अभी कुछ दिन पहले भाजपा ने किस तरह से कोयला आंवटन घोटाले को लेकर संसद ठप्प कर दी थी यह सभी ने देखा था। एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले दल खुद कितना दूध के धुले हैं यह सभी जानते हैं। बाजार में मंदी और देश की विकास दर गर्त में है लेकिन हमारे नेता मालामाल हैं।  संसद ठप्प कर जनता के खून पसीने के करोड़ों रुपए बहाने वाले दलों ने दान लेने में खूब दरियादिली दिखाई है। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी है जाहिर है सबसे धनी होगी। एक गैर सरकारी संगठन थिंक-टैंक्स एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स एंड नेशनल वाच द्वारा एकत्र यह आंकड़े बीते सात साल यानी वित्त वर्ष 2004-05 और 2010-11 के बीच के हैं। इनकम टैक्स रिटर्न और चुनाव आयोग में दाखिल हलफनामे के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले इस संगठन का दावा है कि चुनाव फंडिंग ही भ्रष्टाचार की जड़ है। कांग्रेस की आमदनी दो हजार आठ करोड़ रुपए थी। इसी अवधि में 994 करोड़ रुपए की आमदनी के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर रही। हजारों लाखों करोड़ के वारे न्यारे करने वाले मंत्रियों की पार्टी का धनी होना स्वाभाविक सा लगता है। कांग्रेस पर उंगली उठाने वाली भारतीय जनता पार्टी  दूसरे नम्बर की धनी पार्टी है। कांग्रेस को कुल कमाई का सिर्फ साढ़े 14 प्रतिशत चंदे के तौर पर मिलता है। उधर भाजपा का मामला उलटा है। भाजपा की कमाई का साढ़े 81 फीसदी चंदे से आता है जिसमें बिजनेस घरानों का चंदा शामिल है। पिछले दो सालों के दौरान में कांग्रेस को सबसे ज्यादा आय कूपन की बिक्री से हुई जबकि भाजपा को स्वैच्छिक योगदान से। इस स्वैच्छिक योगदान को रेड्डïी बंधु या फिर बड़े औद्योगिक घराने समय समय पर अपनी सुविधानुसार परिभाषित कर लेते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि उत्तर प्रदेश में बीते पांच साल सत्ता पर काबिज रही बहुजन समाजवादी पार्टी देश की तीसरे नम्बर की धनी पार्टी बन गई है। दलितों की लडऩे वाला यह राजनीतिक दल बेशुमार दौलत वाला दल बन गया है। बसपा ने यह दावा भी किया है कि उसने कभी किसी से बीस हजार से अधिक धन भी नहीं लिया है। माकपा 417 करोड़ रुपए के साथ चौथे नम्बर पर है जबकि उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी के पास 279 करोड़ रुपए ही हैं। समाजवादी पार्टी ने अपनी आय में कमी होने का दावा किया है। तृणमूल कांग्रेस, जम्मू-कश्मीर नैशनल कॉन्फ्रेंस , आरएलडी और जेएमएम सहित 18 क्षेत्रीय और राज्य पार्टियों ने कमाई का अब तक कोई हिसाब नहीं दिया है।  वोट बैंक के गुणा गणित में माहिर यह राजनीतिक दल दान लेने में बाजीगरी दिखाते हैं। देश के दौलतमंद राजनीतिक दलों ने आय के जिन स्त्रोतों की नाम के साथ जानकारी दी है उसमें बड़ी कम्पनियों और संगठनों से मिला डोनेशन और लोगों का स्वैच्छिक योगदान है। हालांकि यह कुल आय का  करीब 20 प्रतिशत ही है। बाकी 80 प्रतिशत आय के स्त्रोतों के नामों का पता नहीं चल सका है। विभिन्न दलों ने कूपन की बिक्री या सदस्यता अभियान से सबसे अधिक आमदनी होने की बात कही है। लेकिन कूपन किसे बेचे गए इसका कहीं कोइ्र हिसाब किताब नहीं है। राजनीतिक दलों की दौलत का खुलासा करने वाले इस संगठन ने इन दलों पर आरोप लगाया है कि बड़ी राशि के डोनेशन को भी टुकड़ों में बांटकर 20 हजार रुपए से कम कर दिया जाता है ताकि उसका हिसाब किताब न रखना पड़े।  कुछ ही सालों में दलितों की दौलतमंद पार्टी बसपा ने दावा किया है कि पार्टी ने पिछले 2 साल के दौरान 20 हजार रुपये से अधिक का एक भी डोनेशन नहीं लिया। जबकि पूरे देश ने देखा कि किस तरह से कई बार बसपा की मुखिया व यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती हजार के नोटों की माला पहने मंच पर नजर आईं। बहन जी के जन्मदिन पर उपहार तो सर्वाधिक चर्चा में रहे। हार और उपहार ने दलितों की पार्टी को दौलतमंद जरूर बनाया लेकिन दलित कल्याण में दौलत का रत्ती भर अंश भी नहीं लग पाया। इस गैर सरकारी संगठन ने दलों पर एक और गम्भीर आरोप यह भी लगाया है कि राजनीतिक दलों को विदेशी समूह से किसी भी तरह की आर्थिक सहायता लेने पर पाबंदी है। लेकिन वेदांता जैसी कई विदेशी लिस्टेड कम्पनियां राजनीतिक दलों को डोनेशन दे रही हैं। बाजार में मंदी है, देश की विकास दर गिरती जा रही है, भूख और कुपोषण से लोग लगातार मर रहे हैं, लेकिन जनता का वर्तमान और भविष्य तय करने वाली राजनीतिक पार्टियों का खजाना भरता जा रहा है। हर साल राजनीतिक पार्टियों की कमाई बढ़ती जा रही है। महंगाई आम जनता के मुंह से निवाला छीनने पर उतारू है। महंगाई में मौज करने वाले और संसद में एक दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले दल खुद ही भ्रष्टïाचार के दलदल में धंसे हैं। जनता हैरान है कि इन्हीं नेताओं के कारण मेरा देश महान है।

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