लंदन ओलम्पिक सम्पन्न हो चुके हैं। खेलों के इस महाकुम्भ में कई रिकार्ड बने और टूटे हैं। बेईमानी और पक्षपात अम्पायरिंग से भले हमारे मुक्केबाज जीत कर हार गए हों लेकिन जो छह पदक हमारे हिस्से में आए हैं उनकी चमक किसी भी तरह से सोने से कम नहीं है। साथ ही दुनिया भर के कई ऐसे खिलाड़ी इस ओलम्पिक में नजर आए जिनके अद्भुत प्रदर्शन और जबरदस्त जज्बे को हर किसी ने सलाम किया। फाइनल में उल्टी दस्त से बिगड़े स्वास्थ्य के बावजूद सुशील कुमार ने कुश्ती में रजत पदक जीत कर न सिर्फ अपने गुरु सतपाल का सिर ऊंचा किया है बल्कि कुश्ती के विश्व चैम्पियन स्व दारा सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। दिल्ली में नजफगढ़ के बापरोला इलाके के रहने वाले सुशील ने कांस्य पदक जीतकर और फिर रूस के मास्को में विश्व चैम्पियन बनकर भारतीय कुश्ती को नई पहचान दी थी और अब लंदन की सफलता से वह भारतीय कुश्ती के महानायक बन चुके हैं। 26 मई, 1983 को एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे सुशील ने अपने करियर में वे उपलब्धियां हासिल की हैं जिसका सपना हर भारतीय खिलाड़ी देखता है। भारतीय मुक् केबाज विकास कृष्ण के लिए यह ओलम्पिक एक बुरे सपने जैसा रहा जहां उसे जीतने के बाद हारा हुआ घोषित किया गया। ओलम्पिक खेलों में पहली बार शामिल महिला मुक्केबाजी में भारत की मैरीकॉम ने कांस्य पदक जीता तो सायना नेहवाल ने बैडमिंटन में कास्य जीत कर अपने देश का नाम रौशन किया। निशानेबाजी में विजय कुमार ने रजत तो गगन नारंग ने कास्य जीत कर भारत के पदकों की संख्या बढ़ाई। कुश्ती में योगेश् वर दत्ता ने कास्य जीत कर कुश्ती में भारत का सिर फिर ऊंचा किया। फिक्सिंग और बेईमानी की कालिख को अलग कर देखें तो इस ओलम्पिक में दुनिया भर के बहुत से ऐसे खिलाड़ी रहे जिनके जज्बे को सलाम करने को दिल चाहता है। खिलाडिय़ों का यह जज्बा जीत हार से कहीं ऊपर है। पुरुषों की 4 गुणा चार सौ मीटर रिले रेस के पहले चरण में 200 मीटर की दूरी पार करते ही अमेरिकी धावक मैंटियो मिशेल को अपने एक पैर की हड्डी चट्ट से टूटने की आवाज सुनाई पड़ी। उनके ठिठकने भर से टीम मुकाबले से बाहर हो जाती, लिहाजा उसी गर्मी में वह दौड़ते रहे। चिकित्सा विज्ञानी भी मिशेल के इस करिश्मे पर हैरान हैं पर उत्साह के आगे यह भयंकर चोट भी हार भी गई। मिशेल ने टूटी हड्डïी के के बावजूद दौड़ पूरी करके न सिर्फ अपनी टीम को फाइनल में पहुंचाया बल्कि उसे रजत पदक का हकदार भी बनाया। लंदन ओलम्पिक में दक्षिण अफ्रीका के ऑस्कर पिस्टोरियस का जज्बा भी कुछ कम नहीं था। पिस्टोरियस जन्म से दोनों पैर न होने के बावजूद 4&400 मीटर रिले दौड़ में उतरे। वो घुटनों से जुड़ी स्टील की छड़ों के साथ दौड़ते हुए वह अन्य प्रतियोगियों की बराबरी नहीं कर पाए लेकिन 400 मीटर स्पर्धा में सेमीफाइनल तक पहुंचे। दुनिया के नक् शे में रत्ती भर दिखने वाले छोटे से देश जमैका के उसैन बोल्ट ने अपनी पेइचिंग वाली कामयाबी दोहरा कर उम्र को पीछे धकेलने जैसा करिश्मा कर दिखाया है। 100 और 200 मीटर की फर्राटा दौड़ों में दो बार ओलम्पिक गोल्ड जीतने वाले वे इतिहास में अकेले हैं। चार साल तक दौड़ को एक ही स्तर पर बनाए रखना अब तक असंभव माना जाता था। अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स ने तो अकेले 20 ओलम्पिक गोल्ड जीतने का ऐसा रिकार्ड रच डाला है, जिसके टूटने की सम्भावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। चीन की 16 वर्षीया तैराक ये शिवेन इतनी रफतार से तैर गईं कि सब हैरान रह गए। 400 मीटर के आखिरी 50 मीटर की दूरी उन्होंने मात्र 28.93 सेकंड में पूरी कर ली। इतनी रफ्तार से तो पुरूषों के स्वर्ण पदक विजेता अमरीकी तैराक रायन लोटे भी नहीं तैरे जिन्होंने इसके लिए 29.10 सेकंड लिए। केन्या के डेविड रुडिशा 800 मीटर की रेस इतनी तेज दौड़े जैसे 100 मीटर की रेस में हिस्सा ले रहे हों। उनके साथ दौड़ रहे बाकी पांच धावकों ने भी उन्हें पकडऩे के लिए जान लड़ा दी। हालत यह हुई कि इस रेस में अंतिम स्थान पर रहे ब्रिटिश धावक ने भी इतना अच्छा समय निकाला कि यही प्रदर्शन उसका पेइचिंग में रहा होता तो वहां वह स्वर्ण पदक का हकदार होता। कानूनी रूप से दृष्टि विकलांगता की श्रेणी में आने वाले कोरियाई तीरंदाज इम दोंग हिन ने लंदन ओलम्पिक की शुरुआत में ही 72 तीरों की होड़ में 699 अंक लेकर अनूठा रिकॉर्ड बनाया। सामान्य भाषा में कहें तो डेढ़ सौ फुट से भी ज्यादा दूरी से चलाए गए उनके 72 बाणों में से 51 बिल्कुल सटीक मछली की आंख पर लगे और बाकी के 21 में भी बस बाल बराबर की चूक हुई। लंदन ओलम्पिक अब समाप्त हो चुके हैं लेकिन खेलों के सबसे बड़े इस मेले में कई चौंकाने वाले प्रदर्शन हमें हमेशा याद रहेंगे। भारत का प्रदर्शन पिछले ओलम्पिक के मुकाबले सुधरा हैं। बस एक स्वर्ण पदक की हसरत रह गई है इस बार अगर वह मिल जाता तो भारत पदक तालिका में और ऊपर होता। हमें 2016 तक इंतजार करना होगा जब ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में भारतीय खिलाड़ी पहले से ज्यादा पदक भारत की झोली में डालेंगे।

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