बरेली में लॉकडाउन हो जाने से लोगों को परिजनों के साथ घर में रहने का मौका मिल रहा है मगर बुजुर्ग सूरजपाल जैसे भी तमाम लोग हैं जो इस बंदी के कारण अपने घर भी नहीं पहुंच पाए। यह लोग फुटपाथ पर रह कर दिन काट रहे हैं। बहुत को तो दो वक्त की रोटी मिलना भी मुश्किल हो गया है। भमोरा के एक गांव के रहने वाले बुजुर्ग सूरजपाल पाठक पटेल चौक स्थित पेट्रोल पंप पर चौकीदार है। शहर में रहने की व्यवस्था न होने की वजह से घर से आवागमन करते हैं। मगर अब कोरोना वायरस की वजह से शहर में लगाया गया लाकडाउन सूरजपाल के लिए मुसीबत बन गया है। परिवहन सेवाएं बंद होने की वजह से वह चार दिन से वह शहर में ही फंसे हुए हैं। हालांकि पेट्रोल पंप मालिक की ओर से दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त तो हो जाता है मगर रात गुजारने की कोई व्यवस्था अब तक नहीं हो पाई है। पिछले चार दिन से उनका आशियाना फुटपाथ ही बना हुआ है। दिनभर पुलिस चौकी के पीछे मौजूद जूस की बंद दुकान पर वक्त गुजारने के बाद वह शाम को नौकरी पर चले जाते हैं। सूरजपाल ने बताया कि कई बार मन करता है कि काम छोड़ कर घर चले जाए मगर फिर लगता है कि अगर घर चले गए तो फिर परिवार कैसे चलेगा। उन्होंने बताया कि परिवार में दो लड़कें हैं उनमें से बड़ा बेटा लाकडाउन की वजह से दूसरे प्रदेश में फंसा हुआ हैं।

बाजार में जरूरी चीजों को लेकर मारामारी
कोरोना से निपटने के लिए लगाए गए लाकडाउन के बाद से शहर के बाजारों में भीड़ बढ़ गई है। बाजार में बड़ी संख्या में लोग राशन समेत दैनिक जरूरत का सामान खरीदते को आ रहे हैं। शहर की किराना दुकानों पर बुधवार को सुबह से ही खूब भीड़ खरीददारी को उमड़ी। हालांकि कई इलाकों में पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए दोपहर बाद से बाजार बंद करा दिए। कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए देश में तीन सप्ताह का लाकडाउन लागू होने के बाद से शहर के बाजारों में मारामारी का आलम है। दैनिक जरूरत की चीजों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित कराने के प्रशासन के दावे के बाद भी लोगों में भय है। आलम यह है कि शासन की लगातार अपील के बावजूद भी वो संग्रह में जुट गए हैं।

दिल्ली, चेन्नई और बंगलुरु से आने वाले लोगों की शिकायत कर रहे उनके पड़ोसी  

कोरोना वायरस के संक्रमण की दहशत कुछ इस कदर है कि लोग आसपास के जिलों, राज्यों से आए पड़ोसियों से भी डरे हैं। अब दिल्ली, चेन्नई और बंगलुरु से आने वाले लोगों की शिकायत उनके पड़ोसी पुलिस और प्रशासन के हेल्पलाइन नंबर पर कर रहे हैं। पुलिस को सूचना दी जा रही है कि दूसरे राज्यों से आए लोग अपने घरों में छुपे हैं। दिल्ली में नौकरी कर रही दो बहनें बुधवार को जिला अस्पताल पहुंचे और बताया कि पड़ोसियों की वजह से उनको जांच कराने आना पड़ा। पड़ोसियों ने कई बार पुलिस को बुलाया। उनपर जांच कराने के लिए दबाव बनाया। दोनों युवतियों की जिला अस्पताल कोरोना सहायता केंद्र में काउंसलिंग की गई। यह पहला मामला नहीं है। पूरे जिले में ऐसी शिकायतों की बाढ़ आ गई है। विदेश से आए लोगों के साथ ही जो लोग दिल्ली, चेन्नई, मुंबई से वापस आ रहे हैं, उनसे भी आसपास के लोग डरे सहमे हैं। मॉडल टाउन, सुभाषनगर, किला, पुराना शहर, इज्जतनगर, सीबीगंज, प्रेमनगर, राजेंद्रनगर समेत करीब पूरे शहर से ऐसी शिकायतें पुलिस कंट्रोल रूम और प्रशासन सहायता केंद्र पहुंच रही हैं। अधिकांश लोगों का कहना है कि उनके पड़ोस में आए लोग विदेश से आए हैं और अपनी जांच भी नहीं करा रहे हैं। बुधवार को जिला अस्पताल पहुंची दो बहनों ने अपना दर्द बयान किया। उनका कहना था कि कुछ दिन पहले ही दोनों दिल्ली से आई हैं। दिल्ली में दोनों प्राइवेट नौकरी करती हैं। लाक डाउन के चलते 2 दिन पहले घर आने के बाद पड़ोसी लगातार जांच कराने के लिए दबाव बना रहे हैं। दोनों की तबीयत बिल्कुल सही है।

कोरोना जैसे संकट के कठिन वक्त में हौसला बढ़ाते धरती के भगवान
डॉ बागीश वैश्य रोजाना कोरोना आइसोलेशन वार्ड में आने वाले मरीजों की काउंसलिंग भी करते हैं। डॉ बागीश ने बताया कि लोगों में काफी डर है। इस मौसम में होने वाले खांसी, जुकाम, बुखार को भी लोग कोरोना वायरस का संक्रमण समझकर डर रहे हैं। अब तक कोरोना सहायता केंद्र में 200 से अधिक लोगों की काउंसलिंग की जा चुकी है। डॉक्टर बागीश की अगुवाई वाली विशेषज्ञों की टीम ने अब तक जिला अस्पताल में आए 22 संदिग्ध मरीजों की जांच की है और उनका सैंपल लिया है। कोरोना के संदिग्ध मरीजों की जांच में जुटी टीम के दूसरे महत्वपूर्ण सदस्य हैं डॉक्टर आशु अग्रवाल।

कोरोना से बचने को घर पर रहने में ही समझदारी
कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए जरूरी है कि इसके चक्र को तोड़ा जाए और इसके लिए सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। कोरोना वायरस से बचने का सबसे अच्छा और प्रभावी तरीका है सामाजिक दूरी बनाना। इसीलिए लगातार सब से अपील की जा रही है लोग अपने, परिवार और समाज के कल्याण के लिए घरों में रहे और लाक डाउन का पालन करें। –  डॉ शशांक शेखर शुक्ल

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