारधाराओं वाली थी और हारना उसके शब्दकोश में नहीं था। उसने न सिर्फ उस महिला को कानूनी रुप से उसका हक दिलवाया साथ ही अन्य महिलाओं को उनके हक के लिए भी जागरुक करने लगी। परंतु ये सुधारवादी प्रक्रिया कट्टरपंथियों के लिए मजहबी विरोध था और एक दिन उसकी हत्या कर दी गयी।
पार्वती देवी आलि की लाश को गोद में रखकर बुदबुदा रहीं थी, “ आलि तुमने ठीक ही कहा था जीवन स्वयं के सुख के लिए नहीं है, मुझे गर्व है तुम पर।” उपस्थित जनसमूह आलि जिंदाबाद के नारों से पूरे देवास को प्रकम्पित कर रहा था।
साँझ हो गयी। आलि का हाड़ माँस का शरीर जल चुका था। सभी शमसान से चले गये पर पार्वती देवी बैठी रही। कभी चिड़ियों को घोसलों की तरफ लौटते देख मुस्कुरातीं और कभी आलि की राख को मुट्ठी में भर बालों में डाल लेती। फिर जोर से कहती, “तूने तो सबको सहारा दिया आलि, तेरी बूढ़ी माँ को कौन सहारा देगा?  है तेरे देवास का कोई जो मुझे सहारा दे! हा!!! हा!!! हा!!!  बन जाना आलि,भीड़तंत्र का हिस्सा!  मत आना देवास में! सब हत्यारे हैं, मत आना आलि, मत आना मेरी कोख में। मैं फिर अकेले नहीं होना चाहती, मत आना धरती पर बन जाना भीड़तंत्र का हिस्सा।”
पार्वती देवी का अट्टहास दूर तक गूँजता। उनकी चीखें और आँसू देख धरती का कलेजा भी फटने को आतुर हो जाता। देवास के लोग पार्वती देवी को लेने आये, पर वह तो पागल हो चुकी थी। चिल्ला कर कहती, “सब हत्यारे हो, मार डाला मेरी आलि को! अरे बंजर हो जायेगा देवास फिर भी आलि नहीं आयेगी, एक-एक कर सब मरोगे। मत आना आलि बन जाना भीड़तंत्र का हिस्सा वहीं। हा! हा! हा! ,,,,, पार्वती देवी का अट्टहास फिर गूँजता और हवाओं के संग चला जाता शायद फिर से एक नयी आलि की तलाश में।

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