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 मूलतः वैशाली, बिहार की रहने वाली सोनी किशोर सिंह ने राजनीतिशास्त्र से स्नातक करने के बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नात्तकोत्तर किया। छात्र जीवन से ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया एवं आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिये उद्घोषिका के रुप में कार्य किया। साहित्यिक अभिरुचि और लेखकीय कौशल के मद्देनजर विभिन्न विज्ञापन एजेंसी, अखबार, पत्रिकाओं एवं समाचार चैनलों में कार्य किया। कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ एवं कवितायें प्रकाशित एवं डॉक्यूमेन्ट्री तथा फीचर फिल्म व टीवी धारावाहिकों के लिये स्वतंत्र लेखन। सोनी मुम्बई के एक मीडिया हाऊस से जुड़ी हैं और समय समय पर अपनी संवेदनाओं को कलम से उड़ेलती हैं…

दो सपनें बचपन से मेरे साथ पलते रहे। समय का खाद-पानी पाकर वो सपने भी जवान हो गये थे और उनको पूरा करने के लिये मैं बेकरार थी। हर वो शख्स मुझे आकर्षित करता जो मेरे सपनों के करीब ले जाने में मेरी सहायता कर सकते थे। मेरे सपने थे भी तो कोमल, निष्कलंक। अपने दम पर दुनिया में मदर टेरेसा का संदेश फैलाने के सपने। कोशिश यही रहती कि हर चेहरे पर मुस्कान देखूँ लेकिन इन मुस्कानों की कीमत भी अदा करनी पड़ती थी। गाहे-बगाहे लोगों की सहायता करने के चक्कर में खुद फटेहाली की नौबत आती जा रही थी। ऑफिस का काम प्रभावित हो रहा था और मेरी कार्यकुशलता पर सवाल उठने लगे थे।
अक्सर मन उदास होता तो मरीन ड्राईव चली जाती। वहाँ घंटों समुद्र की तरफ निहारती। समुद्र का शोर मेरे अन्तर्मन को शांत करने के बदले और उद्विग्न कर देता, फिर भी मैं बैठी रहती क्योंकि मुझे लगता विषम परिस्थितियों से भागना ही तो कायरता है। कई बार ऐसा होता कि रात के एक-डेढ़ बज जाते और घर पहुँचने का होश ही नहीं रहता। होश तब आता जब अचानक से घड़ी की तरफ निगाह पड़ती या चाय बेचने वाला बच्चा बगल से गुजरते हुये कहता, मैडम चाय ले लो चाय, अब खत्म ही होने वाली है…। ऐसी ही किसी अर्धरात्रि का समय था, मैं उस दिन नरीमन प्वाइंट के आखिरी छोर पर पत्थर पर बैठी समुद्र के अनंत विस्तार को देख रही थी। मन में अनगिनत लहरों की तरह विचारों का भी आरोह-अवरोह हो रहा था। आस-पास फैले पत्थरों पर कई प्रेमी युगल बैठे भविष्य के सपने बुन रहे थे। कुछ हाथों में हाथ डाले रुमानियत में डूबे तो कुछ सिगरेट और बीयर की मिली-जुली गंध में अपना संसार रचते हुये। उस वक्त वहाँ मेरा भी एक संसार बसा था, जिसका क्षेत्रफल बस वही एक पत्थर था जिसकी मैं स्वामिनी थी, लेकिन मेरी कल्पनाओं का विस्तार दूर-दूर तक था।
सहसा किसी की सिसकियों की आवाज आई और मैं अपनी काल्पनिक दुनिया से बाहर आ गई। पास पड़े पत्थर पर बैठी वो लड़की रो रही थी। पहले तो उसकी तरफ से ध्यान हटाने की कोशिश की लेकिन जब उसकी सिसकियां ज्यादा तेज होने लगी तो मैं उठकर उसके पास चली गई। शक्ल सूरत से अच्छे-भले घर की लग रही थी। मैंने उससे उसकी परेशानी पूछी तो खुद असमंजस में पड़ गई। वो एक पराये देश की लड़की थी। वह देश भी ऐसा जिसने अपनी पैदाईश के साथ ही हमारे मुल्क से दुश्मनी निभानी शुरू कर दी थी। उसके किसी परिचित ने भारत बुलाया था लेकिन यहाँ आने के बाद उसे किसी वजह से रखने तक को मना कर दिया था। वो कई दिनों से भटक रही थी। हृदय के किसी कोने से बगावत उठी और उसने दिमाग पर देखते ही देखते आक्रमण कर दिया। जैसा कि हर बार होता था मेरा दिमाग दिल के कब्जे में चला गया और मैंने फौरन उसे अपने साथ आने का निमंत्रण दे दिया। उसने मुँह से कुछ नहीं किया लेकिन उसकी आँखों ने सैंकड़ों धन्यवाद दे दिये।
टैक्सी में बैठते ही मैंने उससे पूछा था- भूख लगी होगी तुम्हे। थकी हुई भी होगी। जवाब देने के बदले थैंक्स कहते हुये लिपट गई थी। आँसुओं की बरसात ने एक-डेढ़ मिनट में ही मेरा दायां कंधा भिगो दिया था। मैंने उसकी पीठ पर थपकी देते हुये कहा- कोई बात नहीं, रोने की जरूरत नहीं, घर चलो। वो रोती रही, 15 मिनट का सफर मेरे लिये काफी बोझिल हो गया था। वो हिचकियों के बीच मुझे थैंक्स बोले जा रही थी। घर पहुँचते ही जल्दी-जल्दी में खाना बनाया था मैंने। बहुत प्यार से उसे परोसा लेकिन वो बिल्कुल जंगली जानवरों की तरह खाने पर टूट पड़ी थी। शायद कई दिनों से भरपेट खाना नहीं मिला था। उसे ऐसे खाते देखकर जरा सी वितृष्णा हुई थी मुझे लेकिन मेरी दोस्त स्नेहा ने उसे डाँटते हुए कहा, सही से खाना खाओ, इंसानों की तरह। वह जरा सी असहज हुई थी पर खाने में जुटी रही। उसे घर में लाने और खाना बनाने के बीच में एक बार भी स्नेहा को मौका नहीं मिला था कि वो मुझसे इस अजनबी लड़की के बारे में कुछ तहकीकात कर सके, इसलिये जैसे ही वो खाने के बाद हाथ धोने के लिये गई, स्नेहा ने मुझे घुड़का- किसे उठा लाई है, रात को रूकेगी भी यहीं क्या?मैंने बेचारगी में कहा- अब इतनी रात में कहाँ जायेगी, और यहाँ की है भी नहीं… स्नेहा की आँखे फैल गई- मतलब? तभी वो हाथ धोकर आ गई और स्नेहा ने पूरी हिकारत दिखाते हुये पूछा- क्या नाम है तुम्हारा ?  राबिया… राबिया अंसारी, रावलपिंडी की हूँ… स्नेहा की आँखे फैल गई- ओह नो… तुम मुसलमान हो और पाकिस्तानी, माय गॉड। मैंने स्नेहा को चुप कराने की कोशिश की तो वो मुझपर भी भड़क उठी- देख लेना एक दिन तुम किसी मुसीबत में फँसोगी, अब तो हद ही कर दी तुमने, बिना सोचे-समझे किसी को भी उठा लाती हो, कौन जाने, क्या करने आई है यहाँ… राबिया हमारी बातें सिर झुकाकर सुन रही थी, उसकी आँखे सजल हो उठी। रात किसी तरह बीती। हम तीनों चुप थे लेकिन स्नेहा ने सुबह-सुबह तमाशा कर दिया। हुआ यह था कि राबिया ने अपना छोटा सा ट्रैवलिंग बैग हमारे घर के छोटे से मंदिर के बगल में रख दिया था और सुबह उठते ही अपना टूथ ब्रश निकालने के चक्कर में उस मंदिर से जरा सा छू गई थी। स्नेहा ने देखते ही चिल्लाना शुरू कर दिया। उसके चीखने से मेरी नींद खुली। तुमने जान-बूझकर हमारे भगवान जी का मंदिर छुआ, हटो वहाँ से। राबिया डर गई थी और मेरी तरफ देखने लगी थी। मैंने भी उसे डाँटते हुये कहा- क्या तुम भी… देखकर जाना चाहिए न, उधर हमलोग पूजा करते हैं, हट जाओ वहाँ से। उस दिन मैं आफिस भी नहीं जा पाई थी, क्योंकि स्नेहा ने खुलेआम ऐलान कर दिया या तो इस लड़की को यहाँ से हटाओ या फिर तुम भी घर में रहो, मैं इसके साथ अकेले कमरा शेयर नहीं कर सकती, क्या पता कुछ नुकसान पहुँचा दे… पूरे दिन मैं घर में पड़ी स्नेहा और राबिया में तालमेल बिठाने की कोशिश करती रही लेकिन स्नेहा कोई सहयोग करने को तैयार ही नहीं थी। इस बीच में मैंने दोपहर का खाना बनाया तो स्नेहा ने खाने से भी इन्कार कर दिया। इस घर को तो तुमने अछूत बना दिया अब मैं नहीं खाऊँगी। फिर हम तीनों में से किसी ने नहीं खाया। राबिया पर मुझे तरस तो आ रहा था लेकिन वो मेरे लिये सिरदर्द बन रही थी। दिनभर में कुछ करीबी दोस्तों से सलाह मशविरा लिया तो उनलोगों ने भी स्नेहा की बातों को ही दुहरा दिया। पाकिस्तानी.. मुस्लिम… आतंकवादी.. जैसे शब्द से दिमाग भन्ना रहा था।
ये शक भी कितना अजीब होता है, एक बार मन में आ गई तो बीमार बना कर ही छोड़ता है और मुझे तो इस शक के टेबलेट्स का ओवरडोज दिया जा रहा था। ताज्जुब नहीं कि दूसरे दिन ही मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैंने उसे अपना इंतजाम करने को कह दिया, ये जानते हुये भी कि यहाँ उसका जाननेवाला और कोई नहीं है। पहले एक-दो बार सोचा भी कि क्या कहूँ, कैसे कहूँ लेकिन मेरे विवेक के उपर शक ने अपना पंजा फैला रखा था और समझ की धूप गुस्से की बदलियों में छिप गई थी।
देखो राबिया.. तुम जाओ यहाँ से, मैं नहीं रख सकती तुम्हे, तुम वापस चली जाओ- मैंने उसकी आँखों में बिना झाँके ही कह दिया। उसने कोई प्रतिउत्तर दिये बिना अपना बैग उठाया और एक बार फिर से मेरे गले मिली, स्नेहा से भी मिलना चाह रही थी, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। वो भारी कदमों से जा रही थी, कहाँ ये न मुझे मालूम था न उसे।
आज फिर मैं नरीमन प्वाईंट के उसी पत्थर पर बैठी हूँ। समुद्र का जल उछल-उछल कर अपनी असीम ऊर्जा से पत्थरों को पछाड़ने की कोशिश में लगा है। मुझे राबिया की याद आ रही है। पता नहीं.. कहाँ होगी, कैसी होगी, जिन्दा भी होगी या नहीं… कई सवाल मुझे घेरे हुये हैं और मेरे पास किसी का उत्तर नहीं है… स्नेहा मूंगफली लेकर मेरे पास चहकती हुई आई है, देखो आज तो समुद्र भी उफान पर है.. मजा आ रहा है… मुझे स्नेहा की बातें अच्छी नहीं लग रही और न ये समुद्र का हाहाकारी रूप… मुझे बस राबिया याद आ रही है.. मैं हाजी अली की तरफ अपना चेहरा कर मन ही मन दुआ करती हूँ कि अल्लाह, अपनी रहम उस तक पहुँचा देना… पराये देश की उस बच्ची को अपनी पनाह देना…।

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