दिल्ली- एनसीआर एवं उसके समीपवर्ती राज्यों में हवा की गुणवत्ता दिन पर दिन खराब होती जा रही है। प्रदूषण मापने वाली एजेंसियों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण की एक सबसे बड़ी वजह पंजाब और आसपास के राज्यों में जलाई जाने वाली पराली है।

वायु प्रदूषण को लेकर नासा ने दिल्ली से लगे कुछ राज्यों की सेटेलाइट फोटो  हाल ही जारी किया है। इन फोटो में ‘रेड स्पॉट’ खेतों में पड़े पराली में लगाई गई आग को दर्शाती है। नासा का कहना है कि बीते कुछ दिनों में पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में तेजी से बढ़ोतीर हुई है और यही वजह है कि दिल्ली और आसपास के राज्यों में प्रदूषण का स्तर पहले से और खराब हो रहा है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार 27 अक्टूबर को पंजाब में पराली जलाने की घटनायें 7842 से बढ़कर 12027 हो गयीं जबकि 30 अक्टूबर को यह आंकड़ा 19869 पर पहुंच गया। वहीं हरियाणा में इन घटनाओं की संख्या 27 अक्टूबर को 476 से बढ़कर 3735 हो गयी और राज्य में 30 अक्टूबर को पराली जलाने की 4221 घटनायें दर्ज की गयी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ के डॉ. राकेश सेंगर ने बताया, “ खेतों में फसल उगाने के दौरान किसान भारी मात्रा में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। जिस कारण अवशेष जलाने के दौरान इन रासायनिक कीटनाशकों के कण हवा में घुल जाते हैं। ये मनुष्य के शरीर में सांस के सहारे चले जाते हैं। जिससे लोगों में बीमारियां बढ़ रही हैं। सेंगर के मुताबिक पराली जलाने से हवा में विषैले रासायनिक तत्वों की मात्रा 33 से 270 गुना बढ़ जाती है। वातावरण में इसका असर लंबे समय तक रहता है जो मनुष्य एवं पशुओं की त्वचा पर जमा हो जाता है और इससे घातक बीमारियां होती हैं। ”

मेरठ निवासी किसान सुनील कुमार बताते हैं, “ अब जैविक खेती ही समाधान है। अगर लोगों को स्वस्थ रहने के साथ पर्यावरण बचाना है तो रसायन युक्त खेती को अलविदा करना होगा। मैंने सेना में रहते हुए ही केमिकल फ्री खेती करने की ठान ली थी। जैविक खेती से लागत में भी किसानों ने अधिक उत्पादन मिलता है। ”

दीवाली के बाद से देश के तमाम हिस्सों में वायू प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। किसी शहर में फैक्ट्रियों की वजह से प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ है तो किसी शहर में निर्माण के कामों की वजह से।

सीपीसीबी की ओर से शहरों के एयर क्वालिटी इंडेक्स जारी किए गए हैं, इसके हिसाब से देश के 10 सबसे अधिक प्रदूषित इलाकों में 7 अकेले उत्तर प्रदेश के हैं, जिनमें बागपत , नोएडा , ग्रेटर नोएडा,हापुड़ ,मेरठ, बुलंदशहर , मुजफ्फरनगर शामिल है।

किसान पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे है। ऐसे में अब सरकारें किसानों पर सख्त होती नजर आ रही हैं। यूपी के पीलीभीत में पिछले 12 दिनों में करीब 300 किसानों पर मुकदमा दर्ज किया गया है तो वहीं हरियाणा के फतेहाबाद में अब तक 150 किसानों पर पराली जलाने पर मुकदमा दर्ज किया गया है।

शिकागो विश्वविद्यालय में एपिक के निदेशक डॉ माइकल ग्रीनस्टोन ने वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक की विश्लेषण रिपोर्ट का हिंदी संस्करण जारी करते हुये कहा कि यह रिपोर्ट पार्टिकुलेट तत्वों से जनित वायु प्रदूषण से इंसानी जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर करती है। उन्होंने कहा कि इसकी मदद से ऐसी नीतियां बनाने में मदद मिल सकती है जो वायु प्रदूषण के कारण जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करने वाले कारकों से निपटने में सक्षम हों।

रिपोर्ट के अनुसार 2016 तक गंगा के मैदानी इलाकों में प्रदूषण का स्तर 72 प्रतिशत बढ़ा है और इसकी वजह से औसत आयु में 3.4 से 7.1 साल की कमी आयी है। इसके पीछे इन इलाकों के वायुमंडल में दूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों से होने वाले वायु प्रदूषण में इजाफे को मुख्य कारण बताया गया है। वायु प्रदूषण पूरे भारत, खास कर उत्तरी भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारत की आबादी का 40 फीसदी से अधिक हिस्सा (48 करोड़) उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में रहता है। जहां बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली व पश्चिम बंगाल जैसे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं।

रिपोर्ट – अमित सिंह पालीवाल

 

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