dayalbagh-instituteदयालबाग शैक्षिक संस्थान एक समय में अपनी गुणवत्तापरक मूल्य आधारित  शिक्षा के लिए पूरे देश में विख्यात था , किन्तु आज ये संसथान अपनी पहचान को व्यावसायिकता की कसौटी में कसने लगा है । संस्थान के शिक्षा संकाय  में बी.एड. , एम.एड. , एम. फिल. आदि व्यावसायिक पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं । सत्र 2016-17 से संस्थान के दूरस्थ केन्द्र राजबरारी (म.प्र.) में 13 विद्यार्थियों के प्रवेश के साथ बी.एड. पाठ्यक्रम का आरंभ हुआ जो सरासर एन.सी.टी.ई. के मानकों की अवहेलना है । इसके बाद शिक्षक एवं शिक्षिकाओं पर अमानवीय कर्तव्यभार दिया गया ।

शिक्षिकाओं को दायित्व बोध के नाम पर क्रमशः राजबरारी और टिमरनी जो मध्यप्रदेश के अत्यंत पिछड़े इलाके हैं, वहां इंटर्नशिप के नाम पर 22 दिन के प्रवास के लिए विवस किया जा रहा है । इनमे से अधिकांश शिक्षिकाएं अत्यधिक पारिवारिक जिम्मेदारी को स्वयं अकेले निभा रही हैं इसलिए सभी ने संकाय प्रमुख से अनुरोध किया की लोकतान्त्रिक तरीके से सभी शिक्षिकाओं की सुविधा के अनुसार उन्हें 12 दिनों के लिए भेजा जाये । क्या संस्थान इन सबकी समस्याओं पर मानवीय दृष्टी से विचार नहीं कर सकता ? यहाँ मानवीयता की बात करना शायद अपराध है । किन्तु संकाय प्रमुख प्रोफ.के. सी. वशिष्ठ का रवैया अत्यधिक तानाशाहीपूर्ण  एवं अमानवीय था उनके शब्द थे कि नौकरी दिमाग से की जाती है दिल से नहीं । आपकी समस्या पर विचार करने के लिए हम नहीं बैठे है , आप अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूँढिये संकाय प्रमुख की तरफ से लगायी गयी ड्यूटी अत्यंत पक्षपातपूर्ण है । ऐसा नहीं है की इन समस्याओं का हल नहीं है । संकाय में बहुत सारे वरिष्ठ शिक्षिकाए हैं जो पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्त हैं उन्हें क्रमवार भेजा जा सकता है ? यहाँ एनसीटीई के मानकों का खुले आम मखौल उड़ाया जा रहा है और मूल्यपरक शिक्षा का ढिढोरा पीटा जा रहा है । ऐसे असहिष्णु माहौल में शिक्षकों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा करना क्या न्यासंगत है? व्यावसायिकता का खुला खेल मूल्यों का आवरण ओढ़कर अपनी नग्नता को कब तक आवृत्त रख पायेगा ।

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