Aseem trivedi
Aseem trivedi

असीम त्रिवेदी को लेकर हल्ला मच रहा है। असीम मामले में कुछ उसी तरह मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए वही सारी बचकानी हरकते कर रहा है जो उसने अगस्त 2011 में की थी। स्वतंत्र युवा कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने मुम्बई में पिछले साल अन्ना के कम सफल रहे धरने में अपने कार्टूनों की एक प्रदर्शनी लगाई थी। ये कार्टून इंटरनेट पर उपलब्ध हैं और यह कार्टून कला नहीं कलाकार की कुंठा का प्रदर्शन कर रहे हैं। भ्रष्ट नेताओं और अफसरों ने इस देश की काफी दुर्गति कर रखी है, लेकिन इसे हमारी राष्ट्रीय आत्मछवि को गैंग रेप की तरह देखना किसी स्वस्थ सोच की परिचायक तो नहीं हो सकता। कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का मानसिक दीवालियापन ही कहा जाएगा कि उसने अपने कार्टून  अशोक की लाट पर बने शेरों को खूनी भेडिय़ों में बदल गया है। राजचिन्ह का अपमान करने की छूट तो किसी को भी नहीं दी जा सकती। मुम्बई में राजचिन्ह से खिलवाड़ करते इन कार्टूनों के खिलाफ लोकल थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसे लेकर त्रिवेदी के खिलाफ अदालत से समन जारी हुआ। कार्टूनिस्ट असीम अदालत के समन को हल्के में लेते रहे। असीम ने लम्बे समय तक समन को कोई तवज्जो नहीं दी तो उनकी गिरफ्तारी हुई। अदालत ने इस मामले में तीन धाराएं उन पर लगाई हैं। इनमें एक राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान और दूसरी इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री अपलोड करने से जुड़ी है। तीसरी धारा देशद्रोह की है जिस पर बहस की गुंजाइश बनती है। आंदोलन विरोध प्रदर्शन का अर्थ भूलती जा रही युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं असीम त्रिवेदी। असीम के कई पक्षधर सोशल नेटवर्किग के सहारे जो माहौल तैयार कर रहे हैं वह किसी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। अरविंद केजरीवाल जैसे लोग असीम की कारगुजारी को देशभक्ति से जोडक़र देख रहे हैं इससे ज्यादा शर्म की कोई और बात नहीं हो सकती। भारत मां की तस्वीर के साथ राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों व कार्पोरेट्स द्वारा रेप करते हुए दिखाना निहायत घटिया सोच का परिचायक है। मान भी लिया जाए कि  हमारे नेता, नौकरशाहों और कार्पोरेट्स ने देश को जिस हालात में पहुंचाया है उससे इन लोगों के प्रति नफरत का ही भाव पैदा होता है। लेकिन क्या अरविंद केजरीवाल से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय प्रतीकों व राजनेताओं के बीच अंतर न कर पाने वाले कथित बुद्विजीवी का समर्थन वह क्यों कर रहे हैं। जिस विवादित कार्टून के आधार पर असीम के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है, वह इस हद तक आपत्तिजनक है उसका प्रकाशन अथवा प्रसारण तक नहीं किया गया। एक अखबार ने टिप्पणी भी की कि असीम के कार्टून इतने आपत्तिजनक है कि उन्हें अखबार में स्थान नहीं दिया जा सकता। त्रिवेदी पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ है तो वह कोई कार्टून बनाने पर दर्ज नहीं हुआ है, अपितु राष्ट्रीय प्रतीक के साथ छेड़छाड़ करने पर एक व्यक्ति की शिकायत पर दर्ज हुआ है। पुलिस ने भी वर्तमान में मौजूद कानून के मुताबिक उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और कोर्ट ने भी उसी आधार पर उसे पहले पुलिस रिमांड पर भेजा और बाद में न्यायिक हिरासत में। हां इस बात पर मतभेद हो सकते हैं कि देशद्रोह का कानून काफी पुराना और अप्रासंगिक हो गया है। अब इसमें बदलाव की जरूरत है लेकिन जब तक बदलाव नहीं हो जाता तब तक किसी को भी राजचिन्हों से खिलवाड़ की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। टीवी चैनलों का असीम की गिरफ्तारी को लेकर यह दिखाना कि आपातकाल की आहट तो नहीं है बेहद मूर्खतापूर्ण लग रहा है। कसाब का संविधान को गंदा करना, संसद को टॉयलेट के रूप में दिखाए जाने पर सरकार की सख्ती को आपातकाल की आहट मानने वालों पर तरस आता है। यह वही चैनल वाले हैं जो कि हजारे की तुलना महात्मा गांधी से करते रहे हैं औै अब यह लोग असीम की तुलना भगत सिंह से कर रहे हैं। राजनीति के माया मोह में पडक़र अन्ना की भ्रष्टïाचार के खिलाफ मुहिम ठप्प हो गई है। केजरीवाल व किरणबेदी की राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं उफान पर हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन जल्द ही एक राजनीतिक दल की शक्ल लेने को है। असीम की तरफदारी कर रहे लोग यह भूल जाते हैं कि देश आज भी मुठ्ठïी भर लोगों के देशप्रेम के जज्बे के कारण ही आगे बढ़ रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मनमानी और हमारे स्वाभिमान पर हमले का समर्थन करने वाले खुशकिस्मत हैं कि वह भारत में हैं। डेनमार्क के कार्टूनिस्ट द्वारा कार्टून बनाए जाने पर हंगामा असीम के हमदर्द भूलते जा रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे नेता पतन की ओर लगातार अग्रसर हो रहे हैं। राजनीति के दामन पर कालिख ही कालिख है लेकिन पतन समाज के कई क्षेत्रों में हुआ है। बाबा बैरागी भी भगवा की जगह सत्ता के रंग में रंगे हैं। शिक्षा व्यापार बन चुकी है। रिश्वतखोर अफसर हमारे सैनिकों की ख्ुाराक हजम कर रहे हैं। फिर भी उम्मीदें अभी मरी नहीं हैं। सच को हथियार बनाने वाले अफसर आज भी हैं जिनके दम पर देश चल रहा है। हालात बुरे जरूर हैं लेकिन इतने बदतर भी नहीं कि जो असीम जैसे कुंठाग्रस्त कलाकार की घटिया सोच को खुराक दे सकें। यह

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