दिल्ली – देश की राजधानी में दिवाली की धूम साफ नजर आ रही है। दिवाली पर घर को जगमगाने के लिए बाजार भी पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन, इस दिवाली लोग चायनीज लाइट को बाय-बाय कर मिट्टी के दीयों, लैंप यहां तक की मिट्टी की पूजा की थाली जैसे विकल्प के साथ दिवाली को पूरी तरह इकोफ्रेंडली तरीके से मनाने का मन बना चुके है। दिल्ली में दिल्ली पॉटरी क्लब द्वारा आयोजित टेरा फेस्ट में देश के 10 राज्यों से आए कुम्हारों की खूबसूरत कलाकारी वाले प्रोडक्ट की रेंज लोगों के दिल को भा रही है।

दिवाली रोशनी और खुशियों का त्योहार है। दिवाली में बस कुछ ही दिन रह गए हैं। ऐसे में बाजार की रौनक भी बढ़ गई है और लोग भी खरीददारी में जुट गए हैं। इस बार दिवाली को ज्यादा खूबसूरत और इकोफ्रेंडली तरीके से मनाने के लिए दिल्लीवासियों के पास विकल्प की कमी नहीं है। चाइनीज लाइट की जगह देश के 10 अलग-अलग राज्यों के कुम्हार से बने स्टाइलिश, खूबसूरत दीये, लैंप, लैंटर्न, टी लाइट होल्डर लोगों का दिल जीत रहे हैं। दिल्ली में पॉटरी क्लब द्वारा आयोजित टेरा फेस्ट में देश के कोने-कोने से आए कुम्हार मिट्टी के खूबसूरत सामान बेच रहे हैं।

इस बार ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। इतना ही नहीं मिट्टी के दीयों में मौजूद वैराइटी भी उनकी शॉपिंग को खास बना रहे हैं। लोग इस दिवाली को राजस्थान का टच देना चाहते है, तो राजस्थान के कारीगर द्वारा बने मिट्टी के सामान खरीद रहे हैं। लोग मध्यप्रदेश, गुजरात के कारीगरों का काम भी बेहद पसंदकर रहे हैं।

राजस्थान के भरतरपुर के कुम्भकार यादराम का कहना है कि जहां पहले मुफ्त में ही मिटटी मिल जाती थी, वहीं मिटटी अब 2 से ढाई हजार हजार रुपए ट्रॉली खरीदकर लानी पड़ रही है। साथ ही साथ धीरे-धीरे दीप बनाने की परंपरा भी खत्म होती जा रही है. नई पीढ़ी अब मिटटी के बर्तन के साथ अन्य सामान भी बनाने से परहेज करने लगे हैं।

कुम्भकार हमेशा की तरह सरकार से भी इस बार भी आस लगा रहे है कि उनके परंपरागत पुश्तैनी काम को बढ़ाने के लिए सहयोग करें, ताकि उनकी कला जीवित रहे। गरीबी की मार झेल रहे कुम्हार अब तो मजदूरी करने के लिए दूसरों पर आश्रित रहने लग गए है। उनका मानना है कि यदि सरकार उनकी मदद करे तो उनकी कला जीवित रह सकती है।

कराठी निवासी बृजलाल चक्रधारी का कहना है कि एक दौर था जब दीपावली आने की सबसे अधिक खुशी कुम्हारों को होती थी। महीनों पहले से चाक की गति बढ़ जाती थी। कुम्हारी कला से जुड़े लोग मानते थे कि दीपावली उन्हें इतना दे जाएगी कि पूरे साल परिवार के लिए पर्याप्त हो जाएगा। समय बदला तो इलेक्ट्रॉनिक झालरों ने मिट्टी के दीये का क्रेज कम किया। ग्राम बांसला निवासी परमेश्वर चक्रधारी ने कहा कि गणेश, लक्ष्मी प्रतिमा को लेकर भी यही स्थिति है। पहले दीपावली पर मिट्टी के गणेश, लक्ष्मी का पूजा होती थी। आज प्लास्टर ऑफ पेरिस से लेकर प्लास्टिक, धातु और सोने-चांदी के गणेश लक्ष्मी पूजन का क्रेज बढ़ गया।

रिपोर्ट – न्यूज नेटवर्क 24

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