सरकार आखिरकार सोमवार को जीत गई और भारतीय रिजर्व बैंक इस झगड़े में हार गया जिसमें एक केंद्रीय बैंक के एक गवर्नर की आलोचना भी हुई। कोई तर्क दे सकता है कि केंद्रीय बैंक सरकार की मर्जी से काम करता है और आरबीआई अधिनियम में इसे अच्छी तरह से स्पष्ट किया गया है। आरबीआई ने अपने बोर्ड की बैठक के बाद घोषणा की कि वह 1.76 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक अधिशेष सरकार को हस्तांतरित करेगा।

केंद्रीय बैंक ने एक बयान में कहा, “अधिशेष हस्तांतरण में वर्ष 2018-19 का 1,23,414 करोड़ रुपये अधिशेष और 52,637 करोड़ रुपये का आधिक्य प्रावधान शामिल है जिसे आर्थिक पूंजी फ्रेमवर्क (ईसीएफ) ने चिन्हित किया है और इसे आज केंद्रीय बोर्ड की बैठक में स्वीकार किया गया।”

पिछले साल नवंबर में मसला काफी गरम रहा जब आरबीआई के एक डिप्टी गवर्नर ने हलचल पैदा कर दी। उन्होंने ए. डी. श्रॉफ व्याख्यान में कहा, “आरबीआई न तो स्वतंत्र और न ही स्वायत्त संस्था है। जो सरकार केंद्रीय बैंक का सम्मान नहीं करेगी उसे कभी न कभी वित्तीय बाजारों का कोप भाजन बनना पड़ेगा।”

आरबीआई अधिनियम में स्पष्ट बताता है-“केंद्र सरकार समय समय पर केंद्रीय बैंक के गर्वनर के परामर्श के बाद बैंक को ऐसे निर्देश देती है जोकि उसे लगता है कि जनहित में आवश्यक है। ऐसे किसी निर्देश के तहत बैंक के मामलों और कारोबार का सामान्य अधीक्षण और निर्देशन निदेशक मंडल की देखरेख में होगा जो सभी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है और बैंक द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यो पर लागू हो सकता है।”

यह सरकार को दिए जाने वाले आरबीआई के सालाना लाभांश के अतिरिक्त है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान इसी साल फरवरी में केंद्रीय बैंक से 28,000 करोड़ रुपये का अंतरिम हस्तांतरण किया गया। आरबीआई ने अगस्त 2018 में सरकार को 40,000 करोड़ रुपये हस्तांतरित किया।

यह किसी एक वित्त वर्ष में आरबीआई से सरकार को प्राप्त सर्वाधिक राशि थी जोकि वित्त वर्ष 2016 में प्राप्त 65,896 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2018 में प्राप्त 40,659 करोड़ रुपये से अधिक है।

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