भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एम.पी.सी.) ने कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और गिरते रुपए के मद्देनजर महंगाई के खतरे को स्वीकार किया है। समिति ने संकेत दिए हैं कि वह आने वाले महीनों में रेपो रेट में वृद्धि कर सकती है। यानी कि समिति ने माना कि देश में जल्द महंगाई का दौर आ सकता है। इसके अनुसार अधिकतर सदस्यों ने महंगाई की आशंका को रेखांकित किया है। समिति के 6 में से 5 सदस्यों ने दरों को 6.50 प्रतिशत पर रखने पर वोट दिया है।

आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि महंगाई के लगातार खतरे को मानते हुए और लंबे समय तक 4 प्रतिशत के महंगाई दर लक्ष्य को हासिल करने के लिए मौद्रिक नीत को ‘न्यूट्रल से कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की ओर मोडऩे की जरूरत है। कैलिब्रेटेड टाइटनिंग का अर्थ है कि वर्तमान रेट साइकिल में नीति रेपो रेट में कटौती नहीं होगी और हम हर नीतिगत बैठक में दरें बढ़ाने को बाध्य नहीं हैं।

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के अनुसार तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से दरों में कटौती नहीं की जाएगी। आचार्य ने कहा कि इन सभी कारकों तथा मौद्रिक नीति समिति को मिले महंगाई दर के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ऐसा महत्वपूर्ण है कि सावधानीपूर्वक सही समय पर आगे बढ़ा जाए ताकि लगातार पिछले दो बार से बढ़ रही दरों के चलते अर्थव्यवस्था को एडजस्ट करने का समय मिले।

सदस्य चेतन घाटे ने कहा कि नीतिगत दरों में पिछली दो बार से हुई बढ़ोतरी के बावजूद अगस्त से अब तक का डाटा दिखाता है कि महंगाई को 4 प्रतिशत पर बरकरार रखना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा है। अब जोखिम प्रबंधन के नजरिए से कार्रवाई की जरूरत है। हम 4 प्रतिशत के लक्ष्य को लचीला नहीं कर सकते।

सदस्य रवींद्र ढोलकिया ने कहा कि आरबीआई की ओर से अगले 12 महीनों के लिए महंगाई का अनुमान मेरे हिसाब से उच्चतर होना चाहिए। ऐसा इसलिए भी क्योंकि जिस हद तक आरबीआई ने महंगाई पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के प्रभाव को माना है, वह मेरे हिसाब से अवास्तविक रूप से अत्यधिक है।

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