क्या है अश्वगंधा- अश्वगंधा एक औषधि है। इसे बलवर्धक, स्फूर्तिदायक, स्मरणशक्ति वर्धक, तनाव रोधी, कैंसररोधी माना जाता है। इसकी जड़, पत्ती, फल और बीज औषधि के रूप में उपयोग किये जाते हैं।
भूमि-अश्वगंधा को हर तरह के खेत या मिट्ïटी में उगाया जा सकता है। भुरभुरी, हल्की, बलुई दोमट या लाल मिट्ïटी इसकी खेती के लिए सबसे अच्छी होती है। मिट्ïटी का पीएच मान जरूर जांच-परख लें जो सात-आठ के बीच में होना चाहिए और उसमें जल निकास की पूरी व्यवस्था भी होनी चाहिए।
बीज की मात्रा- नर्सरी के लिए प्रति हेक्टेअर पांच किलोग्राम व छिडक़ाव के लिए प्रति हेक्टेअर 10 से 15 किलो बीज की जरूरत पड़ती है। बुआई के लिए जुलाई से सितंबर तक का समय उपयुक्त माना जाता है।
छंटाई व निराई- बोई गई फसल को 25 से 30 दिन बाद हाथ से छांट देना चाहिए। इससे लगभग 60 पौधे प्रतिवर्ग मीटर यानी 6 लाख पौधे प्रति हेक्टेअर अनुरक्षित हो जाते हैं।
उत्पादन- फसल बुआई के 150 से 170 दिन में तैयार हो जाती है। पत्तियों का सूखना फलों का लाल होना फसल की परिपक्वता का प्रमाण है। परिपक्व पौधे को उखाडक़र जड़ों को गुच्छे से दो सेमी ऊपर से काट लें फिर इन्हें सुखाएं। फल को तोडक़र बीज को निकाल लें।
क्या है लाभ- अश्वगंधा की फसल से प्रति हेक्टेअर 3 से 4 कुंतल जड़ 50 किग्रा बीज प्राप्त होता है। इस फसल में लागत से तीन गुना अधिक लाभ होता है।
रोपण की विधि- रोपाई के समय इस बात का ध्यान रखें कि दो पौधों के बीच आठ से 10 सेमी की दूरी हो तथा पंक्तियों के बीच 20 से 25 सेमी की दूरी हो। बीज एक सेमी से ज्यादा गहराई पर न बोएं।
उर्वरक का प्रयोग- बुआई से एक माह पूर्व प्रति हेक्टेअर पांच ट्रॉली गोबर की खाद या कंपोस्ट की खाद खेत में मिलाएं। बुआई के समय 15 किग्रा नत्रजन व 15 किग्रा फॉस्फोरस का छिडक़ाव करें।
प्रजाति एवं सिंचाई- डब्लू.एस-20 (जवाहर), डब्लूएसआर, पोषिता अश्वगंधा की अच्छी प्रजातियां हैं। नियमित समय से वर्षा होने पर फसल की सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। आवश्यकता पड़ऩे पर जीवन रक्षक सिंचाई अवश्य करें।
भण्डारण- सूखी जड़ों के टुकड़ों को टीन के डिब्बों में भंडारित करना चाहिए। इस प्रक्रिया से फफूंद नहीं लगती है। भंडारण से पहले जांच लें कि नमी की गुंजाइश कम से कम हों।
उपयोग- अश्वगंधा की मांग पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है। अश्वगंधा ब्लड शुगर, तनाव, पीठ दर्द आदि के इलाज में कारगर होने से दवा कंपनियों को इसकी काफी जरूरत है।
यहां बेचें- तैयार फसल को बेचने के लिए जिला स्तर पर मंडी में बेचने की सुविधा है। नहीं तो सगंध पौध संस्थान, लखनऊ की वेबसाइट पर भी विक्रय केन्द्रों की जानकारी उपलब्ध है। दवा कंपनियां बड़े किसानों से खुद संपर्क करती हैं। ठ्ठ

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