नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुंभ नगरी इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया है। अब देश के धार्मिक, शैक्षिक और राजनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण शहर इलाहाबाद को अब प्रयागराज के नाम से जाना जाएगा। मुख्यमंत्री योगी का कहना है जहां दो नदियों का संगम होता है, उसे ‘प्रयाग’ कहा जाता है। हिमालय से निकलने वाली देवतुल्य दो नदियों (गंगा और यमुना) का संगम इलाहाबाद में होता है और यह तीर्थों का राजा है। ऐसे में इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया जाना उचित ही होगा।

इलाहाबाद का नाम बदलने पर कांग्रेस समेत विपक्ष ने विरोध जताया है। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि बीजेपी सरकार काम कोई करती नहीं बस नाम बदलने में भरोसा रखती है। इलाहाबाद का एक इतिहास, सभ्यता और प्रशासनिक वजूद रहा है, उसको खत्म किया जा रहा है। हम लोगों को उसकी गरिमा को कम होने से रोकना चाहिए।

तो वहीं सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि प्रयाग कुंभ का नाम केवल प्रयागराज किया जाना और अर्द्धकुंभ का नाम बदलकर ‘कुंभ’ किया जाना परंपरा और आस्था के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा, ‘राजा हर्षवर्धन ने अपने दान से प्रयाग कुंभ का नाम किया था और आज के शासक केवल ‘प्रयागराज’ नाम बदलकर अपना काम दिखाना चाहते हैं। इन्होंने तो ‘अर्धकुंभ’ का भी नाम बदलकर कुंभ कर दिया है।

काफी लंबे समय से संत और नेता यह मांग कर रहे थे कि इलाहाबाद से पहले रह चुके प्रयाग नाम को वापस लाया जाए। लेकिन आज हम बताएंगे कि इस शहर का क्यों और कैसे बदला गया। अगर इतिहास देखें तो पता चलता है कि जिस समय आर्यन इस शहर में रहते थे, इसका नाम प्रयाग था। माना जाता है कि प्रयाग में आने से सारे पाप मिट जाते हैं।

हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, ब्रह्मांड के निर्माता ब्रह्मा ने इसकी रचना से पहले यज्ञ करने के लिए धरती पर प्रयाग को चुना और इसे सभी तीर्थों में सबसे ऊपर, यानी तीर्थराज बताया। कुछ मान्यताओं के मुताबिक ब्रह्मा ने संसार की रचना के बाद पहला बलिदान यहीं दिया था, इस कारण इसका नाम प्रयाग पड़ा। संस्कृत में प्रयाग का एक मतलब ‘बलिदान की जगह’ भी है।

मुगल बादशाह अकबर के राज इतिहासकार और अकबरनामा के रचयिता अबुल फज्ल बिन मुबारक ने लिखा है कि 1575 में अकबर ने प्रयाग में एक बड़ा शहर बसाया और संगम की अहमियत को समझते हुए इसे ‘अल्लाह का शहर’, इल्लाहाबास नाम रख दिया। अकबर ने यहां इलाहाबाद किले का निर्माण कराया, जिसे सबसे बड़ा किला माना जाता है। फिर इसे ‘अलाहाबाद’ लिखा जाने लगा। नाम बदलने जाने के दौरान यह शहर धार्मिक रूप से हमेशा ही बेहद संपन्न रहा है।

आजादी की लड़ाई का केंद्र इलाहाबाद ही था। वर्धन साम्राज्य के राजा हर्षवर्धन के राज में 644 CE में भारत आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने अपने यात्रा विवरण में पो-लो-ये-किया नाम के शहर का जिक्र किया है, जिसे इलाहाबाद माना जाता है। उन्होंने दो नदियों के संगम वाले शहर में राजा शिलादित्य (राजा हर्ष) द्वारा कराए एक स्नान का जिक्र किया है, जिसे प्रयाग के कुंभ मेले का सबसे पुराना और ऐतिहासिक दस्तावेज माना जाता है। हालांकि, इसे लेकर कुछ साफ तरीके से नहीं कहा गया है क्योंकि उन्होंने जिस स्नान का जिक्र किया है वह हर 5 साल में एक बार होता था, जबकि कुंभ हर 12 साल में एक बार होता है।

वैसे तो इलाहाबाद नाम मुगल शासक अकबर की देन है लेकिन इसे फिर से प्रयागराज बनाने की मांग समय-समय पर होती रही है। महामना मदनमोहन मालवीय ने अंग्रेजी शासनकाल में सबसे पहले यह आवाज उठाई और फिर अनेक संस्थानों ने समय-समय पर मांग दोहराई। मालवीय ने इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम भी छेड़ी थी। 1996 के बाद इलाहाबाद का नाम बदलने की मुहिम फिर से शुरू हुई।

अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेद्र गिरी भी नाम बदलने की मुहिम में आगे बढ़ाया। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समक्ष भी नाम इलाहाबाद का नाम बदलने की मांग की गई। वर्तमान में साधू संतों ने सरकार के सामने प्रस्ताव दिया था। अब सीएम योगी ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया।

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