अटल बिहारी वाजपेयी आधुनिक भारतीय राजनीति में सर्वमान्य नेता। सभी राजनीतिक दलों में उनका आदर है। बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे श्री अटल बिहारी वाजपेयी इन दिनों राजनीति में भले ही सक्रिय न हों लेकिन सभी राजनीतिक दलों के नेता समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन लेते रहते हैं।
आगरा जेल की बच्चा बैरक में 24 दिन रहे थे अटल जी
२५ दिसंबर 1924 को ग्वालियर की शिंदे की छावनी में एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की ग्वालियर के ही विक्टोरिया जो अब लक्ष्मीबाई कॉलेज है में हुई। अटल जी के दिल में बचपन से ही देश को आजाद कराने जज्बा था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अटल के बगावती तेवर देख पिता ने पुत्र को आगरा के बटेश्वर भेज दिया। लेकिन अटल के दिल में तो भारत को आजाद कराने की धुन सवार थी। 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन आंच में तप रहे पुत्र पर आगरा में पुलिस की नजर पड़ी और उसे पकड़ लिया गया। उम्र कम होने के कारण अंग्रेजों ने उसे आगरा जेल की बच्चा बैरक में 24 दिन रखा लेकिन उसके जुनून को कम नहीं कर पाए।
कानपुर के डीएवी कालेज में पिता पुत्र एक साथ पढ़ते थे
आगे की पढ़ाई के लिए वह कानपुर के डीएवी कॉलेज आए। कानपुर के डीएवी कालेज में अटल बिहारी वाजपेयी और उनके पिता दोनों ने एलएलबी में एक साथ प्रवेश किया। पिता और पुत्र की जोड़ी कालेज में सबके आकर्षण का केन्द बनी हुई थी। अटल जी ने इसके बाद राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया। उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन के सम्पादन का दायित्व सम्भाला।
जनसंघ से आए राजनीति में, नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए
अटल बिहारी वाजपेयी ने 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना कर राजनीति की शुरूआत की। कुशल वक्ता के रूप में अटल ने समकालीन राजनेताओं व जनता में बहुत जल्द ही जगह बना ली। 1957 में जन संघ के टिकट पर वह बलरामपुर से चुनाव जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में अटल जी ने हिंदी में भाषण देकर भारत का सम्मान बढ़ाया। 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई और वह 1986 तक इसके अध्यक्ष रहे । दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए। 1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
सांसद से प्रधानमंत्री बने, गठबंधन सरकार को सही मायनो में चलाया
16 मई 1996 को वह भारत के प्रधानमंत्री बने लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी सम्भाली। एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए। 1999 के चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी ने देश की बागडोर सम्भाली। वर्तमान भारतीय राजनीति के दौर में अटल जी आज भी प्रासंगिक हैं। खराब स्वास्थ्य के चलते वह राजनीति में भले ही सकि‎य न हो लेकिन देश एक बार फिर उनकी ओर हसरत भरी निगाहों से देख रहा है।

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