समरीना
लॉकडाउन ने वह दिन दिखाए जिसका ज़िक्र किसी वेद, किसी पुराण या किसी ज्योतिषी में था ही नहीं। हर किसी के मुँह से सुना कि अपनी ज़िंदगी में ये पहली बार देख रहे हैं। बात भी जायज़ थी। कभी ऐसा हुआ ही नहीं। स्कूल से सिनेमा तक, पार्क से होटल तक और साईकिल से हवाई जहाज़ तक हर किसी को उस गेम के तहत ‘स्टेचू’ बोल दिया गया जिसे कभी हम बचपन में खेला करते थे और ‘गो’ कहे जाने का इन्तिज़ार करते थे कि कब स्टेचू बोलने वाला गो कहे और हम आज़ाद हों। कुछ दिनों पहले आया लॉकडाउन कुछ दिनों में गुज़र भी जायेगा, ढेरों ढेर मीठी कड़वी यादों के साथ और फिर कभी इसका ज़िक्र इतिहास की किताबों में होगा। इससे जुड़े तमाम राज़ अखबार और मैगज़ीन के हवाले से खुलेंगे तो कोई प्रोड्यूसर अपनी पूरी मेहनत झोंक कर इस पर कोई आर्ट फिल्म या डॉक्युमनेट्री भी बनाएगा। यानी हम इस वक़्त हम इतिहास का एक ख़ास हिस्सा जी रहे हैं जिसे आने वाली नस्लें बड़ी हैरानी के साथ पढ़ेंगी।

हम आपने भी अपनी इस बंद ज़िदगी के दौरान बहुत कुछ पाया और खोया है। कई चीज़ों की महरूमी झेली है तो कुछ ऐसा अनचाहा मिल गया जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं था। बाबा और दादी तो इसी बात पर ख़ुशी से फूले नहीं समाते कि पूरा परिवार साथ जमा है, मानो उनकी बगिया के सारे फूल खिले हुए एक साथ लहलहा रहे हैं। बाबूजी भी घर की चारदीवारी में पाने बड़ों और छोटों की मौजूदगी का मज़ा लेते नज़र आये। नौकरी और कारोबार की फ़िक्र सताती है तो ये ख़याल भी सुकून दे जाता है कि कोई हम अकेले थोड़े ही सवार हैं इस किश्ती में। जो सबका बनेगा वही मेरा भी होगा। सबको इस बात का एहसास है कि माँ का काम बढ़ गया है तो हर किसी को अपने अंदाज़ से उन्हें सहारा देने का ख़याल आ ही गया। माँ भी इस बात पर काम खुश नहीं कि न तो सुबह किसी का टिफिन बनाना है और न ही रात दूधवाले के आने का इन्तिज़ार करना है। और तो और बच्चा पार्टी भी कम मज़े नहीं ले रही इस लॉकडाउन के। बस सुबह कोई जल्दी उठने को न कहे। और जब एक बार नींद पूरी करने के बाद ये उठते हैं तो मानो इस नींद में ही इन्हे नैतिक शिक्षा का पूरा पाठ मिल चुका होता है। सबसे छोटे कि भी कोशिश होती है कि अपनी उम्र या हैसियत से अपनी ज़िम्मेदारी निभा डाले। कुछ नहीं तो उसे भी आप चादर का कोना ठीक करते या पोछे लगे कमरे के बाहर चप्पलों को तरतीब से रखते देख सकते हैं।सबसे बड़ी क्रांति पता है कहाँ देखने को मिली। खाने की मेज़ पर। अब सबको अनाज की क़द्र हो गई है। एक भी निवाला बर्बाद नहीं करना। डलिया में वो रोटी के बचे टुकड़े तो अब नज़र ही नहीं आते जिन पर मां का कहते कहते गाला सूख चूका था। चावल का बर्तन भी बिना कहे सलीके से साफ़ मिलता। सबको पता था की कुछ भी अतिरिक्त लेकर बर्बाद नहीं करना। न ही कोई बाहर की चीज़ें खाने की ज़िद करता नज़र आया और न ही किसी को अब ये शिकायत कि घूमने जाना है। हर किसी को एहसास है कि क़ुदरत को नाराज़ किया है। कहीं कुछ अति की है। ईश्वर नाराज़ है तो मोटे पल्लों में बंद पल्लों वाली अलमारी में मौजूद आत्ममंथन जैसा शब्द पता नहीं कब सरक कर बाहर आ गया और अंदर एक दवा की तरह ऐसा उतरा कि हर कोई इस बारे में विचार करने लगा। एक बार फिर से बाबा दादी के आशीर्वाद के वज़न का एहसास हो गया। इस यक़ीन के साथ कि इनकी दवाएं हमें इन हालात से उबार लेंगी।

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