जब दुनिया की आबादी पांच अरब हुई तब संयुक्त राष्टï्र संघ ने लोगों को बढ़ती आबादी पर जागरूक करने के लिए 11 जुलाई 1989 को जनसंख्या दिवस मनाया जाने लगा। इस साल दुनिया आबादी सात अरब होने को है। हर वर्ष 11 जुलाई को कुछ गोष्ठियां व सम्मलेन आदि करके तथा जनसंख्या की भयावहता पर विचार कर हर दिवस की भांति इसको भी अगले एक साल तक, जब तक यह दिन दोबारा न आए, भुला दिया जाता है। हमारे देश के साथ दुनिया की आबादी भी दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही है और इसे रोकने के सारे प्रयास भी विफल साबित हो रहे है। आज विश्व की कुल जनसंख्या करीब 6 अरब 70 करोड़ 35 हज़ार है, जबकि एशिया महाद्वीप की जनसंख्या अकेले लगभग 4 अरब के बराबर है। एशिया की यह जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या की 60 फीसदी है। दुनिया में सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश चीन है। चीन की जनसंख्या लगभग 1 अरब 33 करोड़ है, जबकि भारत की आबादी लगभग 1 अरब 21 करोड़  है जोतेजी से चीन की जनसंख्या को पछाडऩे पर तुली हुई है। भारत चीन को पछाड़ भी देगा, क्योंकि भारत में अभी भी जागरूकता और शिक्षा की कमी है। हमारे देश में जनसंख्या पर रोक लगाने में भी राजनीति होती है। इसी राजनीति के चलते दुनिया में भारत ही ऐसा देश है जहां कि बहुसंख्यकों  का जनसंख्या में प्रतिशत लगातार घटता रहता है। हर 10 वर्ष में हिन्दुओं की संख्या एक प्रतिशत कम हो जाती है। कट्टरपंथी कहते हैं कि परिवार नियोजन उनके मजहब के अनुकूल नहीं हैं तो सरकार कहती है कि परिवार नियोजन कार्यक्रम स्वैच्छिक है जो अपनाना चाहे वह अपनाए। वोटबैंक के लालच में विपक्षी दल सरकार की इस नीति का विरोध तक नहीं करते। वहीं चीन आबादी रोकने के मामले में बेहद सख्त नजर आता है। छोटे परिवार के फायदे कट्टïरपथियों को बताए जाने ही चाहिए और आबादी पर नियंत्रण लगाने का चीनी फार्मूला भारत में लागू होना ही चाहिए नहीं तो हमारे जिगर के टुकड़े आगे चल कर भूख व प्यास से जूझते जूझते एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे।

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