muslim_protest_against_assam_violenceहम आजाद हैं यह बात कहते हुए भला किसे खुशी नहीं होती। लेकिन आजादी कहां और कितनी यह तय करना भी जरूरी है। यह तो सभी मानते हैं कि आजादी की सीमा वहां खत्म होती जहां से किसी दूसरे को तकलीफ पहुंचने लगती है। आजादी को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। हर इंसान अपनी बुद्धि का सही उपयोग करते हुए आजादी की सीमा तय करता है। हर व्यक्ति स्वतंत्र रहना चाहता है, परंतु इसकी अधिकता कभी-कभी नुकसानदेह साबित होती है। आज युवाओं को अनुशासित करने के लिए समय-समय पर उनकी आजादी की सीमाएं तय करना बहुत जरूरी है|

वरिष्ठï पत्रकार डॉ. सुभाष राय तो साफ कहते हैं कि आजादी में संयम अंतर्निहित होता है। वह उन्मुक्ति या स्वच्छन्दता नहीं देती। जिस आजादी में आत्मनियंत्रण नहीं है, वह जल्दी ही अराजकता में बदल जायेगी। कोई भी इस तरह आजाद नहीं हो सकता कि वह किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाये। चाहे वह लिखने की आजादी हो या बोलने की, चाहे वह देश की आजादी हो या समाज की या व्यक्ति की। आजादी के मायने मनमानेपन से नहीं लगाया जाना चाहिये। आजादी हमेशा सकारात्मक जीवन मूल्यों को उर्वर जमीन मुहैया कराती है, वह व्यक्ति, समाज और देश के जीवन में शांति, विकास और समृद्धि का संगीत भरती है। आकाश में उड़ता हुआ पक्षी आजाद तो होता है लेकिन उसे लगातार ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं उसके पंख किसी पेड़ या पहाड़ से टकरा न जायें। अगर वह ऐसा न करें तो किसी समय उसके पंख टूट सकते हैं, उसकी जान भी जा सकती है। जो समाज आजादी का अर्थ निरंकुशता, उन्मुक्ति या मनमानेपन के रूप में लगाता है, वह भी उसी असावधान पक्षी की तरह नष्ट हो जाता है। अराजकता हमेशा गुलामी या विनाश की ओर ले जाती है। सच्ची आजादी का मतलब ऐसे कर्म और चिंतन के लिये आसमान का पूरी तरह खुला होना है, जो समूचे समाज को, देश को लाभ पहुंचा सके|

चिकित्सक डॉ. अनूप अग्रवाल कहते हैं कि आजादी में संतुलन बहुत जरूरी है। मेरे विचार से आजादी का सही अर्थ है-सामंजस्य। अगर हर इंसान आजादी के साथ अनुशासन का भी महत्व समझे तभी देश सही मायने में आजाद होगा। वर्षो की गुलामी सहने और लाखों देशवासियों का जीवन खोने के बाद हमने यह बहुमूल्य आजादी पाई है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी आजादी का वास्तविक अर्थ भूलती जा रही है। पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण कर वह अपनी सभ्यता, संस्कृति और विरासत से दूर होती जा रही है। उसे तो अपनी आजादी से मतलब है भले ही इसके लिए दूसरे को तकलीफ हो। आजादी की आड़ में निरंकुशता चाहने वालों की संख्या बढ़ रही है। अधिकारों या फिर आजादी की दुहाई देने वाले क्या कभी अपने कर्तव्यों की भी बात करते हैं? सच तो यह है कि ऐसा करना अमूल्य आजादी का दुरुपयोग है। युवा पीढ़ी आजादी के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे। अपनी आजादी के साथ दूसरों की स्वतंत्रता एवं निजता का भी ध्यान रखे। अनुशासित हो, केवल अपनी मनमर्जी न करें|

रंगमंच से जुड़ी ऋतु बताती हैं कि आजादी की एक सीमा रेखा अवश्य होनी चाहिए। इसी में परिवार, समाज और देश का कल्याण संभव है। धर्म और जाति के भेदभाव के बिना सभी नागरिक आजादी के साथ सुकून की सांस ले सकें, आजादी का यही असली मकसद होना चाहिए। आजादी का मतलब यह कतई नहीं कि हम सडक़ पर लहराते हुए बाइक चलाएं और दूसरों को डराएं|

मनोचिकित्सक डॉ रेविका कहती हैं कि कुछ लोग आजादी को लेकर गलत अवधारणा बना लेते हैं। उन्हें यह नहीं लगता कि उनकी आजादी से किसी को तकलीफ हो रही है और वह कह नहीं पा रहा है। उदाहरण के तौर पर पड़ोस में कोई बुजुर्ग बीमार है और हम आजादी के नाम पर अपने घर में जोर जोर से गाने बजा रहे हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जोदूसरों को दुखी देखकर खुश होते हैं और वह आजादी के नाम पर दूसरों को दुख पहुंचाने का ही काम करते हैं। मेरी राय में आजादी का दायरा जितना व्यापक है उतना ही जटिल भी। आजादी अगर आपको निरंकुशता की ओर ले जा रही है तो संभलने की जरूरत है। निरंकुशता अगर आप पर हावी हो गई तो लोग आपसे कटने लगेंगे। दूसरे आपको गंभीरता से लेना बंद कर देंगे और आप अकेले पड़ जाएंगे। आजादी के नाम पर अराजक होने से बचा ही जाना चाहिए|

अध्यापक अर्चना श्रीवास्तव की नजर में आजादी का सीधा अर्थ होता है किसी पर निर्भर न होना, आत्मसम्मान के साथ सर उठा कर जीना। लेकिन आज लोग अपने निजी स्वार्थो के लिए आजादी को मनचाहे ढंग से परिभाषित करते हैं। दूसरों की असुविधा को ध्यान में रखे बिना हर काम अपनी मनमर्जी से करने, अनुशासन के नियमों को तोडने और पश्चिमी सम्यता का अंधानुकरण को आजादी कतई नहीं माना जा सकता। बौद्धिक स्तर पर हम कितने आजाद हैं, यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। वैसे तो हमारी सोचने-समझने की सीमाएं बढ़ गई हैं। हम उदार और मुक्त ढंग से सोचने लगे हैं, परंतु आजाद होने की कोशिश में अपने नैतिक मूल्यों को खोते जा रहे हैं।  बाल विवाह, दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या जैसी कई कुरीतियां आज भी हमारे समाज में विद्यमान हैं। जिस दिन हम इन कुरीतियों को जड़ से समाप्त कर देंगे उस दिन सही मायने में आजाद होंगे|

व्यवसायी मनीष कुमार कहते हैं कि हमारे लिए यह गर्व की बात है कि हम आजाद देश के नागरिक हैं। आजादी का सही मतलब है कि हमें अपनी बात कहने, अपनी इच्छानुसार सरकार चुनने और जीवनयापन करने का पूरा अधिकार हो। आजादी का अर्थ है- विकास के पथ पर आगे बढकर देश और समाज को ऐसी दिशा देना, जिससे हमारे देश की संस्कृति की सोंधी खुशबू चारों ओर फैल सके। लेकिन आज हमारी युवा पीढी आजादी के सही मायने भूलती जा रही है। युवा लोग पाश्चात्य संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित हो रहे हैं। आज हमें अपनी आजादी का सदुपयोग करते हुए समाज और देश को विकास के पथ पर ले जाना चाहिए। अंग्रेजों की बर्बर हुकूमत से तो हमारा देश आजाद हो गया पर अपनी संकीर्ण मानसिकता की बेडिय़ों में देशवासी आज भी जकड़े हुए हैं। अकसर ऐसा महसूस होता है कि आज भी हम मानसिक गुलामी के अदृश्य पाश में जकड़े हुए हैं। शायद इसी वजह से आजादी के वर्षो बाद भी लोग इसका असली मायने समझने में असमर्थ हैं|

छात्र फिरोज आलम इस बात पर जोर देते हैं कि  यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश तरक्की करे तो सबसे पहले हमें अपने काम के प्रति ईमानदार, साहसी, सहनशील और प्रतिबद्ध होना होगा। हम अपने आप को अनुशासन के दायरे में बांधे। यदि हम सच्चे दिल से भारतीय हैं तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि आजादी का सदुपयोग करते हुए अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें। जब हम देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए भ्रष्टाचार, रूढिवाद, जातिवाद और आतंकवाद आदि को खत्म करने में कामयाब होंगे तभी सही मायने में आजाद होंगे|

वाकई आजादी और निरंकुशता के बीच हम फर्क नहीं कर पा रहे हैं। युवा पीढ़ी आजादी के नाम पर उन्मुक्त होना चाहती है उसे आजादी की कीमत नहीं मालूम। कितने लोगों ने खून बहाया और अपना सर्वस्व लुटा दिया। आज जरूरत है आजादी को सहेजने और सम्भाल कर रखने की। हम आने वाली पीढ़ी को आजादी का मतलब समझाएं और इसका महत्व भी तभी बात बनेगी|

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