जम्मू- कश्मीर से धारा 144 तत्काल हटाए जाने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चूंकि मामला संवेदनशील है इसलिए सरकार को और समय देने की जरूरत है। अब इस मामले की सुनवाई दो हफ्ते बाद होगी।

इससे पहले वकील मेनका गुरुस्वामी की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अटर्नी जनरल से कश्मीर के हालात के बारे में जानकारी ली और पूछा कि यह सब कब तक चलेगा। कश्मीर में आतंकवाद की गंभीरता को बताते हुए अटर्नी जनरल ने कहा कि 1999 से अब तक लगभग 40 हजार लोग इसके शिकार हो चुके हैं। घाटी से 370 धारा हटाए जाने के बाद बिगड़े हालात के बारे में उन्होंने कहा कि आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद लगातार तीन महीने तक वहां कानून- व्यवस्था बिगड़ी रही।

इसके साथ ही अटर्नी जनरल ने घाटी में सामान्य स्थिति बहाली के लिए सरकार की ओर से किए जा रहे काम का ब्यौरा दिया और बताया कि कोशिश की जा रही है कि लोगों को कम से कम असुविधा हो।

इससे पहले, नेशनल कांफ्रेंस (NC) ने जम्मू कश्मीर के संवैधानिक दर्जे में बदलाव को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी और दलील दी कि इन कदमों से वहां के नागरिकों से जनादेश प्राप्त किए बगैर ही उनके अधिकार छीन लिए गए हैं।

याचिका में दलील दी गयी कि संसद द्वारा स्वीकृत कानून और इसके बाद राष्ट्रपति की ओर से जारी आदेश असंवैधानिक है इसलिए उन्हें अमान्य एवं निष्प्रभावी घोषित कर दिया जाए। मोहम्मद अकबर लोन और रिटायर्ड जस्टिस हसनैन मसूदी ने यह याचिका दायर की है। दोनों ही लोकसभा में नेशनल कांफ्रेंस के सदस्य हैं।

लोन विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं और मसूदी जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के सेवानिवत्त न्यायाधीश हैं, जिन्होंने 2015 में अपने फैसले में कहा था कि अनुच्छेद 370 संविधान का स्थायी प्रावधान है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 और इसके बाद जारी राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा, ‘कानून और राष्ट्रपति का आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 के तहत जम्मू-कश्मीर के लोगों को दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन है।

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